कहीं मैं गुंचा हूं, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

कहीं मैं गुंचा हूं, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूं-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

कहीं मैं गुंचा हूं, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूं
कहीं गौहर हूं, अपनी मौज़ में मैं आप ग़लतां हूं

कहीं मैं साग़रे-गुल हूं, कहीं मैं शीशा-ए-मुल हूं
कहीं मैं शोरे-कुलकुल हूं, कहीं मैं शोरे-मसतां हूं

कहीं मैं जोशे-वहश्त हूं, कहीं मैं महवे-हैरत हूं
कहीं मैं आबे-रहमत हूं, कहीं मैं दाग़े-असीयां हूं

कहीं मैं बर्के-ख़िरमन हूं, कहीं मैं अब्रे-गुलशन हूं
कहीं मैं अशके-दामन हूं, कहीं मैं चशमे-गिरीयां हूं

कहीं मैं अक्ले-आरा हूं, कहीं मजनूने-रुसवां हूं
कहीं मैं पीरे-दाना हूं, कहीं मैं तिफ़ले-नादां हूं

कहीं मैं दस्ते-कातिल हूं, कहीं मैं हलके-बिस्मिल हूं
कहीं मैं ज़हरे-हलाहल हूं, कहीं मैं आबे-हैवां हूं

कहीं मैं सवरे-मौज़ूं हूं, कहीं मैं बैदे-मजनूं हूं
कहीं गुल हूं ‘ज़फ़र’ मैं, और कहीं ख़ारे-बियाबां हूं

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