कविता संग्रह-वर्षा की सुबह-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 2

कविता संग्रह-वर्षा की सुबह-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 2

 

अनामिका

घनघोर अँधेरे में
स्तब्ध, मूक पर्वत की कमर में
एक आर्त स्वर “ले गया”, “ले गया”
गूंज उठा और पसर गया
समुद्र की लहर बन आदिगंत
चौदह भुवन को पाट गया, व्याप्त हो गया
पछाड़ खाकर रोया, उजड़ा, उजाड़ा
शून्य में उड़ गया
उसके बाद आकाश, तारे
सुनसान ससागरा धरा
गहन कानन वन फिर शांत हो गए
विराज गई घनघोर रात्रि।

व्यथित मंथित वह शब्द
सारी यंत्रणाओं का वह शेष श्लोक परम सत्व
असहाय प्राणियों की आर्त पुकार
कौन जाने देवताओं को सुनाई दी या नहीं।

शेर के पंजे से पूर्वाशा में रक्त छिटे
आकाश में इतना बड़ा छेद
दम दम दमकता उगता सूर्य
समय का परदा भी छिन्न भिन्न
बावजूद इन सबके
चारों ओर पृथ्वी के
परिचित रंग और खेल। .

झरना-किनारे, महुआ की छाया में
आजन्म मातृहीन
सुबह पितृहीन अभागा बच्चा
असमय ही मुरझाया एक फूल अहा
आकाश को सारी सृष्टि के उसी आदिमूल
उगते सूर्यदेव को
ताक रहा था।

कुछ पूछने-सा भाव उसके चेहरे पर
अँधेरे में ज्योति-सा
अशब्द शब्द-सा पसर गया चुपचाप।
एक गाँव, एक बच्चा होता है वहाँ
उसी मूक और निर्वाक् पर्वत की कमर में
महुए की छाया में, झरना-किनारे
इतिहास, देवता या मनुष्य
भला कौन जानता है ? कौन पूछता है ?

 

बिना हमारी मदद के

कभी-कभी समय के द्वार और खिड़की
सहसा खुल जाते हैं अप्रत्याशित
न जाने किस अनुपस्थित
अनजान हवा के झोंके से,
अनजाने का हाथ बढ़ आता है
परछाईं की तरह दूर दिगंत से
छू जाता है मेरी स्थिति को बड़े स्नेह से।

देखता हूँ उसके हाथ में
लिपिबद्ध हैं कई वायदों के चिह्न
स्नेह प्रेम करुणा के असंख्य विराम-चिह्न
नई योजनाओं और नई भावनाओं की
चित्रांकन की तमाम रूपरेखाएँ असंख्य मूर्तियाँ।

जी कहता है
करना होगा आविष्कार फिर एक बार,
काँटे और झाड़ियाँ लाँघ,
अनजाने और अद्भुत भूगोल का,
आकाश, समुद्र, तारे, नदी, वन, फूल
मृत्यु, सपने, यंत्रणाओं के
तमाम रास्ते पार कर,
खलिहान लाएँगे ढोकर स्मृति-फसल।

दिगंत का पाट लाँघ
आता है अपूर्व प्रकाश
समय का शुभ्र दमकता चेहरा दिखता है
सामने उस दिन के उज्ज्वल मुँह में
जो खड़ा है मौनी बाबा-सा
कमरे में मेरे सामने
अपनी इच्छा का गुलाम है
बिना किसी की मदद के।

ऐसा तो हमेशा होता रहा है हर युग में
समय ही सब कर जाता है
बिना हमारी मदद के
पेड़ों पर फूल खिलाकर, पत्ते गिराकर
हँसाता है कलियों और चिड़ियों को
फिर मार डालता है,
नीरवता से, अँधेरे से भर देता है
समग्र आकाश कभी,
दौड़ जाता है चारों ओर-
प्रस्थान और विदाई का संक्षिप्त आभास।

आकाश

पेड़-पौधों, गाँव-द्वार से बना है
जो नील दिगंत सुदूर,
उसी पर कभी एक थके-हारे पथिक-सा
कभी उतावले प्रेमी-सा
झुका होता है जो
उसी का नाम है आकाश।

गहरे खेत के एकाकी ताड़ वृक्ष को
इतनी सुंदर शून्यता के प्रेम में
बाँधे रखता है जो
माँ यशोदा बन
बाल कृष्ण को
भींचकर अपनी गोद में
उसी अनभूली स्नेहमयी
विभूति का नाम है आकाश।

सन्सन् शून्य छाती पर
अकेले घर लौटते निर्जन
कतार के कतार, झुंड के झुंड
पक्षियों को उड़ा देता है,
हँसाता है, रिझाता है, नचाता है
रंग-बिरंगे बादलों को,
पल में घुप्प काले बादलों की छाया में
नचाता है मोरों को, रुलाता है प्रेमियों को
सिंदूर के टीप-सा थाप देता है
सारे सृष्टि के जनक सूर्यदेव को,
ब्रह्मचारी के ललाट पर चंदन के टीक-सा
पूनो के चाँद को,
राह छोड़ देता है
चौतरफा अधीर हवा के लिए
उसी सज्जन जादूगर का नाम है आकाश ।

हर जगह होता है-
सैकड़ों जलघटों में, गोष्पद सलिल में
निर्जन सिंधु में, झिलमिल ओस की बूंदों में
हालाँकि कब नहीं था-कहाँ नहीं होता
उसी अंतिम अनुपस्थिति का नाम तो है आकाश।

कार्य और कारण का,
जनम और मरण का क्रीतदास,
पग-पग पर हँसी-रुलाई,
हानि-लाभ कर्मवश
देखता हूँ मैं शून्यता को
और पूछता हूँ,
आत्माराम, शून्यमय ओ निरंजन
बनूँगा नहीं क्या मैं कभी आकाश?

 

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