काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 9

काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 9

विविध

करता है श्रम रात दिन, कृषक उगाता अन्न।
रूखा-सूखा जो मिले, रहता सदा प्रसन्न।।
रहता सदा प्रसन्न, धूप, वर्षा भी सहकर।
सींचे फसल किसान, ठंड, पानी में रहकर।
‘ठकुरेला’ कविराय, उदर इस जग का भरता।
कृषक देव जीवन्त, सभी का पालन करता।।

***

देता जीवन राम का, सबको यह संदेश।
मूल्यवान है स्वर्ग से, अपना प्यारा देश।।
अपना प्यारा देश, देश के वासी प्यारे।
रखें न कोई भेद, एक हैं मानव सारे।
‘ठकुरेला’ कविराय, न कुछ बदले में लेता।
होता देश महान, बहुत कुछ सबको देता।।

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चाबुक लेकर हाथ में, हुई तुरंग सवार।
कैसे झेले आदमी, मँहगाई की मार।।
मँहगाई की मार, हर तरफ आग लगाये।
स्वप्न हुए सब खाक, किधर दुखियारा जाये।
‘ठकुरेला’ कविराय, त्रास देती है रुक रुक।
मँहगाई उद्दंड, लगाये सब में चाबुक।।

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मँहगाई ने कर दिया, मँहगा सब सामान।
तेल, चना, गुड़, बाजरा, गेहूँ, मकई, धान।।
गेहूँ, मकई, धान, दाल, आटा, तरकारी।
कपड़ा और मकान, सभी की कीमत भारी।
‘ठकुरेला’ कविराय, डर रहे लोग लुगाई।
खड़ी हुई मुँह फाड़, बनी सुरसा मँहगाई।।

***

लाठी हो यदि हाथ में, तो यह समझें आप।
दूर रहेंगे आप से, कितने ही संताप।।
कितने ही संताप आपदा जायें घर से।
औरों की क्या बात, भूत भी भागें डर से।
‘ठकुरेला’ कविराय, गजब इसकी कद काठी।
झुक जाये बलवान, सामने हो जब लाठी।।

***

आता है उस काव्य में, मुझे अमित आनन्द।
जिसमें हो लय, गेयता, अर्थ, सरसता, छंद।।
अर्थ, सरसता, छंद, अलंकृत शब्द ढले हों।
कर दे मन को मुग्ध, काव्य में भाव भले हों।
‘ठकुरेला’ कविराय, सहज मन पर छा जाता।
पढ़कर सद्साहित्य, ओज जीवन में आता।।

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