कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 8

कविता -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 8

राखी

भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज ।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज ।।

लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ ।
भरत – भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ ।।

वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान ।
पढ़ते – पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान ।।

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई ।
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी – बन्द – शत्रु – भाई ।।

किन्तु देखना है, यह मेरी
राखी क्या दिखलाती है ।
क्या निस्तेज कलाई पर ही
बँधकर यह रह जाती है ।।

देखो भैया, भेज रही हूँ
तुमको-तुमको राखी आज ।
साखी राजस्थान बनाकर
रख लेना राखी की लाल ।।

हाथ काँपता, हृदय धड़कता
है मेरी भारी आवाज ।
अब भी चौक-चौक उठता है
जलियाँ का वह गोलन्दाज ।।

यम की सूरत उन पतितों का
पाप भूल जाऊँ कैसे?
अंकित आज हृदय में है
फिर मन को समझाऊँ कैसे ?

बहिने कई सिसकती हैं हा
सिसक न उनकी मिट पाई ।
लाज गँवाई, गाली पाई
तिस पर गोली भी खाई ।।

डर है कही न मार्शल-ला का
फिर से पड़ जावे घेरा ।
ऐसे समय द्रौपदी-जैसा
कृष्ण ! सहारा है तेरा ।।

बोलो, सोच-समझकर बोलो,
क्या राखी बँधवाओगे
भीर पडेगी, क्या तुम रक्षा-
करने दौड़े आओगे।

यदि हाँ तो यह लो मेरी
इस राखी को स्वीकार करो ।
आकर भैया, बहिन ‘सुभद्रा’-
के कष्टों का भार हरो ।।

पुरस्कार कैसा

सहसा हुई पुकार ! मातृ-
मन्दिर में मुझे बुलाया क्यों ?
जान-बूझकर सोई थी, फिर
जननी ! मुझे जगाया क्यों ?

भूल रही थी स्वप्न देखना,
आमंत्रण पहुँचाया क्यों ?
बन्द द्वार करने जाती थी
फिर पथ हाय ! सुझाया क्यों ?

मान मातृ-आदेश, दौड़ कर
आने को लाचार हुई ।
क्या मेरी टूटी-फूटी-सी
सेवा है स्वीकार हुई ?

स्वयं उपेक्षित पर गुरुजन का
पथ-भूला दुलार कैसा ?
तिरस्कार के योग्य बावली,
पर यह अतुल प्यार कैसा ?

इस बुन्देलों की झांसी में
शस्त्रों बिना तार कैसा ?
देश-प्रेम की मतवाली को
जननी ? पुरस्कार कैसा ?

क्षत्राणी हूं, सुख पाने दे
अरुणामृत की धारों से ।
बनने दे इतिहास देश का
पानी चढ़े दुधारों से ।।

जरा सुलग जाने दे चारों-
दिशि कुरबानी की आगी ।
अरी बेतवा ! दिखा समर में !!
तेरे पानी की आगी !!

हर पत्थर पर लिखा जहां
बलिदान लक्ष्मीबाई का ।
कौन मूल्य है वहां ‘सुभद्रा’
की कविता-चतुराई का ?

न्यौता ! न्यौते का जवाब
मैं न्यौता देने आयी हूं ।
भाई ! दो, मैं तिलक-लालिमा
साथ न अपने लायी हूं ।।

आज तुम्हारी लाली से
मां के मस्तक पर हो लाली ।
काली जंजीरें टूटें, काली
जमना में हो लाली ।।

जो स्वतंत्र होने को है,
पावन दुलार उन हाथों का ।
स्वीकृत है, मां की वेदी पर
पुरस्कार उन हाथों का ।।

लड़ने की धुन में भाई !
ममता का मधुर स्वाद कैसा?
अपने ही से अपनों का,
डरती हूं धन्यवाद कैसा ?

(सन् १९३१ में सेकसरिया पारितोषिक
मिलने पर)

पतंग

जो तुम अम्माँ देर करोगी
पतंग न हम ले पाएँगे
सब लड़के खरीद लेंगे माँ
हम यों ही रह जाएँगे

तुम तो नहीं समझती हो माँ
पतंग और मंझे की बात
घर में बैठी-बैठी जाने क्या
करती रहतीं दिन-रात

अब हम रह न सकेंगे अम्माँ
हम भी पतंग उड़ाएँगे
पैसा हमें न दोगी तो
हम रोएँगे चिल्लाएँगे।

विदाई

आशे ! किसी हरित पल्लव में जाओ, जाओ छिप जाओ ।
खुला हूआ है द्वार निराशे ! आओ स्वागत है आओ ।।
आयो उद्विग्नते ! हृदय का मंथन कर दुख पहुंचाओ ।
निष्ठुरते ! जाओ- निष्ठुरतम उनका हृदय बना आओ ।।

मुझ अकिंचना को तजकर जाने में उन्हें न हो दुख लेश ।
उनके सरस हृदय को करुणे ! जाकर पहुँचाना मत कलेश ।।
हे समत्व की मधु-लालिमे ! आज बदल दो अपना वेश ।
मेरे लिए हृदय में उनके रह न जाय कुछ ममता शेष ।।

मेरे आगे स्वार्थ है उनके आगे है कर्तव्य ।
मुख्रर भावना उन्हें रोकने की क्या हो सकती क्षणतव्य ।।
अरे हृदय रोको अपने को, अरी आंख रुक जाओ अब ।
विघ्न और बाधाएं उनके पथ की दूर हटाओ सब ।।

जाने दो, जाने दो, उनको जाने ही में सुख होगा ।
सह लेना पाषाण हृदय, तू भी जो कूछ भी दुख होगा ।।
उनकी उन प्यारी स्मृतियों का चित्र सदा सन्मुख होगा ।
इन प्यासी आंखों के आगे उनका निर्मल मुख होगा ।।

फिर क्यों हे बावले हृदय ! नाहक होते चंचल ।
अंतरतम में मची हूई है क्यों इतनी भीषण हलचल ।।
मेरे तो प्रति रोम-रोम में उनका समावेश अविचल ।
है कोई क्या मिटा सकेगा मेरा यह निश्चय निश्चल ।।

जाओ, जाओ, हृदय देवता ! जाओ हे मेरे पाषाण !
तुम्हें न रोकूंगी यद्यपि हो रहे कंठगत मेरे प्राण ।।
जाओ अंतिम विनय यही है मुझे भूल ही जाना तुम ।
मेरी स्मृतियों की समाधि पर कभी न फूल चढ़ाना तुम ।।

स्वागत गीत

कर्म के योगी, शक्‍ति-प्रयोगी
देश-भविष्य सुधारियेगा ।
हाँ, वीर-वेश के दीन देश के,
जीवन प्राण पछारियेगा ।।

तुम्हारा कर्म-चढ़ाने को हमें डोर हुआ ।
तुम्हारी बातों से दिल-में हमारे जोर हुआ ।।
तुम्हें कुचलने को दुश्मन का जी कठोर हुआ ।
तुम्हारे नाम का हर ओर आज शोर हुआ ।।

हां, पर-उपकारी, राष्ट्र-बिहारी ।
कर्म का मर्म सिखाइयेगा ।।

तुम्हारे बच्चों को कष्टों में आज याद हुई ।
तुम्हारे आने से पूरी सभी मुराद हुई ।।
गुलामखानों में राष्ट्रीयता आबाद हुई ।
मादरे हिन्द यों बोली कि मैं आजाद हुई ।।

हां, दीन के भ्राता, संकट त्राता,
जी की जलन बुझाइयेगा ।।

राष्ट्र ने कहा कि महायुद्ध का नियोग करो ।
कम्पा दो विश्व को, अब शक्ति का प्रयोग करो ।
हटा दो दुश्मनों को, डट के असहयोग करो ।
स्वतंत्र माता को करके, स्वराज्य भोग करो ।।

हां, हिंसा-हारी, शस्त्र-प्रहारी
रार की रीति सिखाइयेगा ।।

अपराधी है कौन

अपराधी है कौन, दण्ड का
भागी बनता है कौन ?
कोई उनसे कहे कि पल भर
सोचें रह कर मौन ।

वे क्या समझ सकेंगे
उनकी खीजमयी मनुहार ।
उनका हँस कर कह देना, ‘सखि,
निभ न सकेगा प्यार ।

यहीं कुचल दो, यहीं मसल दो
मत बढ़ने दो बेल
निर्मम जग के आघातों से
बिगड़ जायेगा खेल ।

मेरे लिए न करना, सखि,
तुम थोड़ा सा भी त्याग ।
जलने दो, मुझ को सुखकर है
यह जीवन की आग ।

रहने दो क्यों मोल ले रही
हो नाहक उन्माद ।
जीवन का सुख बेच रही
हो लेकर विषम विषाद ।

स्नेहसलिल अपराधी है कौन

मोल लिया उन्माद ।
सखा बन गया जीवन का अब
उनके विषय विवाद ।

है प्रफुल्लता के परदे में
भीषण-भीषण दाह ।
अपनी इन आंखों से मैं सब
देख रही हूं आह ।

जलती हूं, ज्वाला उठती है
पा नैनों का नीर ।
क्रांति मच रही जीवन में
हूं उद्भ्रांत अधीर ।।

नहीं मार्ग अज्ञात, किन्तु मैं
फिर भी हूं गतिहीन ।
वैभव की गोदी में हूं पर
फिर भी दीन मलीन ।

कोई उनसे कहे कि मेरा
ही है सब अपराध ।
उनको अपना कहूं हृदय में
मेरी ही थी साध ।

वही साध अपराध हुई,
हो गयी हृदय का दाह ।
प्राणों का उन्माद बन गयी ।
मेरी पागल चाह ।

व्यथित हृदय

व्यथित है मेरा हृदय-प्रदेश
चलूँ उसको बहलाऊँ आज ।
बताकर अपना सुख-दुख उसे
हृदय का भार हटाऊँ आज ।।

चलूँ मां के पद-पंकज पकड़
नयन जल से नहलाऊँ आज ।
मातृ-मन्दिर में मैंने कहा-
चलूँ दर्शन कर आऊँ आज ।।

किन्तु यह हुआ अचानक ध्यान
दीन हूं, छोटी हूं, अञ्जान!
मातृ-मन्दिर का दुर्गम मार्ग
तुम्हीं बतला दो हे भगवान !

मार्ग के बाधक पहरेदार
सुना है ऊंचे-से सोपान ।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर
चढ़ा दो मुझको यह भगवान !

अहा ! वे जगमग-जगमग जगी
ज्योतियां दीख रहीं हैं वहां ।
शीघ्रता करो, वाद्य बज उठे
भला मैं कैसे जाऊं वहां ?

सुनाई पड़ता है कल-गान
मिला दूं मैं भी अपने तान ।
शीघ्रता करो, मुझे ले चलो
मातृ-मन्दिर में हे भगवान !

चलूं मैं जल्दी से बढ़ चलूं
देख लूं मां की प्यारी मूर्ति ।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान
जगाती होगी न्यारी स्फूर्ति ।।

उसे भी आती होगी याद
उसे ? हां, आती होगी याद ।
नहीं तो रूठूंगी मैं आज
सुनाऊँगी उसको फरियाद ।।

कलेजा मां का, मैं सन्तान,
करेगी दोषों पर अभिमान ।
मातृ-वेदी पर घण्टा बजा,
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् !!

सुनूँगी माता की आवाज,
रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव !
न होने दूँगी अत्याचार।।

न होने दूँगी अत्याचार
चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान
मातृ-मन्दिर में हुई पुकार
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् ।

आहत की अभिलाषा

जीवन को न्यौछावर करके तुच्छ सुखों को लेखा।
अर्पण कर सब कुछ चरणों पर तुम में ही सब देखा।।

थे तुम मेरे इष्ट देवता, अधिक प्राण से प्यारे।
तन से, मन से, इस जीवन से कभी न थे तुम न्यारे।।
अपना तुमको समझ, समझती थी, हूँ सखी तुम्हारी।
तुम मुझको प्यारे हो, मैं तुम्हें प्राण से प्यारी।।

दुनिया की परवाह नहीं थी, तुम में ही थी भूली।
पाकर तुम-सा सुहृद, गर्व से फिरती थी मैं फूली।।
तुमको सुखी देखना ही था जीवन का सुख मेरा।
तुमको दुखी देखकर पाती थी मैं कष्ट घनेरा।।

‘मेरे तो गिरधर गोपाल तुम और न दूजा कोई।।’
गाते-गाते कई बार हो प्रेम-विकल हूँ रोई।।
मेरे हृदय-पटल पर अंकित है प्रिय नाम तुम्हारा।
हृदय देश पर पूर्ण रूप से है साम्राज्य तुम्हारा।।

है विराजती मन-मन्दिर में सुन्दर मूर्ति तुम्हारी।
प्रियतम की उस सौम्य मूर्ति की हूँ मैं भक्त पुजारी।।
किन्तु हाय! जब अवसर पाकर मैंने तुमको पाया।
उस नि:स्वार्थ प्रेम की पूजा को तुमने ठुकराया।।

मैं फूली फिरती थी बनकर प्रिय चरणों की चेरी।
किन्तु तुम्हारे निठुर हृदय में नहीं चाह थी मेरी।।
मेरे मन में घर कर तुमने निज अधिकार बढ़ाया।
किन्तु तुम्हारे मन में मैंने तिल भर ठौर न पाया।।

अब जीवन का ध्येय यही है तुमको सुखी बनाना।
लगी हुई सेवा में प्यारे! चरणों पर बलि जाना।।
मुझे भुला दो या ठुकरा दो, कर लो जो कुछ भावे।
लेकिन यह आशा का अंकुर नहीं सूखने पावे।।

करके कृपा कभी दे देना शीतल जल के छींटे।
अवसर पाकर वृक्ष बने यह, दे फल शायद मीठे ॥

प्रभु तुम मेरे मन की जानो

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है।
प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी।

इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ।
तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो।

मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ।
मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है।

तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती।

कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है।
मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला।

यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी।
ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है।

मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है।
वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ।

तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है।

(अंतिम रचना)

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