कविता-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 4

कविता-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 4

ओड़िशा

इस नौ- तेईस छपरीले घर की
चौखट को पारकर जहाँ भी जाता हूँ ,
दिल्ली, टोक्यो या लेनिनग्राड
किसी काम से, किसी कवि- सम्मलेन में ,
किसी चेरी-फूलों के उद्यान में
या नेवा नदी के तट पर

अपने साथ ले जाता हूँ
घर के आगे पुरवाई पवन में
हिलोरे खाते मंजरी से लदे आम्रवृक्ष
जिस पर किसी सपने की तरह
हल्दी बसंत चिड़ियों के ‘लुकाछिपी’ के खेल में
छिप जाना ,दिखाई पड़ना
फिर खो जाना ,फिर दिखाई देना

इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा ।

अपने साथ ले जाता हूँ
रास्ते में नारियल के खोल से
खेलते हुए छोटे-छोटे मासूम बच्चों की उदास आँखें;

टूटी कुर्सी का विकट बनाकर
दोपहर की तपती धूप में क्रिकेट खेल
में लीन किशोरों के चमकते चेहरें ;

धान के खेतों में गीली मिटटी को रोलते हुए
झुकी कमर वाले कुशा डेरा , रघु मलिक के
अनिश्चित अन्धकारमय भविष्य

इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा ।

अपने साथ ले जाता हूँ
सूर्योदय की पूर्व वेला में
कजलपाती.कौआ या कोयल की कूक सुनाई देने से पहले
खंडगिरी की गुफाओं से सुनाई देने वाले
जैन मुनियों की प्रार्थना के वे उदात्त स्वर ;

रक्तरंजित दयानदी के किनारे
पश्चाताप में निमग्न सम्राट के निद्रा विहीन वह प्रहर;

अपने साथ ले जाता हूँ
अंधियारे साँझ में पिता को पहली बार मिलने आए किशोर,
कलश लगाने के बाद जिसके मंदिर के चूल से
कूदकर सागर में आत्म-विसर्जन कर देने से
से उत्पन्न हुए अंतहीन करुण शोक लहर का वह प्रहर;

चित्रोत्पला घाट पर
स्नान-तर्पण करके खडाऊं की खट खट
के साथ लौटते हुए मेरे दादा जी के
प्रभात-वेला में वे मधुर स्वर
इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा ।
अपने साथ ले जाता हूँ
भग्न-मंदिर की भित्तियों पर
समय की अनदेखी कर
सबकी नज़रों से बचते-बचाते
अपलक दूर निहारती प्रेमलीला के रस में डूबी भृत्य नायिकाएं ;
कुमुद के फूलों से भरे
गाँव के सरोवर के स्नान-घाट पर
अलता से रंगे पावों को घिसते
किसी दूसरे स्वप्नलोक में विचरण करती हुई तरुणियाँ
और बातों बातों में हंसी-मजाक के लच्छे उडाती स्नेहशील भौजाइयाँ.
अपने साथ ले जाता हूँ
हल्दी के पत्तों की सुगंध,काकरा,चकुली पीठा
गोधूलि वेला में बरामदे में सहारा लेकर बैठी हुई मेरी दादी माँ ;
रंगोली, दशहरे का मिष्ठान्न
द्वार से दहलीज के अन्दर तक बने लक्ष्मीपाद के निशान;
अपने साथ ले जाता हूँ
भागवत की छोटी – छोटी पंक्तियाँ
निर्माल्य कणिका ओर अभय वरदान देती हुई
दो चक्राकार आँखें

इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा ।
साथ ले जाता हूँ वही पुराना टेबल
जिस पर जमी धूल को झटके बिना
जमा होती मेरी कापियां -किताबें , मेरी ध्यान धारणा
और पिताजी के बार- बार
हाथ लगने से चिकनी हुई
अधफटी पुरानी गीता ;

कमरे के चारों कोनों में भरे हुए
बच्चों के पुराने उपेक्षित खिलौनें
और उनके तरह तरह के
नए सपनें , नए खिलौनें , नई कल्पनाएँ
अपना दुःख छुपा कर मुख पर मुस्कराहट बिखेरती
तुलसी चौरा के आगे नमन
करती हुई गृह- लक्ष्मी की नीरव प्रार्थना ;

चौखट पारकर जब मैं बाहर जाता हूँ
इतना ही बस मैं अपने साथ ले जाता हूँ
इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा ।

 

दो नौसिखिये चित्रकार

हरे कदंब का पत्ता
पता नहीं क्यों
समय आने से पहले
झड़ जाता है ,
फिर भी अनेक पीले पत्ते
डालियों पर खेलतें हैं हवा में !

उस पत्ते को उठाकर
दादाजी लाकर रख देते हैं तुम्हारे टेबल पर
दूसरे दिन सुबह
उस पत्ते में दिखाई देता है हल्का- हल्का पीलापन
हरे पीले के मेल से पत्ता
दिखता है सुन्दर !

और एक दिन बाद
हरा रंग कहीं उड़ जाता है
सिर्फ रह जाता है पीलापन
क्या यह है वही पत्ता !
तुम चकित हो जाते हो
फिर एक दिन बाद
कुछ धूसर रंग के बिंदु दिखने लगते है

पीले रंग पर धीरे- धीरे
पीलेपन को ख़त्म करते हुए
धूसर रंग क्रमशः काला होकर
पूरे पत्ते पर छा जाता है !

दिन- ब- दिन पीले पत्ते के बदलते रूप का चित्र
दोनों चित्रित करते हैं अपने नौसिखिये हाथों से
एक दिन लाए उस पत्ते को टेबल से
फेंक देते हैं दादाजी, बाहर मरा समझकर
लेकिन बचे रह जाते हैं कापी में उसके रंगीन स्केच ।

 

तुमको छूने पर

तुमको छूने पर
स्नायु शिराधमनियों में
दौड़ जाता है कहीं सुदूर से एक
अनजान नाम गाँव के अंतिम छोर के किसी मंदिर की
आरती की घंट–ध्वनियां
सुनाई देती है ‘रात हो गई, रात हो गई’ कहते
घोंसलों में लौटते पक्षियों के शुभ्र संचरण में

तुमको छूने पर
मेरा बचपन फिर एक बार
आषाढ़ की पहली बारिश में भीग जाता है
भीगी मिट्टी की सौधी गंध से
खिलखिलाने लगती है संतापित मेरे धूल में मेघ की फसल
कडकडाने लगती है बिजली मेरे चित्त आकाश में

तुमको छूने पर
तुलसी चौरा मूल में शाम के समय
याद आती है तुरंत बुझे दीए की बत्ती की महक
पता नहीं , कहाँ खो जाते है
सुवासित अंधेरे में चंद्र-तारें और नीहारिकाएं

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