कविता संग्रह-वर्षा की सुबह-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 3

कविता संग्रह-वर्षा की सुबह-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 3

 

दिन

यह खिलखिलाकर हँसता
मुखरित होता सबेरा, यह दिन
अब धीरे-धीरे सुरझा जाएगा,
झर जाएगा अँधेरे की गोद में
जैसे हर दिन मुरझा जाता है, झर जाता है
बह जाएगा, जहाँ बह जाता है हर दिन।

उसके बाद रात में जागते पहरेदार,
तारे और झींगुर
संशय और अज्ञानता से मुक्ति चाहते
जुगनू की व्यथित गुहारें।

बीत जाता है दिन
ले जाता है साथ सबको
पिता, भाई, पति, पत्नी, घर, पेड़
खिलौने, गुस्सा, अभिमान, खीझ
थकान और हताशा को
ले जाता है
सपने, दुःख, भूख, अप्राप्ति
पाप, पुण्य, लाभ, लोभ, क्षोभ, घुटन को ।

जाता है, चला जाता है दिन
डूबते सूर्य के साथ,
खो जाता है
घर लौटती चिड़ियों के पंखों में,
चुप हो जाता, ठिठक जाता है
हवा की बोझिल साँसों में,
हाथ बढ़ाने पर
फिर छुआ नहीं जाता उसको
उसके धीमे प्रकाश और
स्पष्ट शुभ्रता को।

अँधेरा बढ़ने पर हम नहीं होते
पूरे आकाश में लाखों तारे दीप जलाकर
सोये होते हैं असहाय-से इधर-उधर
एक दूसरी दुनिया में
पशु-पक्षी, स्थावर, जंगम
ईश्वर, मानव, द्रुम, कीट, विहंग।
फिर होता है सबेरा
लाल टहटह होंठ तुतला सबेरा
दूसरी दुनिया से लौटते सभी को
फिर से, सैकड़ों करोड़ों बार तलाश लेता है
सभी अपनी-अपनी जगह होते हैं पूर्ववत्
रास्ता किनारे पेड़, पेड़ की डाल पर चिड़िया का घोंसला
चिड़िया के घोंसले में कलरव
कलरव में दुःख-शोक भूलकर
कृतज्ञता, प्रार्थनाएँ और मिन्नतें।

तलाश लेता है
उसी दूसरी दुनिया से लौट रहे तुम्हें
तुम्हारी थकान, सपनों, सिसकियों और निर्जनता को
खोयी हुई माया, खुल गई वेणी
खोये हुए कनफूल, मौन पड़े शब्दों को।

तलाश लेता है मुझे
मेरा पिछला दिन, पिछले जन्म का शोक
नए आनंद, नई पीड़ा के सा-रे गा-मा
नए सपनों की शब्दलिपि को
क्रमशः खुल रहे विस्मय की
शुभ्र ज्योतिरेखा को।

 

 

मृत्यु

आना हो तो आओ
क्या मालूम नहीं तुम्हें
तुम्हारे उस आकाश की ओर
उन्मुख हूँ मैं हमेशा से
आओ, आकर बैठो मेरे पास ।

धूल में धूसर आत्मा सिर्फ रोती है
रोती है दिन-रात वही विमुग्धा पुतली
आनंद से, आँसुओं से, है राधा-सी
सदा वह पगली।

पहाड़ के मचान पर, सुदूर उपत्यका में
बेमौसम बरसात में
करुण साँझ की किस उदास बाँसुरी की पुकार से
अप्रतिभ पवन में, बावली सुबह में
उड़ा है चिड़िया बन यह हृदय
है आकाश तो बहुत दूर।

घास बन, धूल-अंगार को नए
सपनों की हरियाली से ढाँप
फूल खिलने से पहले
धूप का गुस्सा सह
हुआ है यह हृदय चिरकाल दग्ध
घोर तूसानल से
चर्म-घिरे चौरासी अन्नमय पिंड लिए
हाट-बाजार की क्षुधा तमाम अंगार राख
पीठ पर लादे कछुआ-सा
नीरवता-वामन के तृतीय डग से हाय
घुसी है पाताल में चिरकाल।

आना हो तो आओ
मोतियाबिंद से घिरी आँखों से
पोंछकर सारी धूल और अंगार
मेरी आत्मा से
क्या तुम्हें नहीं मालूम
मैं हूँ तुम्हारी ही प्रतीक्षा में
आँखें खुली हैं जिस दिन से ?
दबे पाँव चले आओ,
पास बैठो ज़रा।

 

नारी

अक्सर लगती है दूर
जैसे किसी की नहीं, पर है सबकी
बादल-सी, चाँद-सी और आकाश-सी।

उसके कदमों की धीमी-धीमी आहट से,
अलता के किनारे-किनारे
नूपुर की रुनझुन में कौन आता है ?
मृत्यु या फागुन ?
पलक झपकते
कौन खड़ा हो जाता है आकर
इहलोक, अपार दुःख और यादों का अंबार?
परलोक, सुनसान क्षणों में
अनभूले, अधभूले पक्षियों की पुकार ?

कभी सुन पड़ती है, कभी नहीं
कूक निर्मम कोयल की,
पलाश में रक्त का क्रंदन।

एक तारा सिर्फ एक तारा
न जाने किस जन्म से,
न जाने किस शून्य से
किसलिए किस लोभ से
धीरे-धीरे भारी होता चला जाता है,
गिर पड़ता है आसमान से
अभिशप्त, अर्धदग्ध किसी की मुट्ठी में,
इतने में पुनः सुनाई देती है
खोये चाँद की आतुर पुकार
बुझे दीये की महक
रक्त-माँस के शहर में,
हड्डियों की गली में,
मंदिर की घंटियों की ध्वनि
ज़रा-सी ओस में
साँझ की गीली हवा में
जन्म जन्मांतर फलाँग
दुःख शोक रोग और यंत्रणा उलाँघ
क्षीण दीपशिखा-सी
किलबिल अँधेरे में है तैरती।

न जाने कितनी स्मृतियों के शव,
कितनी आशाओं, कामनाओं के फूल
ढो लाती है वह कछुए-सी।

रक्त पुते आकाश-सा है रंग उसका
आँखें हैं उसकी घनी नीली समुद्र-लहरें।

एक हाथ में है उसके निद्रादायी हलाहल
दूसरे में उज्जीवन, नील-स्वप्न का भ्रूण
वह है सारा इहलोक, परलोक
मृत्यु और फागुन।

परछाइयों से घिरा नाभिपद्म है स्तब्ध
उस काव्य-इलाके में,
फागुन का, कामना के पलाश का, और मृत्यु का
करते हैं आवाहन शब्द मेरे चिरकाल।

 

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