कविता संग्रह-तीस कविता वर्ष-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 3

कविता संग्रह-तीस कविता वर्ष-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 3

 

पुनर्जन्म

कल रात बारिश हो रही थी
कमरे की खिड़की खुली रख वह आदमी एकाकी
अँधेरे में बारिश देख रहा था।

सामने बगीचे के पेड़-पौधे
घनघोर बारिश में भीगे खड़े काँप रहे थे
रह-रहकर बेसब्र बिजली की चमक में
दिख जाता था
आकाश का थुलथुला काला मुखड़ा ।

घोर बारिश हो रही थी,
उसने अपने बचपन के गाँव किनारे
नदी पार करके स्कूल जाने के लिए
अकेले ही प्रचण्ड प्रवाह में नाव खोल दी
बचपन की तरह;
हाथ से उसके छूट गयी पतवार
प्रवाह के साथ
बह चली नाव उसकी।

नाव के इस छोर पर वह स्वयं, और
दूसरे छोर पर
देवी-प्रतिमा नारी मुस्कराती हुई
निहार रही थी उसकी ओर
उसी मृदु मुस्कान में
बहा चला जा रहा था वह
जन्म-मृत्यु के अथाह सागर में;
अपने प्रथम यौवन के
कदम्ब, केतकी, बेला और हिना की महक
एक साथ पहचान रहा था वह ।

बारिश हो रही थी।
अँधेरे के अथाह जल में
एक नाव बही चली जा रही थी
निस्संग जीवन बन।
शेष हुई आरती
बुझे दीये की गन्ध ने
घेर रखा था उसे चारों ओर से
किन्तु उठ बैठने के लिए
उसके बुढ़ापे का
नहीं था अब भरोसा।

सहसा नींद खुलने पर
अब भी हो रही थी बारिश प्रलय-सी
काँप रहे थे पेड़
पहले की तरह भीगे खड़े
पर वह आदमी एकान्त कमरे में
नहा चुका था पसीने से
खुली थी खिड़की पहले-सी
अगले जन्म के लिए।

 

समय

वर्ष माह दिन पहर पल
ग्रीष्म वर्षा शरत् हेमन्त
ऋतु चक्र के हैं ये सब खेल,
कहाँ चला जाता है समय
किस अँधेरे में, किस शून्य में ?

समय नहीं जाता कहीं
सवार रहता है उस पर हमेशा
एक अद्भुत भय, डरते-मरते
वह उन सारी चीज़ों और
विचारों में ढूँढ़ता है आश्रय
पत्थर में, नक्षत्र में, पत्ते में, बीज में -हर जगह ।

समा जाता है समय पेड़ में
बन जाता है उसका अन्तःस्वर
वर्ष प्रतिवर्ष की एक-एक लकीर;
समा जाता है समय कोमल पत्ते में
पड़ जाता है पत्ता पीला, झड़ जाता है ;
समा जाता है बीज में
फिर बीज बनता है द्रुम।

समा जाता है समय
खुले जूड़े के काले बादलों में
बन जाता है श्वेत चँवर
या घुस जाता चिकनी चमड़ी में
चमड़ी हो जाती है करुण श्लथ;
आश्रय ढूँढ़ता है समय
टिमटिमाते नक्षत्र में
नक्षत्र घुल जाता है
महाशून्य के अँधेरे में।

क्षणों के घास-फूस भर-भर चोंच लाकर
बनाता है घोंसला समय हमारे ही भीतर
बन जाता है स्मृति
कराल नख-दन्त से छिन्न-भिन्न कर
समा जाता है समय स्मृति के घोंसले में
बन जाता है विस्मृति।

 

माँ

बुलाते-बुलाते जरूर थक जाती होगी वह
लेकिन शरत्-शशि
एक बार भी
मेरे हाथ में, उसके कान्हा के हाथ में
नहीं गिर पड़ता।
बल्कि हमेशा दिन प्रतिदिन के
धूमिल अँधेरे ने
सब कुछ ढंक रखा है चारों ओर
रास्ता-घाट नहीं सूझते
एक-एक डग बढ़ाना पड़ा है टटोल-टटोल कर ।

अब जब आसन्न साँझ की
धुंधली रोशनी में मैं देखता हूँ
दीखती हैं उसी की प्राचीन सूनी कलाई
पतले-पतले हाथ,
मलिन चाँद-सा चेहरा-सूख चुकी झील-सा,
ढेर-सा लाड़ करने वाले फटे होंठ,
मन्दिर की पताका -सा है अभयदायी आँचल |

बूढ़ी उम्र में भी हूँ मैं उसका कान्हा
उठा लूँ क्या गोद में उसी चाँद को
परोस दूँ सहेज कर रखा
सारा स्नेह, सारा आदर !

 

 

पदचिह्न

कहीं किसी के नहीं रहते पदचिह्न।

न समुद्र की रेत पर
ढुलमुल पैर नन्हें बच्चे के
न इतिहास के पन्ने पर
महाप्रतापी महामहिम सम्राट के ;
न जीवन के असंख्य हताश दिनों में
अशान्त आर्त हृदय के
न मृत्यु के संक्षिप्त क्षणों में
अचल सहमे तड़पते प्राण के।
न हँसी के फव्वारे में
रूँआसे रंग-बिरंगी पोशाक पहने जोकर के
न रुलाई के ज्वार में डूबते-उतराते
हँसमुख चेहरे दुःसाहसी जीवन के।
पदचिह्न तो हैं
सिर्फ़ आविष्कार के लिए
अपरिचित, अनजान और विस्मयों के ;

पदचिह्न तो हैं
उद्घाटन के लिए
नयी अबोधता, नये अँधेरे के ;
पदचिह्न सिर्फ समाप्ति के लिए
पुरातन यन्त्रणा और पुरानी स्मृति की ।

 

स्नोइ और टगर-फूल

तेरी अप्रत्याशित सारी सेवाओं
प्रार्थनाओं और मिन्नतों के बावजूद
स्वाधीनता दिवस पर ही खून रिसा-रिसाकर
मूंद लीं आँखें प्यारी कुतिया ने।

आयी थी घर में वह
तेरे पिता की तमाम अनिच्छाओं के बावजूद
खासकर तेरी ही ज़िद्द से।

धीरे-धीरे उसकी अद्भुत माया ने
कर लिया वशीभूत सब को
बाँध लिया मजबूत डोरी से पालतू मनुष्य को,
आखिरी दिन की असंख्य शरारतें उसकी
खेल-कूद-भरा स्वभाव, अपूर्ण मातृत्व
सब कुछ उन्हीं निर्लिप्त बुझती जा रही
दोनों आँखों में इकट्ठे थे |
बेइन्तिहा इतिहास बन ।

दफ्तियों से बने जापा-घर में
आँख न खोले अपने दोनों बच्चों को
पहचान लिया था उसने
ऊष्म भात की महक की तरह।
उसके अगले दिन एक के मर जाने पर
वह कुछ ढूँढ़ती रही काफ़ी देर तक
पूरे जापा-घर में,
विस्तृत कमरे की दुनिया में
चारों ओर सूंघती रही, फिर शान्त पड़ गयी
शायद सोचा हो
उसने जना था एक ही बच्चा ।

ठीक हमारी ही तरह उसकी भ्रान्ति
सुबह के कुहासे में मानो
मृत्यु की परछाई; विस्मृति।

सिर-चटकाते भादों की धूप में
कब्रों से भरी दिल्ली की मिट्टी में
हम बाप-बेटे ने कब्र बनायी थी उसकी
टगर का पौधा रोप दिया था उस पर।

उस पौधे की जड़ें
निश्चित ही उसके हृतपिण्ड, उसके खेलकूद-भरे स्वभाव
और निर्लिप्त आँखों की खुली पुतलियाँ भेदती
भीतर गयी होंगीं
वरना ठीक उसकी आँखों-जैसे
वे टगर-फूल
मेरी ओर क्यों ताकते रहते एकटक
स्नेही लोभ से !

 

आधी रात

आधी रात होते ही
किसकी दबी-दबी-सी रुलाई
सुनाई देती है मुझे
ज़रा ध्यान से सुनने पर !
किसका रुआँसा चेहरा उभरने लगता है
अँधेरे के परदे पर
जिधर भी देखो !

फूल की पंखुड़ियों में,
पत्तों के हिलने में
सुनाई देता है मुग्ध स्वर उसका
सुनाई देता है स्वर तारों और चाँद में
सुनाई देता है
मेरी अँधेरी कोठरी के हरेक कोने में
सुनाई देता है
बादलों तले खोये सुदूर क्षितिज में

वे स्वर हैं मेरे जाने-पहचाने और
अनजान अनेक लोगों के
जो बिला गये हैं कब के
तारों की तरह सुबह के आकाश में।

असंख्य नक्षत्र और आकाश-गंगा
ग्रह नीहारिकाएँ सब उलाँघ
कुआँ कुआँ रोने का रुद्ध स्वर
फैल जाता है धीरे-धीरे
समस्त आकाश पवन में
मानों और कोई सत्ता ही न हो
सिवाय उस स्वर के
समग्र आकाश, सारी धरती और नभ-मण्डल
पशु-पक्षी, नर-नारी और कीट-पतंग
डूब जाते हैं सभी बारी-बारी से
उस रुलाई के ज्वार में एक-एक कर।

वह स्वर है
क्या नभचारी तारों नक्षत्रों का ?
आँसुओं से धुली निरंजन
काँटों भरी, आमोदित मेरी ही आत्मा का ?

कानन से लौटते
कान्हा की बाँसुरी सुनने को
व्याकुल माता यशोदा-सी
सदा कान लगाये रहती है
वह स्वर सुनने को
तृषित आत्मा मेरी।

 

हरसिंगार का स्वप्न

न होती है चिन्ता न परवाह
हाथ की पहुँच वाली टहनी पर मुस्कराता है
खिलखिलाकर चाँद-सा
खेलता रहता है
हवा, भौरे, चिड़िया सब के साथ ।

खेलता तो रहता है
पर ध्यान से देखें तो लगेगा
खोया हुआ है वह किसी और दुनिया में
किसी अज्ञात स्वप्न की मादकता
जैसे छायी हो उस पर।

क्या है वह स्वप्न ?
नक्षत्र ? निर्वाण ?
काली रात, काला भौंरा, काला चाँद ?

रात बीत जाने पर
पूरी रात पकड़कर लाये
नन्ही चिड़िया की तरह रोते-रोते
सुबह मुक्त हो जाता है वह
टहनी के आश्रय से।

रात बीत जाने पर
उसके स्वप्न का,
उसकी अन्यमनस्कता का
इतिवृत्त समझ में आ जाता है
नक्षत्र नहीं निर्वाण,
क्यों ताकता रहता है वह
धूल की सेज की ओर
खिलता है जिस दिन से।

स्वप्न नहीं उसका सुदूर आकाश
स्वप्न नहीं ज़िद्दी चिड़िया या
पागल भौरे की प्रीत
अधीर हवा की पुकार, अन्तहीन रास;
स्वप्न है उसका सारा प्रेम,
सारी हँसी-खुशी पीछे छोड़
टहनी से विदा ले
धूल की सेज पर झड़ जाना
बिन बोले एक शब्द तक।

 

चाँदनी में गाँव का श्मशान

नदी की गूंगी रेत पर
लहरा रही है चाँदनी निःशब्द

सब-कुछ चुपचाप सुनसान निर्जन
यहाँ तक कि बावले पवन ने भी
साध ली है चुप्पी सहसा ।

मानो चाँद, आकाश और गूंगी रेत की तरह
उसने भी डेर रखे हों कान
सुनने को बाँसुरी का स्वर
किसी के क़दमों की आहट आवाजाही के।

लगेगा अभी ही तो थे सभी
क्षण भर पहले यहाँ
कहाँ ओझल हो गये परछाइयों की तरह;
फिर क्षण में,
किसी भी क्षण
परछाई-सा, अशरीरी पवन-सा कोई आयेगा
कुछ बातें करेंगे रेत और पवन ।

लगेगा तुम हो युधिष्ठिर
न जाने कितने पीछे रह गये हैं
पतली धुन्ध तले
हस्तिना, मथुरा, द्वारिका
नदी किनारा, किसी सपने-सा गाँव और
सोया हुआ घर
बूढ़ा, बूढ़ी, बीमार पत्नी, बाल-बच्चे,
रोग, क्रोध, यन्त्रणा
वही सूक्ष्म मायाजाल हमेशा-सा ।

आधे रास्ते गहरे खेत में, बालू पानी किनारे
सो गये सहसा अपने भाईबन्धु, प्रिय पत्नी
सामने चाँदी से भी शुभ्र हिमालय
अपना एकमात्र सत्य है अब सामने
एक ही दिगन्त ।

फिर लगेगा
सचमुच यही है कुरुक्षेत्र
अनगिनत स्वप्न और असंख्य आशाएँ
लाखों क्षोभ, सन्ताप, ढेरों हताशाएँ
मँडरा रही हैं उन सब की विदेही आत्माएँ
झीने कोहरे में
खामोश है वह चाँदनी-सा
विलाप के सूक्ष्मतम स्वर हैं
हाँफते, संतापित कई वैधव्य के।

फिर छिन में
देखते-देखते लगेगा
यही तो है वैकुण्ठ
देव, देवी, अप्सरा, रम्भा, मेनका, उर्वशी और
ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, चन्द्र, स्वयं विष्णु
स्वरचित माया, सुरभित चाँदनी में
समा गये सहसा
लगेगा कि वैकुण्ठ का दूसरा नाम है निर्जनता
जिसे अगोरे हुए बहती है
स्मृति और समय की नदी।

 

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