कायनात-२-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

कायनात-२-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

अपने”सन्तूरी”सितारे से अगर बात करूं
तह-ब-तह छील के आफ़ाक़ कि पर्तें
कैसे पहुंचेगी मेरी बात ये अफ़लाक के उस पर भला?
कम से कम “नूर की रफ़्तार”से भी जाए अगर
एक सौ सदियाँ तो ख़ामोश ख़लाओं से
गुजरने में लगेंगी
कोई माद्दा है मेरी बात में तो
“नून”के नुक्ते सी रह जाएगी “ब्लैक होल”गुजर के
क्या वो समझेगा?
मैं समझाऊंगा क्या?

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