क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita, Part-4,

क़ितआ -अब्दुल हमीद अदम-Abdul Hameed Adam-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita, Part-4,

दिल की हस्ती बिखर गई होती

दिल की हस्ती बिखर गई होती
रूह के ज़ख़्म भर गए होते
ज़िंदगी आप की नवाज़िश है
वर्ना हम लोग मर गए होते

न ख़ुदा है न नाख़ुदा साथी

न ख़ुदा है न नाख़ुदा साथी
नाव को आप ही चलाना है
या बग़ावत से पार उतरना है
या रऊनत से डूब जाना है

नाख़ुदा किस लिए परेशाँ है

नाख़ुदा किस लिए परेशाँ है
कश्मकश ऐन कामयाबी है
गर किनारा नहीं मुक़द्दर में
क़स्र-ए-दरिया में क्या ख़राबी है

पर लगा कर उड़ेगा नाम तिरा

पर लगा कर उड़ेगा नाम तिरा
ले फ़क़ीरान-ए-मै-कदा की दुआ
ख़ूबसूरत मुग़न्निया! हँस कर
शाइरों को ज़रा शराब पिला

बहर-ए-आलाम बे-किनारा है

बहर-ए-आलाम बे-किनारा है
ज़ीस्त की नाव बे-सहारा है
रात अँधेरी है और मता-ए-उम्मीद
एक टूटा हुआ सितारा है

मरमरीं मरक़दों पे वक़्त-ए-सहर

मरमरीं मरक़दों पे वक़्त-ए-सहर
मय-कशी की बिसात गर्म करें
मौत के संग-दिल ग़िलाफ़ों को
साग़रों की खनक से नर्म करें

मायूस हो गई है दुआ भी जबीन भी

मायूस हो गई है दुआ भी जबीन भी
उठने लगा है दिल से ख़ुदा का यक़ीन भी
तस्कीं की एक साँस हमें बख़्श दीजिए
ये आसमाँ भी आप का और ये ज़मीन भी

माह-ओ-अंजुम के सर्द होंटों पर

माह-ओ-अंजुम के सर्द होंटों पर
हम-नशीं तज़्किरा है सदियों का
जाम उठा और दिल को ज़िंदा रख
आसमाँ मक़बरा है सदियों का

मिरे दिल की उदास वादी में

मिरे दिल की उदास वादी में
ग़ुंचा-हा-ए-मलूल खिलते हैं
गुल्सितानों पे ही नहीं मौक़ूफ़
जंगलों में भी फूल खिलते हैं

मुफ़लिसों को अमीर कहते हैं

मुफ़लिसों को अमीर कहते हैं
आब-ए-सादा को शीर कहते हैं
ऐ ख़ुदा! तेरे बा-ख़िरद बंदे
बुज़-दिली को ज़मीर कहते हैं

मैं रास्ते का बोझ हूँ मेरा न कर ख़याल

मैं रास्ते का बोझ हूँ मेरा न कर ख़याल
तू ज़िंदगी की लहर है लहरें उठा के चल
लाज़िम है मय-कदे की शरीअत का एहतिराम
ऐ दौर-ए-रोज़गार ज़रा लड़खड़ा के चल

मौत का सर्द हाथ भी साक़ी

मौत का सर्द हाथ भी साक़ी
मुझ को ख़ामोश कर नहीं सकता
साज़ का तार टूट सकता है
तार का सोज़ मर नहीं सकता

ये वो फ़ज़ा है जहाँ फ़र्क़-ए-सुब्ह-ओ-शाम नहीं

ये वो फ़ज़ा है जहाँ फ़र्क़-ए-सुब्ह-ओ-शाम नहीं
कि गर्दिशों में यहाँ ज़िंदगी का जाम नहीं
दयार-ए-पाक में मत पढ़ कलाम-ए-रूह-अफ़ज़ा
कि मक़बरों में ख़तीबों का कोई काम नहीं

रूह को एक आह का हक़ है

रूह को एक आह का हक़ है
आँख को इक निगाह का हक़ है
एक दिल मैं भी ले के आया हूँ
मुझ को भी इक गुनाह का हक़ है

वस्ल की शब है और सीने में

वस्ल की शब है और सीने में
एक मदहोश आग का रस है
आज सारे चराग़ गुल कर दो
आज अंधेरा बड़ा मुक़द्दस है

शाम है और पार नद्दी के

शाम है और पार नद्दी के
एक नन्हा सा बे-क़रार दिया
यूँ अँधेरे में टिमटिमाता है
जैसे कश्ती के डूबने की सदा

 

 

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