कविता -हंसराज रहबर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Hansraj Rahbar Part 1

कविता -हंसराज रहबर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Hansraj Rahbar Part 1

जी है जुगनू-सी ज़िंदगी हमने

जी है जुगनू-सी ज़िंदगी हमने
दी अँधेरों को रोशनी हमने ।

लब सिले थे ख़मोश थी महफ़िल
अनकही बात तब कही हमने ।

सच के बदले मिली जो बदनामी
वो भी झेली ख़ुशी-ख़ुशी हमने ।

ज़ख़्म पर जो नमक छिड़कते थे
उनसे कर ली थी दोस्ती हमने ।

जिसमें नफ़रत भरी जहालत थी
ख़ूब देखी है वह हँसी हमने ।

शक्ल-सूरत से आदमी थे वो
जिनको समझा था आदमी हमने ।

हर ज़बाँ पर है वाह वा ‘रहबर’
आँख देखी ग़ज़ल कही हमने ।

(15-07-1989, दिल्ली)

कांटों से घबराने वाले पग दो पग ही साथ चले

कांटों से घबराने वाले पग दो पग ही साथ चले
पिंजड़ों में है बन्द वे पंछी धूप से जिनके पंख जले

अपने देस के लोग हैं अपने जैसे भी हैं बुरे भले,
उन सांचों का रंग रूप हैं, जिन सांचों में ढले पले

मन का मन से मेल यही है प्रीत इसी को कहते हैं
राधा ने जब कृष्ण को देखा आंखों में सौ दीप जले

ॠषी मुनी तो बनवासी थे हम तुम नगर निवासी हैं
लेकिन अपना जीवन ये है घास उगी है पांव तले

बात बना लें लाख मगर ये उनके बस का रोग नहीं,
दलदल से वे क्या उभरेंगे डूब गये जो गले गले

और तो सब है इस बस्ती में एक फ़क़त विश्वास नहीं
छाछ फूंकते लोग यहां के दूध से उनके होंठ जले

कदम कदम पर मौत का खटका ग़ज़ल तुम्हारी कौन सुने
जुगत बता कोई ऐसी ‘रहबर’ जिससे आई बला टले

११-७-१९८५, दिल्ली

तअज्जुब है कि मकड़ी की तरह उलझा बशर होकर

तअज्जुब है कि मकड़ी की तरह उलझा बशर होकर
खुदा को ढूंढता फिरता है खुद से बेखबर होकर

अनलहक कह दिया जिसने खुदी से बाखबर होकर
सज़ा मंसूर की मंज़ूर करता है निडर होकर

अंधेरों में उजालों की हमें है जुस्तजू पैहम
गुज़ारी रात आंखों में सहर के मुंतज़र होकर

यहां सब धान इक भाओ चलन इक चापलूसी का
हिदायत है नज़र वालो रहो तुम बेनज़र होकर

वह इंसां भी क्या इंसां वज़न क्या बात में उसकी
गुज़ारी ज़िन्दगी जिसने ग़ुबारे-रह-गुज़र होकर

न जाओ इनकी बातों पे बड़े पुरकार हैं ये लोग
उगाते हाथ पे सरसों हवा के हमसफ़र होकर

छिपाकर सात परदों में जिसे तुम राज़ कहते हो
वो किस्सा अब ज़माने की ज़बां पर है खबर होकर

सुनो यारो हमारी बेगुनाही हो गई साबित
रहे बदनाम होकर जा रहे हैं नामवर होकर

ग़ज़ल तेरी तेरा मूंहबोलता किरदार है ‘रहबर’
उतर जाता है हर इक शेर दिल में नेश्तर होकर

१-७-१९८५, दिल्ली

तलाश करते हैं उसको जो हमनवा-सा था

तलाश करते हैं उसको जो हमनवा-सा था
हमें है याद वह चेहरा भला-भला-सा था

नज़र ढली है हमारी कुछ ऐसे सांचे में
कि रहज़न को भी देखा तो रहनुमा-सा था

तुम्हारे शहर में जिस हुक्मरां का चर्चा था
वो हुक्मरां भी सुना है कि बेहया-सा था

तो कौन आग थी जिसने ये कहर ढाया है
तमाम शहर में हर शख्स दिलजला-सा था

खता मुआफ़ कि हमको भी ये बात कहनी है
सुना जो आज तलक महज़ इक दिलासा था

पहाड़ हो कि नदी फांदते चले जाओ
यही तो जी में हमारे भी वलवला-सा था

तुम्हारी बात में ‘रहबर’ असर न क्यों होता
हर इक लफ़्ज तुम्हारा खरा-खरा सा था
९-१०-१९८३, दिल्ली

ताज़ा खबर सुनाई किसी ने

ताज़ा खबर सुनाई किसी ने
पर्वत पार किया चींटी ने

छीन लिया है दिन का उजाला
आधी रात की आज़ादी ने

घटना जाने कौन घटी है,
आह भरी बस्ती-बस्ती ने

ये तो क्या है ? इससे बड़े भी
भार सहे हैं इस धरती ने

सच्ची बात जो कहने निकले
हमसे न मिलाई आंख किसी ने

हम उनको कैसे समझाएं,
घूंट लहू के लगे जो पीने

ज़ख़्म छिपे हैं कितने कितने
तेरे सीने मेरे सीने

कहना था जो कह ही दिया है,
तेरे जी ने मेरे जी ने

माया मोह में फंस न जाना
बात कही थी एक ॠषी ने

रुके नहीं ये कदम कहीं भी
बढ़ते आए ज़ीने ज़ीने

लोग-बाग जब हंसने लगते,
आ जाते हैं तुम्हें पसीने

तूफ़ानों से डरने वाले
साहिल पे डुबो वे आए सफ़ीने

हंसता है दिन भर दीवाना
पागल शायद किया खुशी ने

‘रहबर’ को बस इतना जानें
उनकी ग़ज़ल सुनाई किसी ने

१८-१२-१९८२, दिल्ली

किस कदर गर्म है हवा देखो

किस कदर गर्म है हवा देखो
जिस्म मौसम का तप रहा देखो

बदगुमानी-सी बदगुमानी है
पास होकर भी फ़ासला देखो

वे जो उजले लिबास वाले है
उनकी आँखों में अज़दहा देखो

हो अंधेरा सफ़र, सफ़र ठहरा
ले के चलते है हम दिया देखो

खेलता है जो मौत से होली
क्या करेगा वो मनचला देखो

अम्न ही अम्न सुन लिया, लेकिन
मक़तलों का भी सिलसिला देखो

इस ज़माने में भी जी लिया ‘रहबर’
मर्दे-मोमिन का हौसला देखो

(01-05-1980, दिल्ली)

ज़ख्म हंस हंस के उठाने वाले

ज़ख्म हंस हंस के उठाने वाले
फन है जीने का सिखाने वाले
आज जब हिचकी अचानक आई
आ गये याद भुलाने वाले

बात को तूल दिए जाते हैं
झूठ का जाल बिछाने वाले
रहनुमा जितने मिले जो भी मिले
हाथ पर सरसों उगाने वाले

लो चले नींद की गोली देकर
वो जो आये थे जगाने वाले
वे जो मासूम नज़र आते हैं
आग भुस में हैं लगाने वाले

सांच को आंच नहीं है ‘रहबर’
मिट गये हमको मिटाने वाले ।

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