कवित्त-बरसि पिया के देस-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

कवित्त-बरसि पिया के देस-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

कान्ह कौं, कन्हाई के सखा सनेस दीजो, गोप-
गोपिका कुसल पै कुसल-छेम चाहतीं।
तुम तौ हिये तैं दूरि जानि ही न पाए, हम-
देखतीं, छकाबतीं, सुबैठि बतरावतीं।
आजुहू कदम्ब की सघन छाँह, कुञ्ज-पुंज,
गुंजति तिहारी, बाँसुरी की धुनि आवती।
तुम जौ भए दुःखी तौ, प्राननि तजैंगी स्याम,
करौ परतीति, सो तिहारी सौंह खावतीं।।
***
बाँसुरी बजाइबे में, लीन ह्वै रह्यौ जु, कान्ह!
बीतती हमारे हिरदै पै, सो न जानियै।
ठान जाइबे की, ठानि लीती, तौ न रोक्यौ जाइ-
मारग तिहारौ, जाहु बेगि लौटि आनियै।
राधिका खिस्याइ, नीर लाइ आँखि माँति माँहि,
फेरि मुख कह्यौ- ”नाथ एक बात मानियै“।
बाँसुरी बजाहु बेगि, स्रौन अकुलात, बेर-
‘मौंहन करौ न प्रान नेह रस सानियै’।।
***
सोहत करील-कुञ्ज, गुंजत मधुप-पुंज,
मंद-मंद, चंद मुस्कानि छिटकाबतौ।
भाबतौ न भाबतौ, पै गाबतौ सुगान कान्ह,
आपने करन लट आनि सुरझाबतौ।
टेरतौ भलैं न पैन, फेरतौ सलौने नैंन,
सैन न चलाबतौ, पै नेह सरसाबतौ।
‘संकर’ मनाबतौ न, बैठतौ कदम तर,
मान छाँड़ि देती, नैंकु बाँसुरी बजाबतौ।।

 

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