कविता-हरजीत सिंह तुकतुक -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harjeet Singh Tuktuk Part 1

कविता-हरजीत सिंह तुकतुक -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harjeet Singh Tuktuk Part 1

 

तिरंगा

सात साल का, छोटा बच्चा,
बिना शर्ट के, फटी पैंट में,
ज़ोर ज़ोर से, चीख चीख के,
बेच रहा था, एक तिरंगा।

मुझ से बोला, ले लो बाबू,
इस से सस्ता, नहीं मिलेगा,
कहीं मिलेगा, सच कहता हूँ,
एक रुपए में, एक तिरंगा।

रफ़ कॉपी के ईक पन्ने पर,
हरा रंग था एक तरफ़।
और एक तरफ़,
केसरिया था ।

उन दोनो के बीच में बहता,
श्वेत रंग का दरिया था।
चक्र था मानो नियत कर रहा,
दूरी उनके बीच की ।

इक डंडी से जोड़ के उनको,
तस्वीर देश की खींच दी।

पत्नी बोली,
मिस्टर ढ़पोरशंख,
वो सब तो ठीक है।
पर झंडा ख़रीदा या नहीं।

हमने कहा, देवी बात यह नहीं है।
कि हमने झंडा ख़रीदा या नहीं।
बात यह है, कि यह बात,
ग़लत है या सही।

हम अपने भविष्य की ट्रेनिंग,
ठीक से नहीं कर पा रहे हैं।
हम बचपन से ही उसे,
तिरंगा बेचना सिखा रहे हैं।

 

कोविड

हमारा तो निकल गया रोना।
जब पता चला कि पड़ोसी को हो गया है कोरोना।
रात के अंधेरे में, सुबह और सवेरे में।
हम भी आ गए, शक के घेरे में।

हमने सबको यक़ीन दिलाया।
कि हम हैं सोबर और सुशील।
फिर भी करम जलों ने।
कर दिया हमारा घर सील।

हम इस बात से थे दुखी।
तभी पत्नी पास आके रुकी।
बोली घर में खतम हो गया हैं राशन।
हमने कहा देवी बंद करो यह भाषण।

पत्नी को नहीं पसंद आया हमारा टोन।
उठा के तोड़ दिया हमारा मोबाइल फ़ोन।
ग़ुस्से में उसका चेहरा हो गया लाल पीला।
पता नहीं, ग़रीबी में ही क्यों होता है आटा गीला।

अब हमें पत्नी के हुक्म का पालन करना था।
घर के लिए राशन का इंतज़ाम करना था।
हमने अपनी इज्जत खूँटी पे टांगी।
खिड़की से चिल्ला चिल्ला के सबसे मदद माँगी।

कोई नहीं आया।

जो भी कहते थे कि हम भगवान के दूत हैं।
बिना देखे ऐसे निकल गए जैसे हम कोई भूत हैं।
आख़िर एक बूढ़ा चौक़ीदार आया।
उसने घर के बाहर एक बोर्ड लगाया।

बोर्ड पे लिखा था,
साहब वैसे तो जेंटल हैं।
लॉकडाउन में हो गए मेंटल हैं।
इफ़ यू हीयर शोर,प्लीज़ इग्नोर।

हमने कहा,
भैया, आ रहा है मज़ा।
दूसरे के कर्मों की हमको दे के सजा।

वो बोला बाबूजी,
लाखों रोज़गार छोड़ कर चले गए घर।
हज़ारों बिना इलाज के कर रहे हैं suffer।
सैकड़ों रोज़ करते हैं भूख से लड़ाई।

वो सब भी इसी बात की दे रहे हैं दुहाई।
आख़िर किसकी गलती की सजा हमने है पाई।

बुरा मत मानिएगा,
बात सच्ची है, कड़वी लग सकती है।
पर किसी की गलती की सजा
किसी को भी मिल सकती है।

वैसे आपकी बताने आया था विद स्माइल।
आपके पड़ोसी की बदल गयी थी फ़ाइल।
हमने भगवान को लाख लाख धन्यवाद दिया।
और कविता का अंत कुछ इस तरह से किया।

पड़ोसी तो लग के आ गया
हॉस्पिटल की लाइन में।
हम अभी भी चल रहे हैं
क्वॉरंटाइन में।

 

दास बाबू

हमारे एक मित्र थे बहुत ख़ास।
नाम था राम इक़बाल दास।
यूँ तो पढ़े लिखे थे, MA पास थे,
स्कूल में पढ़ाते थे।

परंतु अक्सर ही हमें,
विचित्र से हालत में नज़र आते थे।
एक दिन तो बिना वजह ऐंठ गए।
जा के भूख हड़ताल पर बैठ गए।

कहने लगे
इराक़ में रहने वाली बकरियों को बचाएँ।
कोई अमरीकियों से कहिए,
कि इराक़ पर बम न बरसाएँ।

इस केस में हो गयी थी जेल।
हम ही कर के लाए थे उनकी बेल।
जानवरों से करते थे इतना प्यार,
कि मुसीबत में फँसते थे हर बार।

हाल ही में,
कुत्ते का पिल्ला गोद में उठाए भौंक रहे थे।
हर आने जाने वाले का रास्ता रोक रहे थे।

एक अजनबी से कहने लगे,
ख़ुदा का ख़ौफ़ खाओ।
भगवान के लिए,
इसे अपने घर ले जाओ।

वो बोला,
मिस्टर यह क्या सिलसिला है।
दास बाबू बोले,
यह कुत्ते का बच्चा हमें सड़क पे मिला है।

वो बोला,
ले तो जाऊँगा।
पर यह तो बताओ,
इसे खाना कहाँ से खिलाऊँगा।

महंगाई ने ऐसे तोड़ी है कमर।
बड़ी मुश्किल से चलता है घर।
मित्र व्यर्थ तुम्हारी यह क्रीड़ा है।
यहाँ नहीं समझता कोई तुम्हारी पीड़ा है।

अगर लोग इतने ही संवेदनशील होते।
तो कुत्ते छोड़ो,
इंसान के बच्चे फुटपाथ पे नहीं सोते।

तभी कुत्ते की माँ पिक्चर में आई।
उसने दास बाबू से नज़र मिलाई।
इसके बाद का मुश्किल देना है डाटा।
कि मैडम ने सर को कहाँ कहाँ काटा।

पर दास बाबू ना सुधरे हैं ना सुधरेंगे।
एक दिन कुछ तो अच्छा कर गुजरेंगे

 

दास बाबू का लव लेटर

सूरज दिन में चमक रहा है।
तू कहती है नाइट।
सही ग़लत मैं किसको पड़ना।
यू आर ऑल्वेज़ राइट।

तेरे स्विमिंग पूल से नैना।
हमको बस इनमे ही रहना।
डूब ना जाएँ, इसीलिए क्या,
कम रखी है हाइट।

सही ग़लत मैं किसको पड़ना।
यू आर ऑल्वेज़ राइट।

चिड़िया जितना पेट तेरा।
मोबाइल से कम वेट तेरा।
इसी लिए क्या कर रखी है,
फ़ास्ट फ़ूड से फ़ाइट।

सही ग़लत मैं किसको पड़ना।
यू आर ऑल्वेज़ राइट।

 

भड़ाम रस

राक़ेट से बोला यह बम,
आग लगते ही हो जाते हो सरगम।
एक बार ट्राई करो, लीग से हटो।
कभी तो मर्दों की तरह, ज़ोर से फटो।

राक़ेट बोला
यह तेरे पिछले कर्मों की सजा है।
कि आग लगाते ही भाड़ से फट जाता है।
बेटा फटने से कहीं ज़्यादा मज़ा
उड़ने में आता है।

इस डिस्कशन ने पकड़ा ज़ोर
ढेर सारे पटाखे इकट्ठे हो गए चहुं ओर।

बम बोला
मेरी आवाज़ से जग हिलता है।
राक़ेट बोला
मेरी आभा से नभ खिलता है।

इतने में ही वहाँ एक फुलझड़ी आई।
उसने दोनो की पूँछ में आग लगाई।

दो ही पल में,
सारा डिस्कशन सिमट गया।
एक बेचारा आसमान में उड़ गया।
दूसरा वहीं पड़ा पड़ा फट गया।

कविता का सार
फुलझड़ियों से बच के रहना।
यह ऐन वक्त पे दग़ा देती हैं।
कभी तो बम में लगा देती हैं आग।
कभी राक़ेट सा हवा में उड़ा देती हैं।

चुप बे

रात के बारह बजे थे।
हम गली के नुक्कड़ पर खड़े थे।
चारों तरफ सन्नाटा था।
हमारे हाथ में आटा था।

डर के मारे,
हमारी जान निकली जा रही थी।
गली में रहने वाले कुत्ते की,
स्पेसीफिकेशन याद आ रही थी।

गली में मिल जाये,
नुक्कड़ तक दौड़ाता था।
कभी कभी तो,
बोटी भी नोच खाता था।

हमनें गली में झांक कर,
गौर से गली का मुआयना किया।
फिर सावधानी पूर्वक,
गली में प्रवेश किया।

आधे रास्ते में पंहुच कर,
हमें वो महाकाल नज़र आया।
हमें देखते ही,
ज़ोर से गुर्राया।

हम जहां खड़े थे वहीं थम गये ।
हमारे पांचों तंत्र एक साथ जम गये।
हमारी हालत देख कर वो हौले से मुस्कराया।
फिर हमारे पास तक आया ।

बोला अबे यार क्या करता है।
आदमी होकर कुत्ते से डरता है।
जा निकल जा नहीं काटूंगा।
सच्ची बोलता हूं पैर भी नहीं चाटूंगा।

हमने कहा,
कुत्ता जी,
आप तो शक्ल से ही जैन्टलमैन नज़र आते हैं।
लोग बेकार में आपके बारे में उल्टी सीधी उड़ाते हैं।

और आपका नेचर तो इतना आला है।
वो बोला,
चुप बे !
इलेक्शन आने वाला है।

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