कामना के थाल-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कामना के थाल-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

 

आ गया फागुन
सजाकर
कामना के थाल ।

चपल नयनों ने
लुटाया
फिर नया अनुराग,
चाह की
नव-कोंपलों से
खिल उठा मन-बाग़,

इंद्रधनुषी
आवरण में
मुग्ध हैं दिक्पाल ।

धरा के हर पोर को
छूने लगी
मधु गंध,
शिथिलता के
पक्ष में हैं
लाज के अनुबंध,

बांधते
आकर्षणों में
ये प्रकृति के जाल ।

पोटली में
बांधकर
नव- कल्पना का धन,
प्रेम की
पगडंडियों पर
दौड़ता है मन,

बांटता है
स्वप्न सुन्दर
यह बसंती काल ।

 

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