काला टीका-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

काला टीका-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

उनके माथों पर
ज़हर बुझे त्रिशूल थे।
हाथों में
नश्तर, खंज़र, किरचें और बरछे
दिलों में विषैले पौधे थे।
विश्वविद्यालय की
दीवार फांद कर नहीं
अतिथियों की तरह आए
आमंत्रित नकाबपोश।

वे
पढ़ने-पढ़ाने वाले
पुस्तकें लिखने-लिखाने वाले
दिशा देखने-दिखाने वाले
रौशन चिरागों पर झपटे।

रात ने ये तांडव आँखों से देखा
लहूलुहान था चाँद
आंखें बंद थी तारों की
मटमैली सी सुबह
उगता सूरज शर्मिंदा था
दिन के माथे काला टीका देख कर।

आज उदास हैं पुस्तकें
सुबकते हैं हर्फ़
ज़ख्मी माथों पर पट्टियां हैं
और इस माहौल में
छिपती फिरती है
मेरी कविता शब्दों के पीछे।
बेबस परिंदे सी फड़फड़ाती
ढूंढती है हमनस्ल उडार
पर वो आर न पार
जाने कहां गए सब पवनसवार।

ये तो महज़ फ़िल्म का ट्रेलर है
पूरी फ़िल्म
निकट भविष्य में देख सकेंगे।

 

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