कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 6

कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 6

स्वदेश के प्रति

आ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ,
स्वागत करती हूँ तेरा।
तुझे देखकर आज हो रहा,
दूना प्रमुदित मन मेरा।

आ, उस बालक के समान
जो है गुरुता का अधिकारी।
आ, उस युवक-वीर सा जिसको
विपदाएं ही हैं प्यारी।

आ, उस सेवक के समान तू
विनय-शील अनुगामी सा।
अथवा आ तू युद्ध-क्षेत्र में
कीर्ति-ध्वजा का स्वामी सा।

आशा की सूखी लतिकाएं
तुझको पा, फिर लहराईं।
अत्याचारी की कृतियों को
निर्भयता से दरसाईं।

 विदाई

कृष्ण-मंदिर में प्यारे बंधु
पधारो निर्भयता के साथ।
तुम्हारे मस्तक पर हो सदा
कृष्ण का वह शुभचिंतक हाथ।

तुम्हारी दृढ़ता से जग पड़े
देश का सोया हुआ समाज।
तुम्हारी भव्य मूर्ति से मिले
शक्ति वह विकट त्याग की आज।

तुम्हारे दुख की घड़ियाँ बनें
दिलाने वाली हमें स्वराज्य।
हमारे हृदय बनें बलवान
तुम्हारी त्याग मूर्ति में आज।

तुम्हारे देश-बंधु यदि कभी
डरें, कायर हो पीछे हटें,
बंधु! दो बहनों को वरदान
युद्ध में वे निर्भय मर मिटें।

हजारों हृदय बिदा दे रहे,
उन्हें संदेशा दो बस एक।
कटें तीसों करोड़ ये शीश,
न तजना तुम स्वराज्य की टेक।

रामायण की कथा

आज नहीं रुक सकता अम्मां
जाऊंगा मैं बाहर
रामायण की कथा हो रही
होगी सरला के घर ।

मेरे ही आगे उसके घर
आया था हलवाई
पूजा में प्रसाद रखने को
वह दे गया मिठाई ।

पूजा हो जाने पर बंटता
है प्रसाद मनमाना
चाहो तो प्रसाद लेने को
मां तुम भी आ जाना ।

क्या कहती हो अभी धूप है
अभी न बाहर जाऊं

यह क्या मां, जब अभी
जा रहे थे काका जी बाहर
तब भी तो थी धूप गए थे
वे भी तो नंगे सर ।

उन्हें नहीं रोका था तुमने
मुझे रोकती जातीं
यही तुम्हारी बात समझ में
कभी न मेरे आती ।

वे किसलिए कचहरी में मां
रोज धूप में जाते
कुछ भी उन्हें न कहतीं वे तो
बहुत शाम को आते ।

मैं जब कभी काम पड़ने पर
भी हूँ बाहर जाता
नहीं शाम भी होने पाती
जल्द लौट कर आता ।

तब भी मुझको रोका करतीं
मां तुम कितनी भोली
नहीं खेलने जाता हूँ मैं
गुल्ली डंडा गोली ।

काका जी की तरह न अम्मां
देर लगाऊंगा मैं
कथा हुई फिर क्या, प्रसाद
लेकर आ जाऊँगा मैं ।

तो घंटा बज उठा, हो गई
अम्मां मुझको देरी
वह देखो, आ रही बुलाने
मुझको सरला मेरी ।

लोहे को पानी कर देना

जब जब भारत पर भीड़ पड़ी, असुरों का अत्याचार बढ़ा,
मानवता का अपमान हुआ, दानवता का परिवार बढ़ा ।
तब तब हो करुणा से प्लावित करुणाकर ने अवतार लिया,
बनकर असहायों के सहाय दानव-दल का संहार किया ।

दुख के बादल हट गये, ज्ञान का चारों ओर प्रकाश दिखा,
कवि के उर में कविता जागी, ऋषि-मुनियों ने इतिहास लिखा ।
जन-जन में जागा भक्ति-भाव, दिशि-दिशि में गूंजा यशोगान,
मन-मन में पावन प्रीति जगी, घर-घर में थे सब पुण्यवान ।

सतयुग त्रेता देता बीता, यश-सुरभि राम की फैलाता,
द्वापर भी आया, गया, कृष्ण की नीति-कुशलता दरशाता ।
कलियुग आया, जाते-जाते उसके गांधी का युग आया,
गांधी की महिमा फैल गयी, जग ने गांधी का गुण गाया ।

कवि गद्गद् हो अपनी-अपनी श्रद्धांजलियां भर-भर लाये
रोमा रोलां रवि ठाकुर ने उल्लसित गीत यश के गाये ।
इस समारोह में रज-कण-सी मैं क्या गाऊँ ? कैसे गाऊँ ?
इतनी विभूतियों के सम्मुख घबराती हूं कैसे जाऊँ ?

दुनिया की सब आवाजों से जो ऊपर उठ-उठ जाती है,
लोहे से लोहा बजने की आवाज उस तरफ आती है ।
विज्ञान ज्ञान की परिधि आज अब नहीं किसी बन्धन में है,
लोहे को पानी कर देना

उस ओर साधना है ऐसी इस ओर अशिक्षित और अजान,
फावड़ा और कुदालवाले मजदूर और भोले किसान ।
आशा करते थे एक रोज वह अवतारी जरूर आवेगा,
आसुरी कृत्य करके समाप्त फिर नई दुनिया बसावेगा ।
पर किसे ज्ञात था जग में वह अवतरित हो चुका ज्ञानी,
जिसके तप बल से फुंकें सभी दुनिया के ज्ञानी-विज्ञानी ।

विजयादशमी

विजये ! तूने तो देखा है
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुना का धाम सखी !

वनवासी असहाय और फिर
हुआ विधाता वाम सखी ।
हरी गई सहचरी जानकी
वह व्याकुल घनश्याम सखी !

कैसे जीत सका रावण को
रावण था सम्राट सखी !
सोने की लंका थी उसकी
सजे राजसी ठाट सखी !

रक्षक राक्षस सैन्य सबल था
प्रहरी सिंधु विराट सखी !
नर ही नहीं, देव डरते थे
सुन कर उसकी डांट सखी !

राम-समान हमारा भी तो
रहा नहीं अब राज सखी !
राजदुलारों के तन पर हैं
सजे फकीरी साज सखी !

हो असहाय भटकते फिरते
वनवासी-से आज सखी !
सीता-लक्ष्मी हरी किसी ने
गयी हमारी लाज सखी !

आशा का सन्देश सुनाती
तू हमको प्रति वर्ष सखी !
इसी लिए तेरे आने पर
होता अतिशय हर्ष सखी !

रामचन्द्र की विजय-कथा का
भेद बता आदर्श सखी !
पराधीनता से छूटे यह
प्यारा भारतवर्ष सखी !

पर इतने से ही होता है,
किसे भला संतोष सखी !
जरा हृदय तो देख भरे हैं,
यहां रोष के कोष सखी !

वह दिन था, जब दिया किसी ने,
रन में जरा प्रचार सखी !
मिटा दिया यम को भी हमने,
हुआ हमारा वार सखी !

और, आज तू देख, देख ये
सबल बचाते प्राण सखी ।
रण से पिछड़ पड़े, कहते हैं-
करो देश का तराण सखी !

छिड़ा आज यह पाप-पुण्य का
युद्ध अनोखा एक सखी ।
मर जावें पर साथ न देंगे,
पापों का, है टेक सखी ।

सबलों को कुछ सीख सिखाओ
मरें करें … उद्धार सखी !
दानव दल दें, पाप मसल दें,
मेटें अत्याचार सखी !

सबल पुरुष यदि भीरु बनें,
तो हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें देश में,
करें युद्ध घमसान सखी।

पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ,
दहला दें ब्रह्मांड सखी।
भारत-लक्ष्मी लौटाने को,
रच दें लंका काण्ड सखी ।

खाना पीना सोना जीना,
हो पापी का भार सखी !
मर-मर कर पापों का कर दें,
हम जगती से छार सखी ।

देखें फिर इस जगती-तल में,
होगी कैसे हार सखी !
भारत मां की बेड़ी काटें,
होवे बेड़ा पार सखी !

दो विजये ! वह आत्मिक बल दो,
वह हुंकार मचाने दो।
अपनी निर्बल आवाजों से,
दुनिया को दहलाने दो ।

‘जय स्वतंत्रिणी भारत माँ’ !
यों कहकर मुकुट लगाने दो।
हमें नहीं, इस भू-मण्डल को,
माँ पर बलि-बलि जाने दो ।

छेड़ दिया संग्राम, रहेगी
हलचल आठों याम सखी!
असहयोग सर तान खड़ा है
भारत का श्रीराम सखी !

पापों के गढ़ टूट पड़ेंगे,
रहना तुम तैयार सखी !
विजये! हम तुम मिल कर लेंगी,
अपनी माँ का प्यार !

मेरी टेक

निर्धन हों धनवान,
परिश्रम उनका धन हो।
निर्बल हों बलवान,
सत्यमय उनका मन हो।

हों स्वाधीन गुलाम,
हृदय में अपनापन हो।
इसी आन पर कर्मवीर
तेरा जीवन हो।

तो, स्वागत सौ बार
करूँ आदर से तेरा।
आ, कर दे उद्धार,
मिटे अंधेर-अंधेरा।

राखी की चुनौती

बहिन आज फूली समाती न मन में ।
तड़ित आज फूली समाती न घन में ।।
घटा है न झूली समाती गगन में ।
लता आज फूली समाती न बन में ।।

कही राखियाँ है, चमक है कहीं पर,
कही बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं ।
ये आई है राखी, सुहाई है पूनो,
बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं ।।

मैं हूँ बहिन किन्तु भाई नहीं है ।
है राखी सजी पर कलाई नहीं है ।।
है भादो घटा किन्तु छाई नहीं है ।
नहीं है खुशी पर रुलाई नहीं है ।।

मेरा बंधु माँ की पुकारो को सुनकर-
के तैयार हो जेलखाने गया है ।
छिनी है जो स्वाधीनता माँ की उसको
वह जालिम के घर में से लाने गया है ।।

मुझे गर्व है किन्तु राखी है सूनी ।
वह होता, खुशी तो क्या होती न दूनी ?
हम मंगल मनावे, वह तपता है धूनी ।
है घायल हृदय, दर्द उठता है खूनी ।।

है आती मुझे याद चित्तौर गढ की,
धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला ।
है माता-बहिन रो के उसको बुझाती,
कहो भाई, तुमको भी है कुछ कसाला ?

है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है ।
रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है ।।
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है ।
इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है ।।

आते हो भाई ? पुन पूछती हूँ–
कि माता के बन्धन की है लाज तुमको?
-तो बन्दी बनो, देखो बन्धन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको ।।

 

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