क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita, Part-2

क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita, Part-2

ऐ ख़राबात के ख़ुदावंदो

ऐ ख़राबात के ख़ुदावंदो
दस्त-ए-अल्ताफ़ को खुला रक्खो
जो मोहब्बत से चल के आ जाए
उस की उम्मीद को हरा रक्खो

ऐ गदागर ख़ुदा का नाम न ले

ऐ गदागर ख़ुदा का नाम न ले
इस से इंसाँ का दिल नहीं हिलता
ये है वो नाम जिस की बरकत से
अक्सर औक़ात कुछ नहीं मिलता

ऐ मिरा जाम तोड़ने वाले

ऐ मिरा जाम तोड़ने वाले
मैं तुझे बद-दुआ नहीं देता
मैं भी हूँ एक संग-दिल ताजिर
जो हुनर का सिला नहीं देता

और अरमान इक निकल जाता

और अरमान इक निकल जाता
इक कली हँस के और खिल जाती
काश इस तंग-दिल ज़माने से
इक हसीं शाम और मिल जाती

काफ़ी वसीअ सिलसिला-ए-इख़्तियार है

काफ़ी वसीअ सिलसिला-ए-इख़्तियार है
काफ़ी तवील मुद्दत-ए-अहद-ए-बहार है
मैं तेरा साथ दूँगा जहाँ तक तू चल सके
ऐ ज़िंदगी तू आप ही बे-ए’तिबार है

कितनी सदियों से अज़्मत-ए-आदम

कितनी सदियों से अज़्मत-ए-आदम
इज्ज़-ए-फ़ितरत पे मुस्कुराती है
जब मशिय्यत की कोई पेश न जाए
मौत का फ़ैसला सुनाती है

कौन है जिस ने मय नहीं चक्खी

कौन है जिस ने मय नहीं चक्खी
कौन झूटी क़सम उठाता है
मय-कदे से जो बच निकलता है
तेरी आँखों में डूब जाता है

ख़राबात-ए-मंज़िल गह-ए-कहकशाँ है

ख़राबात-ए-मंज़िल गह-ए-कहकशाँ है
वगर्ना हर इक चीज़ ज़ुल्मत-निशाँ है
लब-ए-माह-ओ-अंजुम पे साक़ी अज़ल से
तिरा ज़िक्र है या मिरी दास्ताँ है

खू-ए-लैल-ओ-नहार देखी है

खू-ए-लैल-ओ-नहार देखी है
तल्ख़ियों की बहार देखी है
ज़िंदगी के ज़रा से साग़र में
गर्दिश-ए-रोज़गार देखी है

गुल्सितानों में घूम लेता हूँ

गुल्सितानों में घूम लेता हूँ
बादा-ख़ानों में झूम लेता हूँ
ज़िंदगी जिस जगह भी मिल जाए
उस के क़दमों को चूम लेता हूँ

चलते चलते तमाम रस्तों से

चलते चलते तमाम रस्तों से
मस्त ओ मसरूर आ गए हैं हम
अब जबीं से नक़ाब उलट दीजे
शहर से दूर आ गए हैं हम

 

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