कविता होली पर-नज़ीर अकबराबादी part 3

कविता होली पर-नज़ीर अकबराबादी part 3

मिलने का तेरे रखते हैं हम ध्यान इधर देख

मिलने का तेरे रखते हैं हम ध्यान इधर देख।
भाती है बहुत हमको तेरी आन इधर देख।
हम चाहने वाले हैं तेरे जान! इधर देख।
होली है सनम, हंस के तो एक आन इधर देख।
ऐ! रंग भरे नौ गुले-खंदान इधर देख॥1॥

हम देखने तेरा यह जमाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
आये हैं यही करके ख़याल इस घड़ी ऐ जाँन!।
तू दिल में न रख हमसे मलाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
मुखड़े पे तेरे देख गुलाल इस घड़ी ऐ जाँन!।
होली भी यही कहती है ऐ जान! इधर देख॥2॥

अब ज़र्द यह चीरा जो तेरे सर पे जमा है।
और इस पे यह तुर्रा जो ज़री का भी धरा है।
नीमा भी तेरा रंग से केसर के भरा है।
पोशाक पे तेरी गुले सद बर्ग फ़िदा है।
नर्गिस तेरी आंखों पे है कु़र्बान इधर देख॥3॥

होली की तरब है जो हर इक जा में नमूदार।
सुनते हैं कहीं राग कहीं मै से हैं सरशार।
है दिल में हमें तो तेरी नज़रों से सरोकार।
पिचकारी हमारे तो लगा, या न लगा यार।
हमको तो फ़कत है यही अरमान इधर देख॥4॥

है धूम से होली के कहीं शोर, कहीं गुल।
होता नहीं टुक रंग छिड़कने में तअम्मुल।
दफ़ बजते हैं सब हंसते हैं और धूम है बिल्कुल।
होली की खुशी में तू न कर हमसे तग़ाफुल।
ऐ जाँन! हमारा भी कहा मान इधर देख॥5॥

है दीद की हर आन तलब दिल को हमारे।
जीते हैं फ़क़त तेरी निगाहों के सहारे।
हैं याँ जो खड़े आन के इस शौक़ के मारे।
हम एक निगाह के तेरे मुश्ताक़ हैं प्यारे।
टुक प्यार की नज़रों से मेरी जान! इधर देख॥6॥

हर चार तरफ़ होली की धूमें हैं अहा! हा!।
देखो जिधर आता है नज़र रोज़ तमाशा।
हर आन झमकता है अजब ऐश का चर्चा।
होली को ‘नज़ीर’ अब तू खड़ा देखे है यां क्या।
महबूब यह आया, अरे नादान इधर देख॥7॥

आ झमके ऐशो-तरब क्या क्या, जब हुश्न दिखाया होली ने

आ झमके ऐशो-तरब क्या क्या, जब हुश्न दिखाया होली ने।
हर आन खुशी की धूम हुई, यूं लुत्फ़ जताया होली ने।
हर ख़ातिर को ख़रसन्द किया, हर दिल को लुभाया होली ने।
दफ़ रंगी नक्श सुनहरी का, जिस वक्त बजाया होली ने।
बाज़ार गली और कूचों में गुल शोर मचाया होली ने॥1॥

या स्वांग कहूं, या रंग कहूं, या हुस्न बताऊं होली का।
सब अबरन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका।
हंस देना हर दम, नाज भरा, दिखलाना सजधज शोख़ी का।
हर गाली मिसरी, क़न्द भरी, हर एक कदम अटखेली का।
दिल शाद किया और मोह लिया, यह जीवन पाया होली ने॥2॥

कुछ तबले खड़के ताल बजे कुछ ढोलक और मरदंग बजे।
कुछ छड़पें बीन रबाबों की कुछ सारंगी और चंग बजे।
कुछ तार तंबूरों के झनके कुछ ढमढमी और मुहचंग बजे।
कुछ घुंघरू छनके छम-छम-छम कुछ गत-गत पर आहंग बजे।
है हर दम नाचने गाने का यह तार बंधाया होली ने॥3॥

हर जागह थाल गुलालों से खुश रंगत की गुलकारी है।
और ढेर अबीरों के लागे, सौ इश्रत की तैयारी है।
हैं राग बहारें दिखलाते और रंग भरी पिचकारी है।
मुंह सुखऱी से गुलनार हुए तन केसर की सी क्यारी है।
यह रूप झमकता दिखलाया यह रंग दिखाया होली ने॥4॥

पोशाकें छिड़कीं रंगों की और हर दम रंग अफ़्सानी है।
हर वक़्त खुशी की झमकें हैं पिचकारियों की रख़्शानी है।
कहीं होती है धींगा मुश्ती कहीं ठहरी खींचा तानी है।
कहीं लुटिया झमकती रंग भरी कहीं पड़ता कीचड़ पानी है।
हर चार तरफ खु़शहाली का यह जोश बढ़ाया होली ने॥5॥

हर आन खु़शी से आपस में सब हंस-हंस रंग छिड़कते हैं।
रुख़सार गुलालों से गुलगूं कपड़ों से रंग टपकते हैं।
कुछ राग और रंग झमकते हैं कुछ मै के जाम छलकते हैं।
कुछ कूदे हैं, कुछ उछले हैं, कुछ हंसते हैं, कुछ बकते हैं।
यह तौर ये नक़्शा इश्रत का, हर आन बनाया होली ने॥6॥

महबूब परीरू प्यारों की हर जानिब नोका झोंकी है।
कुछ आन रंगीली चलती है कुछ बान उधर से रोकी है।
कुछ सैनें तिरछी सहर भरी कुछ घात लगावट जो की है।
कुछ शोर अहा! हा! हा! हा! का कुछ धूम अहो! हो! हो! की है।
यह ऐश यह हिज यह काम, यह ढब, हर आन जताया होली ने॥7॥

माजूनों से रंग लाल हुए कहीं चलती मै की प्याली है।
कहीं साज तरब के बजते हैं दिल शादां मुंह पर लाली है।
सौ कसरत ऐश मुसर्रत की खुश वक़्ती और खुशहाली है।
कुछ बोली ठोली प्यार भरी, कुछ गाली है कुछ ताली है।
इन चर्चों का इन चुहलों का यह तार लगाया होली ने॥8॥

हैं क्या-क्या सर में रंग भरे और स्वांग भी क्या-क्या आते हैं।
कर बातें हर दम चुहल भरी, खुश हंसते और हंसाते हैं।
कुछ जोगी चेले बैठे हैं कुछ कामिनियों की गाते हैं।
कुछ और तरह के स्वांग बने कुछ नाचते हैं कुछ गाते हैं।
हर आन ‘नज़ीर’ इस फ़रहत का, सामान दिखाया होली ने॥9॥

आलम में फिर आई तरब उनवान से होली

आलम में फिर आई तरब उनवान से होली।
फ़रहत को दिखाती ही गई शान से होली।
रंगी हुई रंगों की फ़रावान से होली।
गुलगू है गुलालों की गुल अफ़्शान से होली।
झमकी तरबो ऐश के सामान से होली॥1॥

दफ़ बजने लगे हर कहीं गुल शोर की ठहरी।
गलियों में हुई खु़शदिली और कूंचों में खूबी।
यह नाच लगे होने कि दिल खु़श हुए और जी।
और राग खु़श आवाज हुए ऐसे कि जिनकी।
हर तान लगी खेलने हर कान से होली॥2॥

है फ़रहतो-इश्रत जो हर एक जा में फ़रावां।
चर्चे हैं बड़े धूम के चुहलें हैं नुमायां।
आये हैं तमाशे के लिए नाज़नी खू़बां।
होली का अजब हुस्न बढ़ाते हैं यह हर आं।
जब कहते हैं अपने लबे-ख़न्दांन से ‘होली’॥3॥

चेहरों पे गुलाल उनके लगा है जो बहुत सा।
आता है नज़र हुस्न का कुछ ज़ोर ही नक्शा।
है रंग में और रूप में झमका जो परी का।
देख उनकी बहारें यही कहते हैं अहा हा।
दुनियां में यह आई है परिस्तान से ‘होली’॥4॥

चमके हैं यह कुछ हुस्न परी चेहरों के ‘यारो’।
सब उनकी झमक देख के कहते हैं ‘उहो हो’।
फिरते हैं लगे चाहने वाले भी जो खुश हो।
पोशाक छिड़कवां से यह जाते हैं जिधर को।
वां उनके लगी फिरती है दामान से होली॥5॥

महबूबों में ठहरा है अजब होली का चर्चा।
जो रंग झमकता है पड़ा नाज़ो अदा का।
हर आन जताते हैं खड़े शोखि़यां क्या-क्या।
और पान जो खाते हैं तो वह पान भी गोया।
खेले हैं बुतों के लबो दन्दान से होली॥6॥

मुखड़े पे गुलाल आता है जिस दम नज़र उनके।
होते हैं निगाहों में अजब हुस्न के नक़्शे।
पिचकारियां हंस हंस के जो हर दम हैं लगाते।
वह हाथ हिंनाबस्ता भी कुछ मलते हैं ऐसे।
जो खेलें हैं आशिक़ के गिरीबान से होली॥7॥

वह शोख़ लिए रंग इधर जिस घड़ी आया।
फिर उस पे वही रंग बहुत हमने भी छिड़का।
उसने हमें और हमने उसे खू़ब भिगोया।
इस ऐश के नक़्शे को ‘नज़ीर’ आगे कहूं क्या।
हम खेले यह महबूब के एहसान से होली॥8॥

होली की बहार आई फ़रहत की खिलीं कलियां

होली की बहार आई फ़रहत की खिलीं कलियां।
बाजों की सदाओं से कूचे भरे और गलियां।
दिलबर से कहा हमने टुक छोड़िये छलबलियां।
अब रंग गुलालों की कुछ कीजिय रंग रलियां।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥1॥

है सब में मची होली अब तुम भी यह चर्चा लो।
रखवाओ अबीर ऐ जां! और मैय को भी मंगवाओ।
हम हाथ में लोटा लें तुम हाथ में लुटिया लो।
हम तुमको भिगो डालें तुम हमको भिगो डालो।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥2॥

है तर्ज जो होली की उस तर्ज़ हंसो-बोलो।
जो छेड़ हैं इश्रत की अब तुम भी वही छेड़ो।
हम डालें गुलाल ऐ जां! तुम रंग इधर छिड़को।
हम बोलें ‘अहा हा हा’ तुम बोलो “उहो हो हो”।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥3॥

इस दम तो मियां हम तुम इस ऐश की ठहरावें।
फिर रंग से हाथों में पिचकारियां चमकावें।
कपड़ों को भिगो डालें और ढंग कई लावें।
भीगे हुए कपड़ों से आपस में लिपट जावें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥4॥

हम छेड़ें तुम्हें हंस हंस, तुम छेड़ की ठहरा दो।
हम बोसे भी ले लेवें तुम प्यार से बहला दो।
हम छाती से आ लिपटें तुम सीने को दिखला दो।
हम फेकें गुलाल ऐ जां! तुम रंग को छलका दो।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥5॥

यह वक़्त खु़शी का है मत काम रखो रम से।
ले रंग गुलाल ऐ जां! और नाज़ की ख़म चम से।
हंस हंस के बहम लिपटें इस ऐश के आलम से।
हम ‘छोड़’ कहें तुमसे, तुम ‘छोड़’ कहो हमसे।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥6॥

कपड़ों पे जो आपस में अब रंग पड़े ढलकें।
और पड़के गुलाल ऐ जां! रंगीं हों भवें पलकें।
कुछ हाथ इधर तर हों कुछ भीगें उधर अलकें।
हर आन हंसे कूदें, इश्रत के मजे़ झलकें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥7॥

तुम रंग इधर लाओ और हम भी उधर आवें।
कर ऐश की तैयारी धुन होली की बर लावें।
और रंग से छीटों की आपस में जो ठहरावें।
जब खेल चुकें होली फिर सीनों से लग जावें।
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥8॥

इस वक़्त मुहैया है सब ऐशो-तरब की शै।
दफ़ बजते हैं हर जानिब और बीनो-रुबावो नै।
हो तुम में भी और हममें होली की है जो कुछ रै।
सुनकर यह ‘नज़ीर’ उसने हंस कर यह कहा ‘सच है।’
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियां॥9॥

 

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