कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 1

कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 1

वर्षा ऋतु वर्णन

1 ‘सेनापति’ उनए गए जल्द सावन कै,

‘सेनापति’ उनए गए जल्द सावन कै,
चारिह दिसनि घुमरत भरे तोई के ।
सोभा सरसाने,न बखाने जात कहूँ भांति,
आने हैं पहार मानो काजर कै ढोइ कै ।
धन सों गगन छ्यों,तिमिर सघन भयो,
देखि न् परत मानो रवि गयो खोई कै ।
चारि मासि भरि स्याम निशा को भरम मानि,
मेरी जान, याही ते रहत हरि सोई कै ।

2 तीर तैं अधिक बारिधार निरधार महा,

तीर तैं अधिक बारिधार निरधार महा,
दारुन मकर चैन होत है नदीन कौ ।
होति है करक अति बदि न सिराति राति,
तिल-तिल बाढ़ै पीर पूरी बिरहिन कौं ।
सीरक अधिक चारों ओर अबनई रहै ना,
पाऊँरीन बिना क्यौं हूँ बनत धनीन कौं ।
सेनापति बरनी है बरषा सिसिरा रितु,
मूढ़न कौ अगम-सुगम परबीन कौं ।

3 दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै ।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै ।
सेनापति आवन कह्रों हैं मनभावन,
सुलाग्यो तरसावन विरह-जुर ज़ोर तै ।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन,
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै ।

तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार

तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार,
पुजवनहार मनोरथ चित चाहे के ।
यह जिय जानि ‘सेनापति है सरन आयो,
ुजिये सरन, महा पाप-ताप दाहे के ।
जो को कहौ, कि तेरे करम न तैसे, हम
गाहक हैं सुकृति, भगति-रस-लाहे के ।
आपने करम करि, हौं ही निबहौंगो तोपै,
हौं ही करतार, करतार तुम काहे के ।

 सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग

सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग,
गौरि अरधंग, जो अनंग प्रतिकूल है ।
देवन कौं मूल, ‘सेनापति अनुकूल, कटि
चाम सारदूल को, सदा कर त्रिसूल है ।
कहा भटकत! अटकत क्यौं न तासौं मन,
जातैं आठ सिध्दि, नव निध्दि रिध्दि तू लहै ।
लेत ही चढाइबे को, जाके एक बेलपात,
चढत अगाऊ हाथ, चारि फल-फूल है ।

 रावन को बीर ‘सेनापति रघुबीर जू की

रावन को बीर ‘सेनापति रघुबीर जू की,
आयो है सरन, छाँडि ताही मद अंध को ।
मिलत ही ताको राम, कोपि कै करी है ओप,
नाम जोय दुर्जन-दलन दीनबंध को ।
देखो दानबीरता, निदान एक दान ही में,
कीन्हें दोऊ दान, को बखानै सत्यसंध को ।
लंका दसकंधर की दीनी है बिभीषन को,
संका विभीषन की सो, दीनी दसकंध को ।

नवल किसोरी भोरी केसर ते गोरी

नवल किसोरी भोरी केसर ते गोरी, छैल-
होरी में रही है मद जोबन के छकि कै ।
चंपे कैसौ ओज, अति उन्नत उरोज पीन,
जाके बोझ खीन कटि जाति है लचकि कै ।
लाल है चलायौ, ललचाइ ललना कों देखि,
उघरारौ उर, उरबसी ओर तकि कै ।
’सेनापति’ सोभा कौ समूह कैसे कह्यौ जात,
रह्यौ हौ गुलाल अनुराग सों झलकि कै ।

तब न सिधारी साथ, मीड़त है अब हाथ

तब न सिधारी साथ, मीड़त है अब हाथ,
सेनापति जदुनाथ बिना दुख ए सहैं ।
चलैं मनोरंजन के, अंजन की भूली सुधि,
मंजन की कहा, उनहीं के गूँथे केस हैं ।
बिछुरैं गुपाल, लागै फागुन कराल तातें –
भई है बेहाल, अति मैले तन भेस हैं ।
फूल्यौ है रसाल, सो तौ भयौ उर साल,
सखी डार न गुलाल, प्यारे लाल परदेस हैं ।

केतो करौ कोई,पैए करम लिखोई ताते

केतो करौ कोई,पैए करम लिखोई, ताते,
दूसरी न होई,उर सोई ठहराईए ।
आधी ते सरस बीति गई बरस,अब
दुर्जन दरस बीच रस न बढाईए ।
चिंता अनुचित, धरु धीरज उचित,
सेनापति ह्वै सुचित रघुपति गुनगाईए ।
चारि बर दानि तजि पायँ कमलेच्छन के,
पायक मलेच्छन के कहे को कहलाईए ।

महा मोहकंदनि में जगत जकंदनि में

महा मोहकंदनि में जगत जकंदनि में,
दिन दुखदुंदनि में जात है बिहाय कै ।
सुख को न लेस है, कलेस सब भाँतिन को;
सेनापति याहीं ते कहत अकुलाय कै ।
आवै मन ऐसी घरबार परिवार तजौं,
डारौं लोकलाज के समाज विसराय कै ।
हरिजन पुंजनि में वृंदावन कुंजनि में ,
रहौ बैठि कहूँ तरवरतर जाई कै ।

बानि सौं सहित सुबरन मुँह रहैं जहाँ

बानि सौं सहित सुबरन मुँह रहैं जहाँ,
धरत बहुत भाँति अरथ समाज को ।
संख्या करि लीजै अलंकार हैं अधिक यामैं,
राखौ मति ऊपर सरस ऐसे साज को
सुनौ महाजन! चोरी होति चार चरन की,
तातें सेनापति कहै तजि उर लाज को ।
लीजियो बचाय ज्यों चुरावै नाहिं कोउ, सौंपी
वित्त की सी थाती में कवित्तन के ब्याज को ।

सेनापति उनए नए जलद सावन के

सेनापति उनए नए जलद सावन के
चारिहू दिसान घुमरत भरे तोय कै ।
सोभा सरसाने न बखाने जात कैहूँ भाँति
आने हैं पहार मानो काजर के ढोय कै ।
घन सों गगन छप्यो, तिमिर सघन भयो,
देखि न परत मानो रवि गयो खोय कै ।
चारि मास भरि स्याम निसा को भरम मानि,
मेरे जान याही तें रहत हरि सोय कै ।

 दूरि जदुराई सेनापति सुखदाई देखौ

दूरि जदुराई सेनापति सुखदाई देखौ,
आई ऋतु पावस न पाई प्रेमपतियाँ ।
धीर जलधार की सुनत धुनि धरकी औ,
दरकी सुहागिन की छोहभरी छतियाँ ।
आई सुधि बर की, हिए में आनि खरकी,
सुमिरि प्रानप्यारी वह प्रीतम की बतियाँ ।
बीती औधि आवन की लाल मनभावन की,
डग भई बावन की सावन की रतियाँ ।

राखति न दोषै पोषे पिंगल के लच्छन कौं

राखति न दोषै पोषे पिंगल के लच्छन कौं,
बुध कवि के जो उपकंठ ही बसति है ।
जोय पद मन कौं हरष उपजावति, है,
तजै को कनरसै जो छंद सरस्ति हैं ।
अच्छर हैं बिसद करति उषै आप सम,
जातएं जगत की जड़ताऊ बिनसति है ।
मानौं छबि ताकी उदबत सबिता की सेना-
पति कबि ताकि कबिताई बिलसति हैं ।

तुकन सहित भले फल कौं धरत सूधे

तुकन सहित भले फल कौं धरत सूधे,
दूरि कौं चलत जे हैं धीर जिय ज्यारी के ।
लागत बिबिध पच्छ सोहत है गुन संग,
स्रवन मिलत मूल कीरति उज्यारी के ।
सोई सीस धुनै जाके उर मैं चुभत नीके,
बेग बिधि जात मन मोहैं नरनारी के ।
सेनापति कबि के कबित्त बिलसत अति,
मेरे जान बान हैं अचूक चापधारी के ।

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