कहाँ- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

कहाँ- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

तुम नहीं तो… प्रिय
समूची सृष्टि यह धूप-छाँह का
चितकबरा चलचित्र
न रेखा, न आकृति, न पहचान कोई
विक्षुब्ध समुद्र का चारों ओर व्याप्त
गहन गर्जन।
शब्द नहीं, कूक भी नहीं, न कोई गान
आँखें सिर्फ तुम्हें देखती, खोजतीं
हृदय में सिर्फ तुम्हारा नाम…धुन बहती।

कहाँ हो तुम ?…. प्रिय!
रेगिस्तान, रेत लहर में न कोई पगडण्डी
भटकता मन यहाँ
शून्य क्षितिज पर बिलखते
कभी तो उठते
आसमान भर घनघोर बवण्डर आशंका के।
आर्त हृदय का
गूंजता सुर तुम्हारे कानों में?
हे सुदूर,
तुम्हें पाकर पा लूँगा मैं खोए हुए अपने आपको,
तुम बोलो तो मृदु स्वर में
कहाँ हो तुम? प्रिय? कहाँ?
कहाँ?

रूपान्तर : ज्योत्स्ना मिलन

 

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