कविता-सुरेन्द्र प्रजापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Surendra Prajapati Part 2

कविता-सुरेन्द्र प्रजापति -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Surendra Prajapati Part 2

कोहरा

जनवरी के इस कहर बरसाती ठंड में
जबकि कोहरे के भयंकर धातुई जबड़े
अपने पुरे वजुद के साथ
जिंदगी की जंग को परास्त कर
विजय गर्व से ठहाके लगा रहा है
सूर्य नतमस्तक हो दुबक गया है कहीं
पुरे-पुरे दिनभर के लिए
और मैं
कविता लिखने की जिद्द पर अड़ा हूँ

कपटी हवाएँ,
पुरे शरीर को झनझना रही है
संतुर की भांति
रक्त ठिठुर कर हलक में ही
जमने को विवश है
हड्डियां बिचुड़कर, कोई और ही शक्ल
ईजाद कर रहा है, जिंदगी का!

मैं कपकँपाते हुए जनतंत्र को
उजागर करना चाहता हूँ
पुरी दृढ़ता के साथ
उसके पाषाणी चेहरे-
विकृत मुखों को।
लेकिन निगुड़ी अंगुलियाँ आक्रांत है
*लेकिन* को पकड़ने से

षड्यंत्र रचते शब्द आ जा रहे हैं
लेकिन करूँ क्या?
मैं निःसहाय, निःश्वाश
अखबार के पन्ने
मुश्किल से ही देख पाता हूँ

एक इश्तहार झकझोरता है कि
सामान्य से सामान्य लोग
जिंदगी की जंग हार गए
बेआवाज, बेआबरू
दासता कहते-कहते

कैलेंडर

देखो, कैलेंडर में सिर्फ
तारीखें मत देखो
अपनी योजना देखो
विस्तार लेता संसार देखो

ये मत देखना
कि किन तारीखों में
तुम्हारा दुःस्वप्न, विपदा लाया था
किस माह, में तुम अपना
बाजी हार गया था

देखो, रोज तारीखें आती है
पुण्य, यश, कृति का
संवाद लाती है
किसी का जीत
किसी का हार अंकित है
उन्ही तिथियों में जीवन का
अनुराग संचित है

देखो, और विचार करो
प्रगति के चक्रों को भूलो मत
प्रकृति अपना कलेंडर टांग दिया
बसंत की बहार में
विपदाओं के हाहाकार में

सुनो, तुम कौन सा राग
लिख रहे हो इन दिनों
लिखो जीवन, सृजन करो
जिंदगी का काव्य, अमर वाक्य
क्योंकि इन्ही तारीखों में
गढ़ने होंगे प्रशस्तियाँ
उज्ज्वल रश्मियों का मार्ग

जीवन का कर्ज

संध्या समय में, जब घर लौटा
थकान, दर्द से विलाप करते
कुछ टुटे स्वप्नों, निराशाओं से हाथ मलते
निढाल ढोते निर्बल शरीर के साथ
अपनी साँसों को नियंत्रित कर रहा था

आसमान में पुरी चन्द्रमा
अपनी स्निग्ध शीतलता उड़ेल रही थी
मैं, उसके चंचल उजाले में बैठ
शीतल सुधामय वायु के साथ
अपने जख्मों को लगाना चाहा मलहम
ताकि प्राण लहरियों में फिर से
हरियाली आ जा सके

तभी, दरवाजे पर दस्तक हुआ
और मैं उस ओर थथम कर देखने लगा
उस महाजन को, जिसका मैं कर्जदार था
वह मुझे ऐसे घुर रहा था जैसे
उसके सबसे अनमोल धरोहर पर
मैं किसी घिनौने जीव की भांति
घात लगाए बैठा हूँ

मेरी आँखों में व्याप्त कातरता
उसके चेहरे पर उत्पन्न भर्त्सना में
थोड़ी सी मोहलत और याचना के
निर्बल, निःशब्द गुहार लगा रही थी
उसने तीखे शब्दों का प्रहार किया
मेरी विवशता थी, उसे स्वीकार किया
उसने अपशब्दों, कुशब्दों का चाबुक फेंका
मेरी दीनता थी, उसे मुक सुनता रहा
निर्लजों की तरह, पुरी हया को भुलकर

उसने कहा ‘कामचोर’
और मेरा कठोर श्रम
संघर्षों में ईमानदार पसीना बहाते
लहूलुहान होकर बिखर गया

मेरी वफादारी, मेरी विनम्रता
मेरी ही आत्मा से सवाल करने लगा
उद्धार हो जाओ,
साहुकार से, बेचारी किस्मत से
जिंदगी भी एक साहुकार है
उसका भी कर्ज चुकाने होंगे, बन्धु !

ग्राम-जीवन

मैं मलिन बस्तियों में गया
सड़ांध और बदबुदार
रोशनी को देखा
और जी भर कर रोया

वहाँ जीवन कैसे रचता है
अपना कौतुक?
उत्सुकता से ठहर कर
जानना चाहा

वहाँ गांव का गंवईपन
निर्लिप्त उज्ज्डता
गंवार और भोले-भाले
लोगों की आत्मीयता

कि वे रात्रि के पिछले प्रहर से ही
करते हैं, ईश्वर भजन
साझा करते हैं
एक दूसरे के सुख-दुःख

मिट्टी की सुगंध लिए
वायु की आत्ममुग्धता में
अपने हृदय की व्यथा को धोया
और मीठे स्वप्न में
मैं नींद भर सोया।

सड़कों पर आंदोलन

वे सड़कों पर हैं
आप महलों में हो
वे आंदोलन कर रहे हैं
बता रहे हैं,
मिट्टी में बहाए गए
अपने बदबूदार पसीने की
व्यथा-कथा

खपा दिए गए अपनी ऊर्जा,
संघर्ष की, विनम्र श्रधांजलि
बेदम दिनचर्चाओ के साथ
अपने विश्राम को स्वाहा करता
अपना स्वप्निल बसंत

भूख प्यास को होम करता
आज वह मांगता है कीमत
वाजिब हक, अपना अधिकार
तुम दे रहे हो तिरस्कार,
घृणा, त्रासदी का

फसल मुस्कुराया

देखो, भूमिपुत्र…!
उषा की बेला में
उम्मीद की लौ से सिंचित
मिट्टी में दुबका बीज
धरती की नमी को सोखकर
आकाश में हँस रहा है
तुम्हारे थकान को
उर्वरक का ताप दिखाकर
ऊसर में बरस रहा है

ऐ खेत के देवता…
तुम्हारी वेदना, तुम्हारा सन्ताप
बहते श्वेद कण का प्रताप
शख्त मिट्टी में मिलकर
ओस की बूंदों में सनकर
जगा रहा है कंठ का प्यास
उपज में सोंधी मिठास

आस की भूख सता रही है
कई-कई दिनों से निर्मित
आत्मा की फीकी मुस्कुराहट
जीवन का रहस्य बता रही है
कि कसैला स्वाद चखने वाला
चीख-हार कर, गम खानेवाला
बासमती धान का भात कैसे खाए
जिसपर संसद का कैमरा
फोकस करता है…
जिसपर शाही हुक्मरान
प्रबल राजनीत करता है…

मेरा क्या है साहब

मेरा क्या है साहब?
शरीर हमारा
श्रम हमारा
पसीना हमारा
थकान हमारी
पीड़ा हमारा
जख्म से बहते
खून पीव हमारा

सरकार आपका
खेत खलिहान आपका
विशाल दलान आपका
मेरा क्या है साहब?

दुर्दशा हमारा
दम तोड़ती अभिलाषा हमारी
छिन्न होता प्रकाश हमारा
व्यथा, दुःख, क्लेश हमारा
चीथड़ों में लिपटा वेश हमारा

हुकूमत आपका
सल्तनत आपका
जंजीरों का जकड़न
बेड़ियों का हुंकार आपका
मेरा क्या है साहब?

याचना हमारी
प्रार्थना हमारी
रातों जगते आँख में
सूजन हमारी
कटे परों से फड़फड़ाता
उम्मीद हमारा
खेत से गोदाम तक पहुंचाता
उपज का आस हमारा

फसल पर लगाया कीमत तुम्हारा
हुकूमत तुम्हारा
डंडे लाठी का प्रहार तुम्हारा
मेरा क्या है साहब?

प्रजा, सरकार चुनता है
अपना बहिष्कार चुनता है
सड़क से संसद तक
अपना संघर्ष बुनता है

देवता मलिन बस्तियों में

मुखौटा में युग का नायक है
शोर मत करना, कानाफूसी नहीं
असली चेहरों में लिपटा है ना
बोझिल उम्मिन्दो का आश लगाए
वही तो खलनायक है

रोना, गिड़गिड़ाना तो अपयश है
समृद्धि, शांति पर धब्बा है
वैभव की समाधि का
हास्यास्पद कलंक है
झूठ सच का बाजार का चलन हो गया
इस बाजार में सरपट दौड़ लगा दो
छल, कपट फरेब से तो
हस्तिनापुर सजा है
और न्याय का डंका बजा है

और एक तुम हो कि
सच का बाँसुरी फूक रहे हो
आदर्श, त्याग का मंगल गाकर
अपने दामन में ही थूक रहे हो

लेकिन देखो देवता मलिन बस्तियों में
खपा रहे हैं अपनी ऊर्जा को
बेतरतीब, जीते हुए सड़ांध पैदा कर रहे हैं
कहीं नंगे बदन ठंढ से कांप रहे हैं
और शाही सम्राट अपनी उपलब्धि का
सदाव्रत बाँट रहे हैं

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