कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 2

कविता -सेनापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Senapati Part 2

शरद् ऋतु वर्णन

कातिक की राति थोरी थोरी सियराति ‘सेना
पति’ है सुहाति, सुकी जीवन के गन हैं ।
फूले हैं कुमुद फूली मलती सघन बन,
फूलि रहे तारे मानो मोती अगनन हैं ।
उदित बिमल चंद, चाँदनी छिटकि रही,
राम को तो जस अध उरध गगन हैं ।
तिमी हरन भयो सेट है नरन सब,
मानहु जगत छीरसागर मगन हैं ।

हेमन्त ऋतु वर्णन

सीत को प्रबल ‘सेनापति’ कोपि चढ्यो दल,
निबल अनल दूरि गयो सियराइ कै ।
हिम के समीर तेई बरखै बिखम तीर,
रही है गरम भौन-कोननि में जाइ कै ।
धूम नैन बहे, लोग होत हैं अचेत तऊ,
हिय सो लगाइ रहे नेक सुलगाइ कै ।
मानो भीत जानि महासीत सों पसारि पानि,
छतियाँ की छाँह राख्यो पावक छिपाइ कै ।

शिशिर ऋतु वर्णन

शिशिर मे ससि को, सरुप पवै सबिताऊ
घाम हू मे चांदनी की दुति दमकति है ।
“सेनापति” होत सीतलता है सहस गुनी,
रजनी की झाई, वासर मे झलकती है ।
चाहत चकोर, सुर ओर द्रग छोर करि,
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है ।
चन्द के भरम होत मोद हे कुमोदिनी को,
ससि संक पंकजिनी फुलि न सकति है ।

सिवजू की निध्दि, हनूमान की सिध्दि

सिवजू की निध्दि, हनूमान की सिध्दि,
बिभीषण की समृध्दि, बालमीकि नैं बखान्यो है ।
बिधि को अधार, चारयौ बेदन को सार,
जप यज्ञ को सिंगार, सनकादि उर आन्यो है ।
सुधा के समान, भोग-मुकुति-निधान,
महामंगल निदान, ‘सेनापति पहिचान्यो है ।
कामना को कामधेनु, रसना को बिसराम,
धरम को धाम, राम-नाम जग जान्यो है ।

आत्म-परिचय

दीक्षित परशुराम दादा हैं विदित नाम,
जिन कीन्हें जज्ञ, जाकी विपुल बड़ाई है ।
गंगाधर पिता गंगाधर के समान जाके,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है ।
महा जानमनि,विद्यादान हू में चिंतामनि,
हीरामन दीक्षित तें पाई पंडिताई है ।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई है ।

 वसंत ऋतु वर्णन

1 लाल लाल टेसू फूलि रहे हैं बिलास संग,

लाल लाल टेसू फूलि रहे हैं बिलास संग,
स्याम रंग मयी मानो मसि में मिलाए हैं ।
तहाँ मधु-काज आइ बैठे मधुकर पुंज,
मलय पवन उपवन – बन धाए हैं ।
‘सेनापति’ माधव महीना में पलाश तरु,
देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं ।
आधे अंग सुलगि सुलगि रहे, आधे मानो
विरही धन काम क्वैला परचाये हैं ।

2 धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,

धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,
उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है ।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ,
भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है ।
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब,
सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है ।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ,
बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है ।

ग्रीष्म ऋतु वर्णन

वृष को तरनि तेज सहसौ किरनि तपै,
ज्वालनि के जाल बिकराल बिरखत हैं ।
तपति धरनि जग झुरत झरनि,सीरी,
छाँह को पकरि पंथी-पंछी बिरमत हैं
‘सेनापति’ नेक दुपहरी ढरकत होत,
घमका बिखम जो न पात खरकत हैं ।
मेरे जान पौन सीरी ठौर को पकरि कोनौ,
घरी घरी बैठी कहूँ घाम बितवत हैं ।

Leave a Reply