कहियै काहि जलाय हाय जो मो मधि बीतै-सुजानहित -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand 

कहियै काहि जलाय हाय जो मो मधि बीतै-सुजानहित -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand

कहियै काहि जलाय हाय जो मो मधि बीतै।
जरनि बुझै दुख जाल धकौं, निसि बासर ही तैं।
दुसह सुजान वियोग बसौं के संजोग नित।
बहरि परै नहिं समै गमै जियरा जितको तित।
अहो दई रचना निरखि रीझि खीझि मुरझैं सुमन।
ऐसी विरचि विरचिको कहा सरयौ आनंद धन।

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