कविता -हंसराज रहबर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Hansraj Rahbar Part 2

कविता -हंसराज रहबर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Hansraj Rahbar Part 2

क्या चली क्या चली ये हवा क्या चली

क्या चली क्या चली ये हवा क्या चली
खौफ़ से कांप उठी बाग में हर कली

लोग-बाग आज हैं इस कदर बदहवास
ढूंढते हैं अपना घर इस गली उस गली

ढेर की ढेर फुटपाथ पर रेंगती
जिन्दगी दोस्तो ! लाश है अधजली

जुस्तजू जिस की थी ग़ैर वो ले गये
तुम उठा लाये हो सांप की केंचली

अर्श से फ़र्श तक यकबयक कौंधती
आग-सी इक सदा “दिल जली दिल जली”

कुछ अजब-सी बला जान पर आ बनी
शहर में गांव में मच गई खलबली

ये किस रहनुमा का करिश्मा है ‘रहबर’
देश भर का चलन बन गई धांधली

११-९-१९८९, दिल्ली

उनकी फितरत है कि वे धोखा करें

उनकी फितरत है कि वे धोखा करें
हम पे लाज़िम है कि हम सोचा करें।

बज़्म का माहौल कुछ ऐसा है आज
हर कोई यह पूछता है ‘‘क्या करें?’’

फिर जवां हो जाएं दिल की हसरतें
कुछ न कुछ ऐ हमनशीं ऐसा करें।

वो जो फ़रमाते हैं सच होगा मगर
हम भी अपनी सोच को ताज़ा करें।

जो हुआ मालूम सब मालूम है,
दोस्तों से किस तरह शिकवा करें।

घोंसले में कट रही है जिंदगी
कौन-सी परवाज़ का दावा करें।

शहर में सब नेक हैं, ‘रहबर’ बुरा
वे भला उसकी बुराई क्या करें।

(09-05-1988, दिल्ली)

उसका भरोसा क्या यारो वो शब्दों का व्यापारी है

उसका भरोसा क्या यारो वो शब्दों का व्यापारी है।
क्यों मुंह का मीठा वो न हो जब पेशा ही बटमारी है।

रूप कोई भी भर लेता है पांचों घी में रखने को,
तू इसको होशियारी कहता लोग कहें अय्यारी है।

जनता को जो भीड़ बताते मंझधार में डूबेंगे,
कागज़ की है नैया उनकी शोहरत भी अखबारी है।

सुनकर चुप हो जाने वाले बात की तह तक पहुंचे हैं,
कौवे को कौवा नहीं कहते यह उनकी लाचारी है।

पेड़ के पत्ते गिनने वालो तुम ‘रहबर’ को क्या जानो,
कपड़ा-लत्ता जैसा भी हो बात तो उसकी भारी है।

(11 अप्रैल 1976, सेण्ट्रल जेल, तिहाड़, दिल्ली)

पत्ते झड़ते हर कोई देखे लेकिन चर्चा कौन करे

पत्ते झड़ते हर कोई देखे लेकिन चर्चा कौन करे
रुत बदली तो कितनी बदली ये अंदाज़ा कौन करे

मन में जिसके खोट भरा है झूठ-कपट से नाता है
उनसे हमको न्याय मिलेगा ऐसी आशा कौन करे

सीधी अँगुली घी निकलेगा,आज तलक देखा न सुना
झूठे दावे करनेवालो, तुमसे झगड़ा कौन करे

बोल रहे इतिहास के पन्ने सीधी-सच्ची एक ही बात
धरती डाँवा-डोल हो जब कानून कि परवा कौन करे

ये चेहरे हैं इंसानों के कुछ तो अर्थ है ख़ामोशी का
सुनने वाले बहरे हैं बेकार का शिकवा कौन करे

अब हम भी हथियार उठाएँ भोलेपन में ख़ैर नहीं
राजमहल में डाकू बैठे उनसे रक्षा कौन करे

‘रहबर’ वह समय आ पहुँचा जब मरने वाले जीते हैं
ऐसे में क्या मौत से डरना, जीवन आशा कौन करे

बढ़ाता है तमन्ना आदमी आहिस्ता आहिस्ता

बढ़ाता है तमन्ना आदमी आहिस्ता आहिस्ता ।
गुज़र जाती है सारी ज़िंदगी आहिस्ता आहिस्ता ।

अज़ल से सिलसिला ऐसा है ग़ुंचे फूल बनते हैं,
चटकती है चमन की हर कली आहिस्ता आहिस्ता ।

बहार-ए-ज़िंदगानी पर ख़ज़ाँ चुपचाप आती है,
हमें महसूस होती है कमी आहिस्ता आहिस्ता ।

सफ़र में बिजलियाँ हैं, आंधियाँ हैं और तूफ़ाँ हैं,
गुज़र जाता है उनसे आदमी आहिस्ता आहिस्ता ।

हो कितनी शिद्दते-ए-ग़म वक़्त आख़िर पोंछ देता है,
हमारे दीदा-ए-तर की नमी आहिस्ता आहिस्ता ।

परेशाँ किसलिए होता है ऐ दिल बात रख अपनी
गुज़र जाती है अच्छी या बुरी आहिस्ता आहिस्ता ।

तबीयत में न जाने खाम ऐसी कौन सी शै है,
कि होती है मयस्सर पुख़्तगी आहिस्ता आहिस्ता ।

इरादों में बुलंदी हो तो नाकामी का ग़म अच्छा,
कि पड़ जाती है फीकी हर ख़ुशी आहिस्ता आहिस्ता ।

छुपाएगी हक़ीक़त को नमूद-ए-जाहिरी कब तक,
उभरती है शफ़क से रोशनी आहिस्ता आहिस्ता ।

ये दुनिया ढूँढ़ लेती है निगाहें तेज़ हैं इसकी
तू कर पैदा हुनर में आज़री आहिस्ता आहिस्ता ।

तख़य्युल में बुलन्दी और ज़बाँ में सादगी ‘रहबर’
निखर आई है तेरी शायरी आहिस्ता आहिस्ता ।

चाँदनी रात है जवानी भी

चाँदनी रात है जवानी भी,
कैफ़ परवर भी और सुहानी भी ।

हल्का-हल्का सरूर रहता है,
ऐश है ऐश ज़िन्दगानी भी ।

दिल किसी का हुआ, कोई दिल का,
मुख़्तसर-सी है यह कहानी भी ।

दिल में उलफ़त, निगाह में शिकवे
लुत्फ़ देती है बदगुमानी भी ।

बारहा बैठकर सुना चुपचाप,
एक नग़मा है बेज़बानी भी ।

बुत-परस्ती की जो नहीं कायल
क्या जवानी है वो जवानी भी ।

इश्क़ बदनाम क्यों हुआ ‘रहबर
कोई सुनता नहीं कहानी भी ।

(15 नवम्बर 1941, सेंट्रल जेल, संगरूर)

Leave a Reply