कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 7

कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 7

स्मृतियाँ

क्या कहते हो? किसी तरह भी
भूलूँ और भुलाने दूँ?
गत जीवन को तरल मेघ-सा
स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ?

शान्ति और सुख से ये
जीवन के दिन शेष बिताने दूँ?
कोई निश्चित मार्ग बनाकर
चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ?

कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन
समझ नहीं पाती हूँ मैं
वही समझने एक बार फिर
क्षमा करो आती हूँ मैं।

जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर
पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं
मेरा निश्चित मार्ग यही है
ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं।

भूलो तो सर्वस्व ! भला वे
दर्शन की प्यासी घड़ियाँ
भूलो मधुर मिलन को, भूलो
बातों की उलझी लड़ियाँ।

भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को
आशाओं विश्वासों को
भूलो अगर भूल सकते हो
आंसू और उसासों को।

मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन
सुख या शांति नहीं होगी
यही बात तुम भी कहते थे
सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।

सुख को मधुर बनाने वाले
दुःख को भूल नहीं सकते
सुख में कसक उठूँगी मैं प्रिय
मुझको भूल नहीं सकते।

मुझको कैसे भूल सकोगे
जीवन-पथ-दर्शक मैं थी
प्राणों की थी प्राण ह्रदय की
सोचो तो, हर्षक मैं थी।

मैं थी उज्ज्वल स्फूर्ति, पूर्ति
थी प्यारी अभिलाषाओं की
मैं ही तो थी मूर्ति तुम्हारी
बड़ी-बड़ी आशाओं की।

आओ चलो, कहाँ जाओगे
मुझे अकेली छोड़, सखे!
बंधे हुए हो ह्रदय-पाश में
नहीं सकोगे तोड़, सखे!

मानिनि राधे

थीं मेरी आदर्श बालपन से
तुम मानिनि राधे
तुम-सी बन जाने को मैंने
व्रत-नियमादिक साधे ।।

अपने को माना करती थी
मैं वृषभानु-किशोरी।
भाव-गगन के कृष्णचन्द्र की
थी मैं चतुर चकोरी ।।

था छोटा-सा गाँव हमारा
छोटी-छोटी गलियां ।
गोकुल उसे समझती थी मैं
गोपी संग की अलियां ।।

कुटियों मे रहती थी, पर
मैं उन्हें मानती कुँजें ।
माधव का सन्देश समझती
सुन मधुकर की गुंजें ।।

बचपन गया, नया रंग आया
और मिला वह प्यारा ।
मैं राधा बन गयी, न था वह
कृष्णचन्द्र से न्यारा ।।

किन्तु कृष्ण यह कभी किसी पर
जरा पेम दिखलाता ।
लग जाती है आग
हृदय में, कुछ भी नहीं सुहाता ।।

खूनी भाव उठें उसके प्रति
जो हो प्रिय का प्यारा ।
उसके लिए हदय यह मेरा
बन जाता हत्यारा ।।

मुझे बता दो मानिनि राधे ।
प्रीति-रीति वह न्यारी ।
क्यों कर थी उस मनमोहन पर
अविचल भक्ति तुम्हारी ।।

तुम्हें छोड़कर बन बैठे जो
मथुरा-नगर-निवासी ।
कर कितने ही ब्याह, हुए जो
सुख-सौभाग्य-विलासी ।।

सुनतीं उनके गुण-गुण को ही,
उनको ही गाती थीं !
उन्हें याद कर सब कुछ भूली
उन पर बलि जाती थीं।।

नयनों के मृदु फूल चढातीं
मानस की मूरत पर ।
रहीं ठगी-सी जीवन भर
उस क्रूर श्याम-सूरत पर ।।

श्यामा कहलाकर, हो बैठी
बिना दाम की चेरी ।
मृदुल उमंगों की तानें थीं-
तू मेरा मैं तेरी ।।

जीवन का न्यौछावर हा हा !
तुच्छ उन्होनें लेखा ।
गये, सदा के लिए गये
फिर कभी न मुड़कर देखा ।।

अटल प्रेम फिर भी कैसा था
कह दो राधारानी !
कह दो मुझे जली जाती हूँ,
छोड़ो शीतल पानी ।।

ले आदर्श तुम्हारा, रह-रह
मैं मन को समझाती हूँ ।
किन्तु बदलते भाव न मेरे
शान्ति नहीं पाती हूँ ।।

मुन्ना का प्यार

माँ मुन्ना को तुम हम सबसे
क्यों ज्यादा करती हो प्यार ?
हमें भेज देतीं पढ़ने को
उसका करतीं सदा दुलार

उसे लिए रहती गोद में
पैरों हमें चलाती हो
हमें अकेला छोड़ उसे तुम
अपने साथ सुलाती हो

उसके रोने पर तुम अपने
काम छोड़ कर आती हो
किंतु हमारे रोने पर तुम
कितनी डाँट लगाती हो

माँ, क्या मुन्ना ही बेटा है
हम क्या नहीं तुम्हारे हैं?
सच कह दो माँ, उसी तरह
क्या तुम्हें नहीं हम प्यारे हैं?

तुम

कितनी बार बुलाया तुमको
दे दे सविनय आमंत्रण ।
फिर भी नहीं पसीजे तिल-भर
अरे निठुर तुम मेरे धन ।।

तूम चपला सी चमक दिखाकर
नीले नभ में छिप जाते ।
फिर ऊषा की लाली में आ
फूलों में मुसका जाते ।।

मन्द वायु लहरों के संग आ
छू जाते हो मेरा तन ।
वर्षा की बून्दों में मिल
शीतल कर जाते मेरा मन ।।

मेरी इस जीवित समाधि पर
बरसा जाते हो तुम फूल ।
बिखरा कर मृदु मुस्कानों का
हर ले जाते मेरा शूल ।।

किन्तु कहो कब तक खेलोगे
आंख मिचौनी तुम बेपीर ।
मेरा चंचल मन हो जाता
है अस्थिर अत्यंत अधीर ।।

नहीं सूझता मार्ग भूल जाती हूँ
धोखा खाती हूँ
कलियों में, भ्रमरावलियों में
तुम्हें ढूढ़न्ने जाती हूँ ।।

तुम मुझसे छिप-छिप-जाने क्यों
मुझे कलेश पहूँचाते हो ?
अरे प्राण ! किस लिए कहो
नाहक मुझको तरसाते हो ।।

जल समाधि

अति कृतज्ञ हूंगी मैं तेरी
ऐसा चित्र बना देना।
दुखित हृदय के भाव हमारे।
उस पर सब दिखला देना।।

प्रभु की निर्दयता, जीवों की
कातरता दरसा देना।
मृत्यु समय के गौरव को भी
भली-भांति झलका देना।।

भाव न बतलाए जाते हैं।
शब्द न ऐसे पाती हूं।
इसीलिए हे चतुर चितेरे!
तुझको विनय सुनाती हूं।।

देख सम्हलकर, खूब सम्हलकर
ऐसा चित्र बना देना।
सुंदर इठलाती सरिता पर
मंदिर-घाट दिखा देना।।

वहीं पास के पुल से बढ़कर
धारा तेज बहाना फिर।
चट्टान से टकराता-सा
भारी भंवर घुमाना फिर।।

उसी भंवर के निकट, किनारे
युवक खेलते हों दो-चार।
हंसते और हंसाते हों वे
निज चंचलता के अनुसार।।

किंतु उसी! धारा में पड़कर
तीन युवक बह जाते हों।
थके हुए फिर किसी शिला से
टकराकर रुक जाते हों।।

उनके मुंह पर बच जाने का
कुछ संतोष दिखा देना।
किंतु साथ ही घबराहट में
उत्कंठा झलका देना।।

गहरी धारा में नीचे अब
एक दृश्य यह दिखलाना।
रो-रो उसे बहा मत देना
कुशल चितरे! रुक जाना।।

धारा में सुंदर बलिष्ठ-तन
युवक एक दिखलाता हो।
क्रूर शिलाओं में फंसकर जो
तड़प-तड़प रह जाता हो।।

फिर भी मंद हंसी की रेखा
उसके मुंह पर दिखलाना।
नहीं मौत से डरता था वह,
हंस सकता था बतलाना।।

किंतु साथ ही धीरे-धीरे
बेसुध होता जाता हो।
क्षण-क्षण से सर्वस्व दीप का
मानो लुटता जाता हो।।

ऊपर आसमान में धुंधला-सा
प्रकाश कुछ दिखलाना।
उसी ओर से श्यामा तरुणी का
धीरे-धीरे आना।।

बिखरे बाल विरस वदना-सी
आंखे रोई-रोई-सी।
गोदी में बालिका लिए,
उन्मन-सी खोई-खोई-सी।।

आशा-भरी दृष्टि से प्रभु की
ओर देखती जाती हो।
दुखिया का सर्वस्व न लुटने
पावे, यही मनाती हो।।

इसके बाद चितेरे जो तू
चाहे, वही बना देना।
अपनी ही इच्छा से अंतिम
दृश्य वहां दिखला देना।।

चाहे तो प्रभु के मुख पर
कुछ करुणा-भाव दिखा देना।
अथवा मंद हंसी की रेखा,
या निर्लज्ज बना देना।।

(यह कविता नर्मदा नदी के
भंवर में फंसकर डूब जाने
वाले देवीशंकर जोशी की
मृत्यु पर लिखी गई है।)

स्वागत साज

ऊषे सजनि ! अपनी लाली से
आज सजा दो मेरा तन,
कला सिखा खिलने की कलिके
विकसित कर दो मेरा मन ।

हे प्रसून-दल ! अपना वैभव
बिखरा दो मेरे ऊपर,
मुझ-सी मोहक और न कोई
कहीं दिखायी दे भू पर ।।

माधव ! अपनी मनोमोहिनी
मधु-माया मुझ में भर दो,
पल भर को कर कृपा सजीले !
मुझ को भी सजिजत कर दो ।

अरी वेहंगिनी ! गर्वीली,
यो ऋतुपति के प्राणों की प्राण ।
हे कलकंठ ! सिखा दे पल भर
के ही लिए मुझे कल गान ।

अरी मयूरी ! नर्तन तेरा
मोहित करता है घन को,
मुझे सिखा दे कला, मोह लूँ
मैं अपने मन के धन को ।

सखि ! मेरे सौभाग्य सदन में
लाली छा जायेगी आज,
वे आयेंगे, मुझे सजा दो
दे दे कर तुम अपना साज ।

उस महान वैभव के आगे
मैं भी ठहर सकूँ क्षण-भर ।
उस विशालता के सम्मुख सखि !
मेरा भी कुछ हो क्षण-भर ।

शिशिर-समीर

शिशिर-समीरण, किस धुन में हो,
कहो किधर से आती हो ?
धीरे-धीरे क्या कहती हो ?
या यों ही कुछ गाती हो ?

क्यों खुश हो ? क्या धन पाया है ?
क्यों इतना इठलाती हो ?
शिशिर-समीरण ! सच बतला दो,
किसे ढूँढने जाती हो ?

मेरी भी क्या बात सुनोगी,
कह दूँ अपना हाल सखी ?
किन्तु प्रार्थना है, न पूछना,
आगे और सवाल सखी ।।

फिरती हुई पहुँच तुम जाओ,
अगर कभी उस देश सखी !
मेरे निठुर श्याम को मेरा
दे देना सन्देश सखी !

मिल जावें यदि तुम्हें अकेले,
हो ऐसा संयोग सखी !
किन्तु देखना वहाँ न होवें
और दूसरे लोग सखी !!

खूब उन्हें समझा कर कहना
मेरे दिल की बात सखी ।
विरह-विकल चातकी मर रही
जल-जल कर दिन रात सखी !!

मेरी इस कारुण्य दशा का
पूरा चित्र बना देना ।
स्वयं आँख से देख रही हो
यह उनको बतला देना !!

दरस-लालसा जिला रही है,
कह देना, समझा देना ।
नासमझी यदि कहीं हुई हो
तो उसको सुलझा देना ।।

कहना किसी तरह वे सोचें
मिलने की तदबीर सखी ।
सही नहीं जाती अब मुझसे
यह वियोग की पीर सखी ।।

चूर-चूर हो गया ह्रदय यह
सह-सह कर आघात सखी !
शिशिर-समीरण भूल न जाना ।
कह देना सब बात सखी ।।

मातृ-मन्दिर में

वीणा बज-सी उठी, खुल गये नेत्र
और कुछ आया ध्यान।
मुड़ने की थी देर, दिख पड़ा
उत्सव का प्यारा सामान॥

जिसको तुतला-तुतला करके
शुरू किया था पहली बार।
जिस प्यारी भाषा में हमको
प्राप्त हुआ है माँ का प्यार॥

उस हिन्दू जन की गरीबिनी
हिन्दी प्यारी हिन्दी का।
प्यारे भारतवर्ष -कृष्ण की
उस प्यारी कालिन्दी का॥

है उसका ही समारोह यह
उसका ही उत्सव प्यारा।
मैं आश्चर्य भरी आँखों से
देख रही हूँ यह सारा॥

जिस प्रकार कंगाल-बालिका
अपनी माँ धनहीना को।
टुकड़ों की मोहताज़ आजतक
दुखिनी सी उस दीना को॥

सुन्दर वस्त्राभूषण सज्जित,
देख चकित हो जाती है।
सच है या केवल सपना है,
कहती है रुक जाती है ।।

पर सुंदर लगती है, इच्छा
यह होती है कर ले प्यार ।
प्यारे चरणों पर बलि जाये
कर ले मन भर के मनुहार ।।

इच्छा प्रबल हुई, माता के
पास दौड़ कर जाती है ।
वस्त्रों को संवारती, उसको
आभूषण पहनाती है ।

उसी भांति आश्चर्य मोदमय,
आज मुझे झिझकाता है ।
मन में उमड़ा हुआ भाव बस,
मुंह तक आ रुक जाता है ।।

प्रेमोन्मत्ता होकर तेरे पास
दौड़ आती हूं मैं ।
तूझे सजाने या संवारने
में ही सुख पाती हूं मैं ।।

तेरी इस महानता में,
क्या होगा मूल्य सजाने का ?
तेरी भव्य मूर्ति को नकली
आभूषण पहनाने का ?

किन्तु हुआ क्या माता ! मैं भी
तो हूं तेरी ही सन्तान ।
इसमें ही संतोष मुझे है
इसमें ही आनन्द महान ।।

मुझ-सी एक एक की बन तू
तीस कोटि की आज हुई ।
हुई महान, सभी भाषाओं
की तू ही सरताज हुई ।।

मेरे लिए बड़े गौरव की
और गर्व की है यह बात ।
तेरे ही द्वारा होवेगा,
भारत में स्वातंत्रय-प्रभात ।।

असहयोग पर मर-मिट जाना
यह जीवन तेरा होगा ।
हम होंगे स्वाधीन, विश्व का
वैभव धन तेरा होगा ।।

जगती के वीरों-द्वारा
शुभ पदवन्दन तेरा होगा !
देवी के पुष्पों द्वारा,
अब अभिनन्दन तेरा होगा ।।

तू होगी आधार, देश की
पार्लमेण्ट बन जाने में ।
तू होगी सुख-सार, देश के
उजड़े क्षेत्र बसाने में ।।

तू होगी व्यवहार, देश के
बिछड़े हृदय मिलाने में ।
तू होगी अधिकार, देशभर
को स्वातंत्रय दिलाने में ।।

मेरी प्याली

अपने कविता-कानन की
मैं हूँ कोयल मतवाली
मुझ से मुखरित हो गाती
उपवन की डाली-डाली ।

मैं जिधर निकल जाती हूँ
मधुमास उतर आता है।
नीरस जन के जीवन में
रस घोलघोल जाता है।

सूखे सुमनों के दल पर
मैं मधु-संचालन करती।
मैं प्राणहीन का अपने
प्राणों से पालन करती ।

मेरे जीवन में जाने
कितना मतवालापन है ।
कितने हैं प्राण छलकते
कितना मधु-मिश्रित मन है !

दोनों हाथों से भर-भर
मैं मधु को सदा लुटाती ।
फिर भी न कमी होती है
प्याली भरती ही जाती

मनुहार

क्यों रूठे हो, क्या भूल हुई,
किसलिए आज हो खिन्न हुए?
जो थे अभिन्न दो हृदय देव,
वे आज कहो क्यों भिन्न हुए?

सुख की कितनी अतुलित घड़ियां
हमने मिल साथ बिताई हैं।
कितनी ही कठिन समस्याएं
हमने मिलकर सुलझाई हैं।

मिल बैठे दोनों जहां कहीं
संसार हमारा वहीं हुआ
था स्वर्ग तुच्छ इन आंखों में
यदि एक वहां पर नहीं हुआ

तुम थे मेरे सर्वस्व और मैं
जीवन–ज्योति तुम्हारी थी
मैं तुममें थी, तुम मुझ में थे,
हम दोनों की गति न्यारी थी।

है ज्ञात मुझे सौ–सौ मेरे
अपराध क्षमा करते थे तुम
मेरी कितनी त्रुटियों पर भी
कुछ ध्यान नहीं धरते थे तुम

फिर क्या अपराध हुआ जिससे
रूखा व्यवहार तुम्हारा है?
उन अपराधों से क्या कोई
अपराध इस समय न्यारा है।

बोलो, अब कृपा करो, कह दो,
कह दो, अब रहा नहीं जाता
यह मौन तुम्हारा हे मानी,
मुझ से अब सहा नहीं जाता

हंसती हूं, बातें करती हूं
खाती–पीती हूं, जीती हूं
यह पीर छिपाए अंतर में
चुपचाप अश्रु–कण पीती हूं।

यह मर्म–कथा अपनी ही है
औरों को नहीं सुनाऊंगी
तुम रूठो सौ–सौ बार तुम्हें
पैरों पड़ सदा मनाऊंगी !

बस, बहुत हो चुका, क्षमा करो,
अवसाद हटा दो अब मेरा
खो दिया जिसे मद में मैंने
लाओ, दे दो वह सब मेरा।

प्रिय ! हृदय–देश में फिर अपने
जम जाने दो आसन मेरा
बन जाने दो रानी फिर से
दे दो, दे दो शासन मेरा

दे दो सुख का साम्राज्य मुझे,
दोनों दिल फिर मिल जाने दो
मुरझाई जाती आशा की
कलियों को फिर खिल जाने दो

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