कहो कैसे मन को समझा लूँ- भग्नदूत अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

कहो कैसे मन को समझा लूँ- भग्नदूत अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

कहो कैसे मन को समझा लूँ?
झंझा के द्रुत आघातों-सा, द्युति के तरलित उत्पातों-सा
था वह प्रणय तुम्हारा, प्रियतम!
फिर क्यों, फिर क्यों इच्छा होती बद्ध इसे कर डालूँ?

सान्ध्य-रश्मियों के उच्छ्वासों, ताराओं की कम्पित साँसों-सा
था मिलन तुम्हारा, प्रियतम!
फिर क्यों, फिर क्यों आँखें कहतीं, उर में इसे बसा लूँ?
उल्का कुल की रज परिमल-सी, जल-प्रपात के उत्थित जल-सी,
थी वह करुणा-दृष्टि तुम्हारी-
फिर क्यों, प्रियतम! अन्तर रोता युग-युग उस को पा लूँ?
कहो कैसे मन को समझा लूँ?

मार्च, 1932

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