क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आया-होली कविता -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आया-होली कविता -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

क़ातिल जो मेरा ओढ़े इक सुर्ख़ शाल आया।
खा-खा के पान ज़ालिम कर होंठ लाल आया।
गोया निकल शफ़क़ से बदरे-कमाल आया।
जब मुंह में वह परीरू मल कर गुलाल आया।
एक दम तो देख उसको होली को हाल आया।1॥

ऐशो तरब का सामां है आज सब घर उसके।
अब तो नहीं है कोई दुनियां में हमसर उसके।
अज़ माहताब माही बन्दे हैं बेज़र उसके।
कल वक़्ते शाम सूरज मलने को मुंह पर उसके।
रखकर शफ़क़ के सरपर तश्ते गुलाल आया॥2॥

ख़ालिस कहीं से ताज़ी एक जाफ़रां मंगाकर।
मुश्को-गुलाब में भी मल कर उसे बसाकर।
शीशे में भर के निकला चुपके लगा छुपा कर।
मुद्दत से आरजू थी इक दम अकेला पाकर।
इक दिन सनम पे जाकर में रंग डाल आया॥3॥

अर्बाबेबज़्म फिर तो वह शाह अपने लेकर।
सब हमनशीन हस्बे दिलख़्वाह अपने लेकर।
चालाक चुस्त काफ़िर गुमराह अपने लेकर।
दस-बीस गुलरुखों को हमराह अपने लेकर।
यों ही भिगोने मुझको यह खुशजमाल आया॥4॥

इश्रत का उस घड़ी था असबाब सब मुहय्या ।
बहता था हुस्न का भी उस जा पे एक दरिया।
हाथों में दिलबरों के साग़र किसी के शीशा ।
कमरों में झोलियों में सेरों गुलाल बांधा।
और रंग की भी भर कर मश्को-पखाल आया॥5॥

अय्यारगी से पहले अपने तई छिपाकर।
चाहा कि मैं भी निकलूं उनमें से छट छटाकर।
दौड़े कई यह कहकर जाता है दम चुराकर।
इतने में घेर मुझको और शोरो गुल मचाकर।
उस दम कमर-कमर तक रंगो गुलाल आया॥6॥

यह चुहल तो कुछ अपनी किस्मत से मच रही थी।
यह आबरू की पर्दा हिर्फ़त से बच रही थी।
कैसा समां था कैसी शादी सी रच रही थी।
उस वक़्त मेरे सर पर एक धूम मच रही थी।
उस धूम में भी मुझको जो कुछ ख़याल आया॥7॥

लाजिम न थी यह हरकत ऐ खुश-सफ़ीर तुझको।
अज़हर है सब कहे हैं मिलकर शरीर तुझको।
करते हैं अब मलामत खुर्दो-कबीर तुझको।
लाहौल पढ़ के शैतां, बोला ”नज़ीर“ तुझको।
अब होली खेलने का पूरा कमाल आया॥8॥

 

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