कवि की वेदना-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

कवि की वेदना-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

जीवन का आँचल मैला
खाते माटी, पीते जल विषैला।
कोमल हाथों से धरती का देते सीना चीर
दो टूक की ख़ातिर, बहा देते लहू जैसे नीर।
हर ऋतु का रख ध्यान, दे गेहूं, चावल, फसल, धान
नहीं आभास अपने जीवन का, नहीं उन्हें कोई अभिमान।
माटी से पैदा, माटी में गये बह, कलम उनकी जय कह।

तन फटा, वस्त्र उधड़ा
जीवन बिखरा, कफन गूदडा।
सड़क, घर, कल कारखाने में शोर के बीच
रात दिन खपते मुँह बंद रख और आँखें मींच।
जान लगाकर, मन लगाकर पाट रहे बाज़ार संस्थान
देश की उन्नति का मूल, मूल में छिपा जिंसके उत्थान।
धारा का हिस्सा होकर गये रह, कलम उनकी जय कह।

धरा भाँति धारण करती
सूर्य, चंद्र डोले भुजा में प्रण भरती।
लिखा भाग्य में उसके, मन देना, मनभर देना
सुषमा जिसकी त्याग, करुणा, प्रेम उसका गहना।
सारी सृष्टि, निखिल विश्व पर जिसका प्यार स्नेह भारी
विपत्ति में खिली, विसंगति में पली, अश्रुजल से पोषित नारी।
जिसके अंग-अंग में छिपा हुआ है नेह, कलम उनकी जय कह।

युग युग कलम चलाकर
धुंआ हुए लेखन दीप जलाकर।
जो गहरे घुस जाएं , सागर, धरती, अंबर में
जिनकी कल्पना का नहीं कोई सानी दिगंबर में।
काल चक्र से मुक्त हैं भाँति धरा, धारा, दिशा, तारे और रवि
आशा का पथ दिखलाते, अपनी आभा फैलाते समस्त कवि।
बिन मांगे मोल लेखन हर चुप्पी सह, कलम उनकी जय कह।

 

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