क़िस्मत !-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

क़िस्मत !-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

फूल कोमल, स्वच्छ तारा और पानीदार मोती,
ओस चंचल, अचल पाहन, हैं तुम्हारे सभी गोती;
सभी ने तुमसे लिया कुछ या सभी ने कुछ दिया है,
किन्तु क्या तुमने अनादर कभी इनका भी किया है ?

चूक मेरी ही बड़ी क्‍यों यदि तुम्हें जी दे दिया है,
और इतना बुरा क्या है, दर्द यदि तुमसे लिया है;
यदि उपेक्षा ही रही होती न थी मुझको बुराई,
जानते ही तुम नहीं रहती यही मुझको समाई ।

किन्तु तुम पहचानते भी हो मुझे यह जानता हूँ,
और तिस पर खिंच रहे उतने कि जितना तानता हैं:
स्नेह के नाते सभी, तुम तोड़ते ही जा रहे हो,
और जी में गाँठ दिन-दिन जोड़ते ही जा रहे हो !

फुल को तुमने कभी चूमा, कभी छाती लगाया,
और तारों ने कभी तो रात-भर तुमको जगाया,
ओस है बहलाव मन का और है श्रृंगार मोती,
हाय इनकी और मेरी कहीं क़िस्मत एक होती !
(मार्च, 1935)

 

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