कवि की मृत्यु-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

कवि की मृत्यु-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

जब गीतकार मर गया, चाँद रोने आया,
चांदनी मचलने लगी कफ़न बन जाने को
मलयानिल ने शव को कन्धों पर उठा लिया,
वन ने भेजे चन्दन श्री-खंड जलाने को !

सूरज बोला, यह बड़ी रोशनीवाला था,
मैं भी न जिसे भर सका कभी उजियाली से,
रंग दिया आदमी के भीतर की दुनियां को,
इस गायक ने अपने गीतों की लाली से !

बोला बूढा आकाश, ध्यान जब यह धरता,
मुझमे यौवन का नया वेग जम जाता था।
इसके चिंतन में डुबकी एक लगाते ही,
तन कौन कहे,मन भी मेरा रंग जाता था।

देवों ने कहा, बड़ा सुख था इसके मन की
गहराई में डूबने और उतराने में।
माया बोली, मैं कई बार थी भूल गयी,
अपने ही गोपन भेद इसे बतलाने में !

योगी था, बोला सत्य, भागता मैं फिरता,
वह जान बढ़ाये हुए दौड़ता चलता था,
जब-तब लेता यह पकड़ और हंसने लगता,
धोखा देकर मैं अपना रूप बदलता था !

मर्दों को आई याद बांकपन की बातें,
बोले, जो हो, आदमी बड़ा अलबेला था।
जिसके आगे तूफ़ान अदब से झुकते हैं,
उसको भी इसने अहंकार से झेला था !

नारियां बिलखने लगीं, बांसुरी के भीतर
जादू था कोई अदा बड़ी मतवाली थी।
गर्जन में भी थी नमी, आग से भरे हुए,
गीतों में भी कुछ चीज रुलाने वाली थी !

वे बड़ी बड़ी आँखें आंसू से भरी हुई,
पानी में जैसे कमल डूब उतराता हो,
वह मस्ती में झूमते हुए उसका आना,
मानो, अपना ही तनय झूमता आता हो !

चिंतन में डूबा हुआ सरल भोला-भाला,
बालक था, कोई दिव्य पुरुष अवतारी था,
तुम तो कहते हो मर्द, मगर, मन के भीतर,
यह कलावंत हमसे भी बढ़कर नारी था।

चुपचाप जिन्दगी भर इसने जो जुल्म सहे,
उतना नारी भी कहाँ मौन हो सकती है ?
आँखों के आंसू मन के भेद जता जाते,
कुछ सोच समझ जिह्वा चाहे चुप रहती है !

पर, इसे नहीं रोने का भी अवकाश मिला,
सारा जीवन कट गया आग सुलगाने में,
आखिर,वह भी सो गया जिन्दगी ने जिसको,
था लगा रखा सोतों को छेड़ जगाने में !

बेबसी बड़ी उन बेचारों की क्या कहिये ?
चुपचाप जिन्हें जीवन भर जलना होता है,
ऊपर नीचे द्वेषों के कुंत तने होते,
बचकर उनको बेदाग़ निकलना होता है !

जाओ, कवि, जाओ मिला तुम्हे जो कुछ हमसे
दानी को उसके सिवा नहीं कुछ मिलता है,
चुन-चुन कर हम तोड़ते वही टहनी केवल,
जिस पर कोई अपरूप कुसुम आ खिलता है !

विष के प्याले का मोल और क्या हो सकता ?
प्रेमी तो केवल मधुर प्रीत ही देता है,
कवि को चाहे संसार भेंट दे जो, लेकिन,
बदले में वह निष्कपट गीत ही देता है !

आवरण गिरा, जगती की सीमा शेष हुई,
अब पहुँच नहीं तुम तक इन हा-हाकारों की,
नीचे की महफ़िल उजड़ गयी, ऊपर कल से
कुछ और चमक उठेगी सभा सितारों की।

(1952)

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