कवि-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

कवि-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

लोग मुझे पागल कहते हैं, मैं पागल ही कहलाता हूँ;
जीवन की सूनी घड़ियों से सूना जीवन बहलाता हूँ ।
चलती है अंगुली, लिखती है, लिख कर फिर बढ़-बढ़ जाती है;
काग़ज़ पर जो बूँद उतरती है सिर पर चढ़, चढ़ जाती है !

ओ मतवाली दुनिया, मेरा पागलपन तू क्‍या पहचाने,
कितने गीत बिखर जाते हैं मेरी झोली से अनजाने !
सरिता की गति में, कोयल की कुहू में, तरु के मर्मर में,
मधुपों के गुन्‌-गुन् गीतों में, झरनों के झर्‌ झर्‌ झर्‌ स्वर में;
गिरि की गहन कंदराओं में ये बसते हैं बन कर झाईं,
जड़ में, चेतन में पड़ती है मेरे गीतों की परछाईं !

मेरे यहाँ रहन रक्‍खी है युगों-युगों से युग की वाणी,
मेरे गीतों में बसती है सत्य-सुंदरी, माँ कल्याणी !
(अक्तूबर, 1934)

 

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