कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही- शब्द-ੴ सतिगुर प्रसादि रागु सारंग महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही- शब्द-ੴ सतिगुर प्रसादि
रागु सारंग महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

कहा मन बिखिआ सिउ लपटाही ॥
या जग महि कोऊ रहनु न पावै इकि आवहि इकि जाही ॥1॥रहाउ॥
कां को तनु धनु संपति कां की, का सिउ नेहु लगाही ॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाही ॥1॥
तजि अभिमानु सरणि संतन गहु मुकति होहि छिन माही ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु सुखु सुपनै भी नाही ॥2॥2॥1231॥

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