काहे रे बन खोजन जाई- शब्द-ੴ सतिगुर प्रसादि धनासरी महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

काहे रे बन खोजन जाई- शब्द-ੴ सतिगुर प्रसादि
धनासरी महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

काहे रे बन खोजन जाई ॥
सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई ॥1॥रहाउ॥
पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई ॥
तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहुभाई ॥1॥
बाहरि भीतरि एको जानहु इहु गुर गिआनु बताई ॥
जन नानक बिनु आपा चीनै मिटै न भ्रम की काई ॥2॥1॥684॥

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