कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाए-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाए-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाये
किनारे आ लगे उमरे-रवां या दिल ठहर जाये

अमौ कैसी कि मौजे-ख़ूं अभी सर से नहीं गुज़री
गुज़र जाये तो शायद बाजुए-कातिल ठहर जाये

कोई दम बादबाने-कशती-ए-सहबा को तह रक्खो
ज़रा ठहरो ग़ुबारे-ख़ातिरे-महफ़िल ठहर जाये

खुमे-साकी में जुज़ ज़हरे-हलाहल कुछ नहीं बाकी
जो हो महफ़िल में इस इकराम के काबिल ठहर जाये

हमारी ख़ामशी बस दिल में लब तक एक वकफ़ा है
य’ तूफ़ां है जो पल-भर बर-लबे-साहिल ठहर जाये

निगाहे-मुंतज़िर कब तक करेगा आईनाबन्दी
कहीं तो दशते-ग़म में यार का महमिल ठहर जाये

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