कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 3

कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 3

फूलन सों बाल की, बनाई गुही बेनी लाल

फूलन सों बाल की, बनाई गुही बेनी लाल,
भाल दीनी बेंदी, मृगमद की असित है ।
अंग-अंग भूषन, बनाइ ब्रभूषण जू,
बीरी निज करते, खवाई अति हित है ।
ह्वै कै रस बस जब, दीबे कौं महावर के,
‘सेनापति स्याम गह्यो, चरन ललित है ।
चूमि हाथ नाह के, लगाइ रही ऑंखिन सौं,
कही प्रानपति! यह अति अनुचित है ।

लाल-लाल टेसू, फूलि रहे हैं बिसाल संग

लाल-लाल टेसू, फूलि रहे हैं बिसाल संग,
स्याम रंग भेंटि मानौं मसि मैं मिलाए हैं ।
तहाँ मधु काज, आइ बैठे मधुकर-पुंज,
मलय पवन, उपबन-बन धाए हैं ।
‘सेनापति माधव महीना मैं पलास तरु,
देखि-देखि भाउ, कबिता के मन आए हैं ।
आधे अनसुलगि, सुलगि रहे आधे, मानौ,
बिरही दहन काम क्वैला परचाए हैं ।

केतकि असोक, नव चंपक बकुल कुल

केतकि असोक, नव चंपक बकुल कुल,
कौन धौं बियोगिनी को ऐसो बिकरालु है ।
‘सेनापति साँवरे की सूरत की सुरति की,
सुरति कराय करि डारतु बिहालु है ।
दच्छिन पवन ऐतो ताहू की दवन,
जऊ सूनो है भवन, परदेसु प्यारो लालु है ।
लाल हैं प्रवाल, फूले देखत बिसाल जऊ,
फूले और साल पै रसाल उर सालु हैं ।

बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि

बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं ।
तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी
छाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं ।
‘सेनापति’ नैक, दुपहरी के ढरत, होत
घमका बिषम, ज्यौं न पात खरकत हैं ।
मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,
घरी एक बैठि, कँ घामै बितवत हैं ।

 सेनापति ऊँचे दिनकर के चलत लुवैं

‘सेनापति’ ऊँचे दिनकर के चलत लुवैं,
नदी नद कुवें कोपि डारत सुखाइ कै ।
चलत पवन, मुरझात उपवन वन,
लाग्यो है तपन जारयो भूतलों तचाइ कै ।
भीषण तपत, रितु ग्रीष्म सकुच ताते,
सीरक छिपत तहखाननि में जाइकै ।
मानौ सीतकाल सीतलता के जमाइबे को,
राखे हैं बिरंचि बीज धरा में धराइ कै ।

चौरासी समान, कटि किंकिनी बिराजत है

चौरासी समान, कटि किंकिनी बिराजत है,
साँकर ज्यों पग जुग घूँघरू बनाइ है ।
दौरी बे सँभार, उर-अंचल उघरि गयौ,
उच्च कुच-कुंभ, मनु चाचरि मचाई है ।
लालन गुपाल, घोरि केसर कौ रंग लाल,
भरि पिचकारी मुँह ओर कों चलाई है ।
सेनापति धायौ मत्त काम कौ गयंद जानि,
चोप करि चंपै, मानों चरखी छुटाइ है ।

बालि को सपूत कपिकुल पुरहूत

बालि को सपूत कपिकुल पुरहूत,
रघुवीर जू को दूत धरि रूप विकराल को ।
युद्ध मद गाढ़ो पाँव रोपि भयो ठाढ़ो,
सेनापति बल बाढ़ो रामचंद्र भुवपाल को ।
कच्छप कहलि रह्यो, कुंडली टहलि रह्यो,
दिग्गज दहलि त्रास परो चकचाल को ।
पाँव के सुरत अति भार के परत भयो,
एक ही परत मिलि सपत पताल को ।

नाहीं नाहीं करै, थोडो माँगे सब दैन कहै

नाहीं नाहीं करै, थोडो माँगे सब दैन कहै,
मंगल को देखि पट देत बार बार है ।
जिनके मिलत भली प्रापति की घटी होति,
सदा शुभ जनमन भावै निरधार है ।
भोगी ह्वै रहत बिलसत अवनी के मध्य,
कन कन जोरै, दान पाठ परवार है ।
सेनापति वचन की रचना निहारि देखौ,
दाता और सूम दोउ कीन्हें इकसार है ।

 कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि

कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है ।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है ।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है ।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है ।

पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार

पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है ।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है ।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है ।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है ।

मूढ़न कौ अगम, सुगम एक ताकौ, जाकी

मूढ़न कौ अगम, सुगम एक ताकौ, जाकी,
तीछन अमल बिधि बुद्धि है अथाह की ।
कोई है अभंग, कोई पद है सभंग, सोधि,
देखे सब अंग, सम सुधा के प्रवाह की ।
ज्ञान के निधान , छंद-कोष सावधान जाकी,
रसिक सुजान सब करत हैं गाहकी ।
सेवक सियापति कौ, सेनापति कवि सोई,
जाकी द्वै अरथ कबिताई निरवाह की ।

लीने सुघराई संग सोहत ललित अंग

लीने सुघराई संग सोहत ललित अंग,
सुरत के काम के सुघर ही बसति है ।
गोरी नव रस रामकरी है सरस सोहै,
सूहे के परस कलियान सरसति है ।
सेनापति जाके बाँके रूप उरझत मन,
बीना मैं मधुर नाद सुधा बरसति है ।
गूजरी झनक-झनक माँझ सुभग तनक हम,
देखी एक बाला राग माला सी लसति है ।

कौल की है पूरी जाकी दिन-दिन बाढ़ै छवि

कौल की है पूरी जाकी दिन-दिन बाढ़ै छवि,
रंचक सरस नथ झलकति लोल है ।
रहैं परि यारी करि संगर मैं दामिनी सी,
धीरज निदान जाहि बिछुरत को लहै ।
यह नव नारि सांचि काम की सी तलबारि है,
अचरज एक मन आवत अतोल है ।
सेनापति बाहैं जब धारे तब बार-बार,
ज्यौं-ज्यौं मुरिजात स्यौं, त्यौं अमोल हैं ।

दोष सौ मलीन, गुन-हीन कविता है

दोष सौ मलीन, गुन-हीन कविता है,
तो पै, कीने अरबीन परबीन कोई सुनि है ।
बिन ही सिखाए, सब सीखि है सुमति जौ पै,
सरस अनूप रस रुप यामैं हुनि है ।
दूसन कौ करिकै कवित्त बिन बःऊषन कौ,
जो करै प्रसिद्ध ऐसो कौन सुर-मुनि है ।
रामै अरचत सेनापति चरचत दोऊ,
कवित्त रचत यातैं पद चुनि-चुनि हैं ।

तोरयो है पिनाक, नाक-पल बरसत फूल

तोरयो है पिनाक, नाक-पल बरसत फूल,
सेनापति किरति बखानै रामचंद्र की ।
लैकै जयमाल सियबाल है बिलोकी छवि,
दशरथ लाल के बदन अरविंद की ।
परी प्रेमफंद, उर बाढ़्यो है अनंद अति,
आछी मंद-मंद चाल,चलति गयंद की ।
बरन कनक बनी बानक बनक आई,
झनक मनक बेटी जनक नरिंद्र की ।

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