क़ितआ-शायद-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia part 2

क़ितआ-शायद-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia part 2

हर तंज़ किया जाए हर इक तअना दिया जाए
हर तंज़ किया जाए हर इक तअना दिया जाए
कुछ भी हो पर अब हद्द-ए-अदब में न रहा जाए
तारीख़ ने क़ौमों को दिया है यही पैग़ाम
हक़ माँगना तौहीन है हक़ छीन लिया जाए

जो हक़ीक़त है उस हक़ीक़त से
जो हक़ीक़त है उस हक़ीक़त से
दूर मत जाओ लौट भी आओ
हो गईं फिर किसी ख़याल में गुम
तुम मिरी आदतें न अपनाओ

चाँद की पिघली हुई चाँदी में
चाँद की पिघली हुई चाँदी में
आओ कुछ रंग-ए-सुख़न घोलेंगे
तुम नहीं बोलती हो मत बोलो
हम भी अब तुम से नहीं बोलेंगे

मेरी अक़्ल-ओ-होश की सब हालतें
मेरी अक़्ल-ओ-होश की सब हालतें
तुम ने साँचे में जुनूँ के ढाल दीं
कर लिया था मैं ने अहद-ए-तर्क-ए-इश्क
तुम ने फिर बाँहें गले में डाल दीं

मैंने हर बार तुझ से मिलते वक़्त
मैंने हर बार तुझ से मिलते वक़्त
तुझ से मिलने की आरज़ू की है
तेरे जाने के ब’अद भी मैंने
तेरी ख़ुशबू से गुफ़्तुगू की है

जो रानाई निगाहों के लिए फ़िरदौस-ए-जल्वा है
जो रानाई निगाहों के लिए फ़िरदौस-ए-जल्वा है
लिबास-ए-मुफ़्लिसी में कितनी बे-क़ीमत नज़र आती
यहाँ तो जाज़बिय्यत भी है दौलत ही की पर्वर्दा
ये लड़की फ़ाक़ा-कश होती तो बद-सूरत नज़र आती

जो हक़ीक़त है उस हक़ीक़त से
जो हक़ीक़त है उस हक़ीक़त से
दूर मत जाओ लौट भी आओ
हो गईं फिर किसी ख़याल में गुम
तुम मिरी आदतें न अपनाओ

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