क़ितयात  -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar part 3

क़ितयात  -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar part 3

अच्छी है कभी-कभी की दूरी भी सखी

अच्छी है कभी-कभी की दूरी भी सखी
इस तरह मुहब्बत में तड़प आती है
कुछ और भी वो चाहने लगते हैं मुझे
कुछ और भी मेरी प्यास बढ़ जाती है

अपने आईना-ए-तमन्ना में

अपने आईना-ए-तमन्ना में
अब भी मुझ को सँवारती है तू
मैं बहुत दूर जा चुका लेकिन
मुझ को अब तक पुकारती है तू

अब्र में छुप गया है आधा चाँद

अब्र में छुप गया है आधा चाँद
चाँदनी छ्न रही है शाखों से
जैसे खिड़की का एक पट खोले
झाँकता हो कोई सलाखों से

आ कि इन बद-गुमानियों की क़सम

आ कि इन बद-गुमानियों की क़सम
भूल जाएँ ग़लत-सलत बातें
आ किसी दिन के इंतिज़ार में दोस्त
काट दें जाग जाग कर रातें

आती है झिझक सी उनके आगे जाते

आती है झिझक सी उनके आगे जाते
वो देखते हैं कभी कभी तो ऐसे
घबरा के मैं बाँहों में सिमट जाती हूँ
लगता है कि मैं कुछ नहीं पहने जैसे

आँगन में खिले गुलाब पर जा बैठी

आँगन में खिले गुलाब पर जा बैठी
हल्की सी उड़ी थी उनके कदमों से जो धूल
गोरी थी कि अपने बालों में सजाने के लिये
चुपचाप से जाके तोड़ लाई वही फूल

इक नई नज़्म कह रहा हूँ मैं

इक नई नज़्म कह रहा हूँ मैं
अपने जज़बात की हसीं तहरीर
किस मोहब्बत से तक रही है मुझे
दूर रक्खी हुई तेरी तस्वीर

इक पल को निगाहों से तो ओझल हो जाऊँ

इक पल को निगाहों से तो ओझल हो जाऊँ
इतनी भी कहाँ सखी इजाज़त है मुझे
आवाज़ पे आवाज़ दिये जाएँगे
साड़ी का बदलना भी मुसीबत है मुझे

उफ़ ये उम्मीद-ओ-बीम का आलम

उफ़ ये उम्मीद-ओ-बीम का आलम
कौन से दिन मंढे चढ़ेगी बेल
हाए ये इंतिज़ार के लम्हे
जैसे सिगनल पे रुक गई हो रेल

कर चुकी है मिरी मोहब्बत क्या

कर चुकी है मिरी मोहब्बत क्या
तेरी बे-ए’तिनाइयों को मुआफ़
अक़्ल ने पूछना बहुत चाहा
कह सका दिल न कुछ भी तेरे ख़िलाफ़

ख़ुद हिल के वो क्या मजाल पानी पी लें

ख़ुद हिल के वो क्या मजाल पानी पी लें
हर रात बँधा हुआ है ये ही दस्तूर
सिरहाने भी चाहे भर के छागल रख दूँ
सोते से मगर मुझे जगायेंगे ज़रूर

जब जाते हो कुछ भूल के आ जाते हो

जब जाते हो कुछ भूल के आ जाते हो
इस बार मेरी शाल ही कर आए गुम
कहतीं हैं कि तुम से तो ये डर लगता है
इक रोज़ कहीं ख़ुद को न खो आओ तुम

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