कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 5

कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 5

 

बालिका का परिचय

यह मेरी गोदी की शोभा, सुख सोहाग की है लाली
शाही शान भिखारन की है, मनोकामना मतवाली

दीप-शिखा है अँधेरे की, घनी घटा की उजियाली
उषा है यह काल-भृंग की, है पतझर की हरियाली

सुधाधार यह नीरस दिल की, मस्ती मगन तपस्वी की
जीवित ज्योति नष्ट नयनों की, सच्ची लगन मनस्वी की

बीते हुए बालपन की यह, क्रीड़ापूर्ण वाटिका है
वही मचलना, वही किलकना, हँसती हुई नाटिका है

मेरा मंदिर,मेरी मसजिद, काबा काशी यह मेरी
पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप, है घट-घट वासी यह मेरी

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को अपने आंगन में देखो
कौशल्या के मातृ-मोद को, अपने ही मन में देखो

प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास
जीव-दया जिनवर गौतम की,आओ देखो इसके पास

परिचय पूछ रहे हो मुझसे, कैसे परिचय दूँ इसका
वही जान सकता है इसको, माता का दिल है जिसका

सभा का खेल

सभा सभा का खेल आज हम,
खेलेंगे जीजी आओ।
मैं गांधी जी छोटे नेहरू,
तुम सरोजिनी बन जाओ।

मेरा तो सब काम लंगोटी,
गमछे से चल जायेगा।
छोटे भी खद्दर का कुर्ता,
पेटी से ले आयेगा।

लेकिन जीजी तुम्हें चाहिये,
एक बहुत बढ़िया सारी।
वह तुम मां से ही ले लेना,
आज सभा होगी भारी।

मोहन लल्ली पुलिस बनेंगे,
हम भाषण करने वाले।
वे लाठिया चलाने वाले,
हम घायल मरने वाले।

छोटे बोला देखो भैया,
मैं तो मार न खाऊंगा।
कहा बड़े ने छोटे जब तुम,
नेहरू जी बन जाओगे।
गांधी जी की बात मानकर,
क्या तुम मार न खाओगे।

खेल खेल में छोटे भैया,
होगी झूठ मूठ की मार।
चोट न आयेगी नेहरू जी,
अब तुम हो जाओ तैयार।

हुई सभा प्रारम्भ कहा,
गांधी चरखा चलवाओ।
नेहरू जी भी बोले भाई,
खद्दर पहनो पहनाओ।

उठ कर फिर देवी सरोजिनी,
धीरे से बोलीं बहनों।
हिन्दू मुस्लिम मेल बढ़ाओ,
सभी शुद्ध खद्दर पहनों।

छोड़ो सभी विदेशी चीजे़,
लो देशी सूई तागा।
इतने में लौटे काका जी,
नेहरू सीट छोड़ भागा।

काका आये काका आये,
चलो सिनेमा जायेंगे।
घोरी दीक्षित को देखेंगे,
केक मिठाई खायेंगे।

जीजी चलो सभा फिर होगी,
अभी सिनेमा है जाना।
चलो चलें अब जरा देर को,
घोरी दीक्षित बन जायें।
उछलें कूदें शोर मचावें,
मोटर गाड़ी दौड़ावे।

 

जाने दे

कठिन प्रयत्नों से सामग्री
एकत्रित कर लाई थी ।
बड़ी उमंगों से मन्दिर में,
पूजा करने आई थी ।।

पास पहुंकर देखा तो,
मन्दिर का का द्वार खुला पाया ।
हुई तपस्या सफल देव के
दर्शन का अवसर आया ।।

हर्ष और उत्साह बढ़ा, कुछ
लज्जा, कुछ संकोच हुआ ।
उत्सुकता, व्याकुलता कुछ-कुछ
कुछ सभ्रम, कुछ सोच हुआ ।।

किंतु लाज, संकोच त्यागकर
चरणों पर बलि जाऊंगी ।
चिर संचित सर्वस्व पदों पर
सादर आज चढ़ाऊँगी ।।

कह दूंगी अपने अंतर की
कुछ भी नहीं छिपाऊँगी ।
जैसी जो कूछ हूं उनकी ही
हूं, उनकी कहलाऊँगी ।।

पूरी जान साधना अपनी
मन को परमानन्द हुआ ।
किंतु बढ़ी आगे, देखा तो
मन्दिर का पट बन्द हुआ ।।

निठुर पुजारी ! यह क्या मुझ पर
तुझे न तनिक दया आई?
किया द्वार को बन्द और
मैं प्रभु को नहीं देख पाई ?

करके कृपा पुजारी, मुझको
जरा वहां तक जाने दे ।
प्रियतम के थोड़ी-सी पूजा
चरणों तक पहुँचाने दे ।।

जी भर उन्हे देख लेने दे,
जीवन सफल बनाने दे ।
खोल, खोल दे द्वार पुजारी !
मन की व्यथा मिटाने दे ।।

बहुत बड़ी आशा से आई हूं,
मत कर तू मुझे निराश ।
एक बार, बस एक बार, तू
जाने दे प्रियतम के पास।

 

पुरस्कार का मूल्य

मधुर-मधुर मीठे शब्दों में
मैंने गाना गाया एक ।
वे प्रसन्न हो उठे खुशी से
शाबाशी दी मुझे अनेक ।।

निश्चल मन से मैंने उनकी
की सभक्ति सादर सेवा ।
पाया मैंने कृतज्ञता
का उसी समय मीठा मेवा ।।

नवविकसित सुरभित कलियाँ ले,
मैंने रुचि से किया सिंगार ।
मेरी सुन्दरता की प्रिय ने
ली तुरन्त तस्वीर उतार ।।

हुई प्रेम-विह्वल मैं उनके
चरणों पर बलिहार गयी ।
बदले में प्रिय का चुम्बन पा
जीत गयी या हार गयी ।।

उस शाबाशी से, कृतज्ञता से,
तस्वीर खिंचाने से ।
हुई खुशी से मैं पागल-सी
प्रिय का चुम्बन पाने से ।।

घटने लगा किन्तु धीरे-
धीरे यह पागलपन मेरा ।
एक नशा था, उतर गया, हो
गया दुखी-सा मन मेरा ।।

गाना एक और गाया, अब
केवल मन बहलाने को।
सेवा-भाव लिये निकली मैं
अब जन-कष्ट मिटाने को ।।

सुन्दर खिले हुए फूलों से
किया आज भी साज-सिंगार
अखिल विश्व के लिए समेटे
अपने नन्हें उर में प्यार ।।

मैं प्रसन्न थी, पर प्रसन्नता
मेरी आज निराली थी।
मैं न आज मैं थी यह कोई
विश्व-प्रेम-मतवाली थी ।।

सेवा और श्रृंगार प्रेम से
भरा हुआ मेरा गाना ।
छिप कर सुना किसी ने
जिसका जान न पायी मैं आना ।।

सुनने वाला बोला, पर क्या
शब्द सुनाई देते थे ।
करते हुए प्रशंसा, विकसित
नेत्र दिखायी देते थे ।।

‘पहिले में यह बात न थी,
यह है बेजोड़ निराला गीत ।’
मेरी प्रसन्नता ने प्रतिध्वनि
किया कि प्यारे वह संगीत-

शाबाशी के पुरस्कार का
कोरा मूल्य चुकाती थी,
वही कमी उस पुरस्कार
की कीमत को दरशाती थी ।।

 

कुट्टी

मोहन से तो आज हो गई
है मेरी कुट्टी अम्मां ।
अच्छा है शाला जाने से
मिली मुझे छुट्टी अम्मां ।।

रोज सवेरे आकर मुझको
वह शाला ले जाता था ।
दस बजते हैं इसी समय तो
यह अपने घर आता था ।।

मोहन बुरा नहीं है अम्मां
मैं उसको करता हूं प्यार ।
फिर भी जाने क्यों हो जाया
करती है उससे तकरार ।।

यह क्या ! कुट्टी होने पर भी
वह आ रहा यहां मोहन ।
आते उसको देख विजयसिंह
हुए वहुत खुश मन ही मन ।।

बोले-कुट्टी तो है मोहन
फिर तुम कैसे आए हो
फूल देख उसके बस्ते में
पूछा यह क्या लाए हो ।।

चलो दोस्ती कर लें फिर से
दे दो हम को भी कुछ फूल।
हमे खिला दो खाना अम्माँ
अब हम जाएँगे स्कूल ।।

नटखट विजय

कितना नटखट मेरा बेटा ।
क्या लिखता है लेटा-लेटा ॥
अभी नहीं अक्षर पहचाना ।
ग, म, भ का भेद न जाना ॥
फिर पट्टी पर शीश झुकाए ।
क्या लिखता है ध्यान लगाए ॥
मैं लिखता हूँ बिटिया रानी।
मुझे पिला दो ठंडा पानी॥

अजय की पाठशाला

माँ ने कहा दूध तो पी लो,
बोल उठे माँ रुक जाओ
वहीं रहो पढ़ने बैठा हूँ
मेरे पास नहीं आओ
है शाला का काम बहुत-सा
माँ उसको कर लेने दो
ग म भ लिख-लिख कर अम्माँ
पट्टी को भर लेने दो
तुम लिखती हो हम आते हैं
तब तुम होती हो नाराज
मैं भी तो लिखने बैठा हूँ
कैसे बोल रही हो आज ?
क्या तुम भूल गई माँ
पढ़ते समय दूर रहना चाहिए
लिखते समय किसी से कोई
बात नहीं कहना चाहिए

बोले माँ पढ़ लिया बहुत-सा
आज न शाला जाऊँगा
फूल यहाँ भी बहुत लगे हैं
माला एक बनाऊँगा
यहाँ मजे में पेड़ों पर चढ़
बिही तोड़ कर खाता हूँ
माँ शाला में बैठा-बैठा
मैं दिन भर थक जाता हूँ
बैठूँगा मैं आज पेड़ पर
पहने फूलों की माला
माँ, मत शाला भेज इकट्ठा
मैंने सब कुछ पढ़ डाला

पुत्र-वियोग

आज दिशाएं भी हंसती हैं
है उल्लास विश्व पर छाया,
मेरा खोया हुआ खिलौना
अब तक मेरे पास न आया ।

शीत न लग जाए, इस भय से
नहीं गोद से जिसे उतारा
छोड़ काम दौड़ कर आयी
‘माँ’ कहकर जिस समय पुकारा ।

थपकी दे दे जिसे सुलाया
जिसके लिए लोरियां गायीं ।
जिसके मुख पर जरा मलिनता
देख आंख में रात बितायी ।

जिसके लिए भूल अपनापन
पत्थर को भी देव बनाया
कहीं नारियल, दूध, बताशे
कहीं चढ़ाकर शीश नवाया ।

फिर भी कोई कुछ कर न सका
छिन ही गया खिलौना मेरा
मैं असहाय विवश बैठी ही
रही उठ गया छौना मेरा ।

तड़प रहे हैं विकल प्राण ये ।
मुझको पलभर शान्ति नहीं है
वह खोया धन पा न सकूंगी
इसमें कुछ भी भ्रांति नहीं है ।

फिर भी रोता ही रहता है
नहीं मानता है मन मेरा
बड़ा जटिल नीरस लगता है
सूना-सूना जीवन मेरा ।

यह लगता है एक बार यदि
पल भर को उसको पा जाती ।
जी से लगा प्यार से सर
सहला सहला उसको समझाती ।

मेरे भैया मेरे बेटे अब
मां को यों छोड़ न जाना
बड़ा कठिन है बेटा खोकर
मां को अपना मन समझाना ।

भाई-बहिन भूल सकते हैं
पिता भले ही तुम्हें भुलावें
किन्तु रात दिन की साथिन मां
कैसे अपना मन समझावे ।

 

वे कुंजें

देव ! वे कुंजें उजड़ी पड़ीं
और वह कोकिल उड़ ही गयी ।
हटायीं हमने लाखों बार
किन्तु घड़ियां जुड़ ही गयीं ।।

विष्णु ने दिया दान ले लिया
कुश्लता गयी, अंधेरा मिला ।
मातृ-मन्दिर में सूने खड़े
मुक्ति के बदले मरना मिला ।।

आह की कठिन लूह चल रही
नाश का घन-गर्जन हो रहा ।
बूंद या बाण बरसने लगे
पापियों से तर्जन हो रहा ।

अमर-लोचन के धन को लिये
चलो, चल पड़ें, खुले हैं द्वार ।
गर्ज का कुश्लाम्बर ले चलें
मातृ-मन्दिर से हुई पुकार ।।

जननि के दुख की घड़ियां कटें
सजावें पूजा का साहित्य । आरती उतरे आदर-भरी
करों में लें नभ का आदित्य ।।

आज वे सन्देशे सुन पड़ें
कटे पद-कंजों की जंजीर ।
मुक्ति की मतवाली मां उठे
उठावें बेटी-बेटे वीर ।।

पाप पृथ्वी से उठ जाय
पापियों से टूटे सम्बन्ध।
प्यार, प्रतिभा, प्राणों की उठे
त्यागमय शीतल-मंद-सुगंध ।।

विजयिनी मां के वीर सुपुत्र
पाप से असहयोग लें ठान ।
गुंजा डालें स्वराज्य की तान
और सब हो जावें बलिदान ।।

जरा ये लेखनियां उठ पड़ें
मातृ-भूमि को गौरव से मढ़ें ।
करोड़ों क्रांतिकारिणि मूर्ति
पलों में निर्भयता से गढ़ें ।।

हमारी प्रतिभा साध्वी रहे
देश के चरणों पर ही चढ़े ।
अहिंसा के भावों में मस्त
आज यह विश्व जोतना पड़े ।।

 सेनानी का स्वागत

हम हारे या थके रुकी-सी
किन्तु युद्ध की गति है ।
हमें छोड़कर चला गया
पथ-प्रदर्शक सेनापति है ।

अन्धकार छा रहा भ्रमित सी
आज हमारी मति है ।
जिधर उठाते दृष्टि दिखायी
देती क्षति ही क्षति है ।।

ऐसी घोर निराशा में तुम
आशा बनकर आओ ।
स्वागत है शत बार विजय का
आओ मार्ग दिखाओ ।।

वह सेनापति हमें आज भी
है प्राणों से प्यारा ।
ऐसे-विषम समय में भी है
उसका हमें सहारा ।।

पर अपने ही चक्रव्यूह में
है वह फंसकर हारा ।

रण भेरी का नाद सदा को
क्या अब रुक जायेगा ?
जिसको ऊँचा किया वही
क्या झण्डा झुक जायेगा ?

गोली लाठी चार्ज, जेल की
वे भीषण दीवारें
काल-कोठरी, दण्ड यातना,
वे कोड़ों की मारें ।

प्रभुता-मद से भरी शत्रु की
व्यंग्य भरी बौछारें
साक्षी हैं साहस की
फिर हम जीतें अथवा हारें।

हैं सन्तप्त तदपि आशा से
स्वागत आज तुम्हारा
एक बार फिर कह दो
झण्डा ऊँचा रहे हमारा ।।

 

 मेरी कविता

मुझे कहा कविता लिखने को,
लिखने बैठी मैं तत्काल ।
पहले लिखा जलियाँवाला,
कहा कि बस हो गये निहाल ।।

तुम्हें और कुछ नहीं सूझता,
ले-देकर वह खूनी बाग ।
रोने से अब क्या होता है,
धुल न सकेगा उसका दाग ।।

भूल उसे चल हंस मस्त हो,
मैंने कहा -धरो कुछ धीर ।
तुमको हंसते देख कहीं,
फिर फ़ायर करे न डायर वीर ।।

कहा- न मैं कुछ लिखने दूंगा,
मुझे चाहिए प्रेम-कथा !
मैंने कहा -नवेली ही है वह,
रम्य-वदन है चन्द्र यथा !!

अहा ! मगन हो उछल पड़े वे,
मैंने कहा-सुनो चुपचाप ।
बड़ी-बड़ी-सी भोली आंखें,
केश-पाश ज्यों काले नाग ।।

भोली-भाली आंखें देखो,
उसे नहीं तुम रुलवाना ।
उसके मुंह से प्रेम-भरी,
कुछ मीठी बातें कहलाना ।।

हां, वह रोती नहीं कभी भी,
और नहीं कुछ कहती है ।
शून्य दृष्टि से देखा करती
खिन्नमना-सी रहती है ।।

करके याद पुराने सुख की,
कभी चौंक-सी पड़ती है ।
भय से कभी कांप जाती है,
कभी क्रोध में भरती है ।।

कभी किसी की ओर देखती,
नहीं दिखायी देती है !
हंसती नहीँ किन्तु चुपके से,
कभी-कभी रो लेती है ।।

ताजे हल्दी के रंग-सी,
कुछ पीली उसकी सारी है ।
लाल-लाल से धब्बे हैं कुछ,
अथवा लाल किनारी है ।।

उसका छोर लाल ! संभव है,
हो वह खूनी रंग से लाल ।
है सिन्दूर-बिन्दु से सज्जित,
अब भी कुछ-कुछ उसका भाल ।।

अब भी है उसके पैरों में,
बनी महावर की लाली,
हाथों में मेंहदी की लाली,
वह दुखिया भोली-भाली ।।

उसी बाग की ओर शाम को,
जाती हुई दिखाती है ।
प्रात:काल सूर्योदय से,
पहले ही फिर आती है ।।

लोग उसे पागल कहते हैं,
देखो तुम न भूल जाना !
तुम भी उसे न पागल कहना,
मुझे क्लेश मत पहुँचाना ।।

उसे लौटती समय देखना,
रम्य वदन पीला-पीला !
सारी का वह लाल छोर भी,
रहना है बिलकुल गीला ।।

डायन भी कहते हैं उसको
कोई कोई हत्यारे ।
उसे देखना किन्तु न ऐसी
गलती तुम करना प्यारे ।।

बाईं ओर हृदय में धड़कन
कुछ उसके दिखलाती है ।
वह भी तो प्रतिदिन क्रम-क्रम से
धीमी होती जाती है ।।

किसी रोज सम्भव है, उसकी
मिट जावे यह भी धड़कन ।
बुझ जायें आंखें, धीमी
जो होती जाती हैं क्षण-क्षण ।।

उसकी ऐसी दशा देखना
आंसू चार बहा देना ।
उसके दु:ख में दुखिया बनकर
तुम भी दु:ख मना लेना ।।

स्वागत

(१९२० में नागपुर में होने वाली
कांग्रेस के स्वागत में)

तेरे स्वागत को उत्सुक यह खड़ा हुआ है मध्य-प्रदेश
अर्घ्यदान दे रही नर्मदा दीपक सवयं बना दिवसेश ।।

विंधयाचल अगवानी पर है
वन-श्री चंवर डुलाती है ।
भोली-भाली जनता तेरा
अटपट स्वागत गाती है।।

आ मैया कांग्रेस हमारी आकांक्षा की प्यारी मूर्ति !
राज्यहीन राजाओं के गत वैभव की स्वाभाविक पूर्ति !!

है स्वागत की स्फूर्ति तदपि
मां ! मन में होता है कुछ सोच ।
आनन्द में घबराहट-सी है,
है उत्साह और संकोच ।।

हमें नहीं भय संगीनों का, चमक रहीं जो उनके हाथ ।
जरा नहीं डर उन तोपों का, गरज रहीं जो बल के साथ ।।

ढीठ सिपाही की हथकड़ियाँ
दमन नीति के वे कानून ।

मत जाओ

अंधकार ! सघनांधकार ! हा,
निराधार संसार हुआ ।
हम असहाय निहत्थों पर, यह
कैसा भीषण वार हुआ ।

लुटते देखा अपना धन, हम
कुछ न कर सके हार गये ।
लोकमान्य, यह क्या सुनती हूँ,
सहसा स्वर्ग सिधार गये ?

यों असहाय छोड़ कर असमय
कैसे जाते हो भगवान ?
लौटो, तुम्हें न जाने देंगे,
दुखी देश के जीवन-प्राण !

भारत मैया की नैया के
चतुर खेवैया लौट चलो ।
इस कुसमय में साथ न छोड़ो,
रुक जाओ, ठहरो, सुन लो ।।

आशा-बेलि स्वदेश-भूमि की
यों न हाय ! मुर्झाने दो !

तिलक यहीं के कहलाओ ।
अमरपुरी बलि कर दो इस पर
यहीं रहो, हां ! मत जायो ।।

करुण-कहानी

आह ! करोगे क्या सुन कर तुम
मेरी करुण कहानी को ।
भूल चुकी मैं स्वयं आज
उस स्वप्न-लोक की रानी को ।।

जो चुन कर आकाश-कुसुम का
हार बनाने वाली थी ।
उनके काँटों से इस उर का
साज सजाने वाली थी ।

अपने वैभव को बटोर कर
कहीं चढ़ाने वाली थी ।
उन्हें पकड़ने को यह दुबर्ल
हाथ बढ़ाने वाली थी ।

पर क्या संभव है पा जाना
नील-गगन का प्यारा फूल ।
जो मेरी आँखों में बरबस
रहा पुतलियों के संग झूल ।

मुझे वहां तक पहुँचाने में,
हो न सका विधि भी अनुकूल ।
सजनि ! वायु भी तो बहती थी
उस दिन मेरे ही प्रतिकूल ।।

थे अप्राप्त तो मुझे सुनहले
सपने ही दिखलाये क्यों ?
छिप-छिप बिना सूचना के
मेरे मानस में आये क्यों?

मधुमय पीड़ा से मेरी
रीती प्याली भर लाये क्यों ?
जलते जीवन में जल के
दो चार बिन्दु टपकाये क्यों ?

अरे प्राण ! इस भांति निठुर
होकर ही तुमको जाना था ?
तो फिर क्यों केवल दो दिन के
लिए मुझे पहिचाना था ?

चपला की सी चमक दिखाकर
ही यदि फिर छिप जाना था ।
तो प्राणेश ! तुम्हें मेरे
प्राणों में नहीं समाना था ।

आज झर रही हैं निर्झर-सी
झर-झर यह आंखें अविराम ।
नहीं खोजने पर भी पाता
यह उद्भ्रांत हृदय विश्राम ।

बाल-सूर्य की प्रथम रश्मि के
साथ-साथ ही आयी शाम ।
जल तम में प्रज्जवलित हो उठी
वह वियोग-ज्वाला उद्दाम ।।

यहीं रुको बस, बहत सुन लिया
तुमने उसका करुण कलाप ।
यहीं करो इति आगे सुनकर
नाहक ही होगा संताप ।।

अर्थहीन है, सारहीन है
उस पगली का सभी प्रलाप ।
भूलो उसे, भूल भी जाओ
समझो उसे अरण्य-विलाप ।।

मुझ अकिंचना के प्रति होकर
द्रवित न होना कहीं विकल ।
मेरी उष्म उसासों से मत
झुलसा लेना अन्तस्तल ।।

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