क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita, Part-1

क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

अब भी साज़ों के तार हिलते हैं
अब भी शाख़ों पे फूल खिलते हैं
तुम ने हम को भुला दिया तो क्या
अब भी राहों में चाँद मिलते हैं

अब मिरी हालत-ए-ग़मनाक पे कुढ़ना कैसा

अब मिरी हालत-ए-ग़मनाक पे कुढ़ना कैसा
क्या हुआ मुझ को अगर आप ने नाशाद किया
हादसा है मगर ऐसा तो अलमनाक नहीं
यानी इक दोस्त नय इक दोस्त को बर्बाद किया

आख़िरत का ख़याल भी साक़ी

आख़िरत का ख़याल भी साक़ी
बादा-ए-वहम का अयाग़ न हो
इस लिए बंदगी से हूँ बेज़ार
ख़ुल्द भी एक सब्ज़ बाग़ न हो

इक शिकस्ता से मक़बरे के क़रीब

इक शिकस्ता से मक़बरे के क़रीब
इक हसीं जूएबार बहती है
मौत कितनी मुदाख़लत भी करे
ज़िंदगी बे-क़रार रहती है

उरूस-ए-सुब्ह ने ली है मचल के अंगड़ाई

उरूस-ए-सुब्ह ने ली है मचल के अंगड़ाई
सबा की नरमी-ए-रफ़्तार है सुरूर-अंगेज़
ये वक़्त है कि इबादत का एहतिमाम करें
ख़ुलूस-ए-दिल से उछाल एक साग़र-ए-लबरेज़

एक रेज़ा तिरे तबस्सुम का

एक रेज़ा तिरे तबस्सुम का
उड़ गया था शराब-ख़ाने से
हौज़-ए-कौसर बना दिया जिस को
वाइज़ों ने किसी बहाने से

 

 

 

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