कायरता व साहस के बीच-भूरी-भूरी खाक-धूल -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

कायरता व साहस के बीच-भूरी-भूरी खाक-धूल -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

कायरता व साहस के–
जिन्दा हूँ बीच मैं,
पूनों और मावस की
निन्दा में मस्त रह,
सूरज और चन्दा से
बहुत-बहुत डरता हूँ !!
इसीलिए कभी-कभी
उँगली फिराने से
होंठ मुझे अपने ये
उस गोरी महिला के
बालदार होंठों-से लगते हैं,
जो महिला
कुलशील-प्रदर्शन हित
घर के कुछ सत्यों को ढांककर
अन्य के ‘तथ्यों’ का उद्घाटन करती है,
इसीलिए, स्वर को मैं यथा-साध्य
भद्रता की ललित
तडिल्लतायों में ऊँचा उठाता हुआ
आँखें लाल करके भी मुस्काता रहता हूँ ।

सभ्य हूँ, सुसंस्कृत हूँ
आरामकुर्सियाँ चार
डाल दालान में
मित्रों के सम्मुख मैं
नित्य सत्य बनता हूँ
उग्र बहुत बनता हूँ
(सूर्य की उपमा ध्वन्यर्थ भरी
चन्द्र-किरन-उत्प्रेक्षा-)
अनदेखे हिमालय की अर्थ-भरी
चित्रात्मक समीक्षा कर
सफलता का मोर-मुकुट
खूब पहन लेता हूँ
(संस्कृति की
व्याख्या का
लैसंस
पास मेरे है)

डरता हूँ पग-पग मैं,
डगमग है मति इतनी—-
आंखों में
उलट-पुलट होते है
मकान-घर-भवन सभी ।
(मिर्गी नित आती”’
ज्वलत् रक्त अग्नि ज्वाल लाल देख
गहन जल अथाह नील ताल देख
सिर इतना चकराता कि
अभी-अभी गिरूँगा मैं)

यद्यपि कर पाता मैं
अपने हित उन्नति के
लिए न कुछ
(बड़े-बड़े मगरमच्छ
चट करते बीच में
फेंके गये दाने जो मेरे हित)
फिर भी देहान्त तक
जीवन-आयोजना बनाता हूँ
और इसी अनबूझे धतूरे के
ज़हरीले नशे में हाय
मुर्गी के नपुंसक पंख फड़फड़ाता हुआ
उड़ता हूँ उस बौने वृक्ष तक
किन्तु लाल कलगी से अपने ही,
अकस्मात् डरकर मैं
वापिस ज़मीन पर सिहर उतर आता हूँ !!
अभी मुझे कई बार
देने हैं अंडे जो
दानव के पेट में विवश चले जायेंगे ।
बनेंगे न कभी मुर्ग-मुर्गी वे
और मुझे किसी एक
अनपेक्षित पल में ही
हाय ! हाय !
मृत्यु-कष्ट-ग्रस्त-त्रस्त होना है !!
चाकू कलेजे में
घुसेगा और
अंधेरे के सघन-पर्त-परदे में
सांस बन्द होगी ही ।

तब तक किन्तु
जीना है !!
साहस व कायरता
के बीच मुझे
ज़िन्दा ही रहना है !!
कल तक यदि रह सका मैं जीवित
एक और कविता लिख डालूँगा अनसोची अनकही ।

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