कविता संग्रह-तीस कविता वर्ष-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 1

कविता संग्रह-तीस कविता वर्ष-सीताकांत महापात्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sitakant Mahapatra Part 1

 

जाड़े की साँझ

शंख, तरह-तरह की सीपियाँ
बेचते बच्चे,
सब को अपने अथाह भण्डार की
थाती बखानता चनाचूर वाला,
स्मृतियों में डूबते-उतराते
पके आम-से कई बूढ़े,
एक-दूसरे में खोये नव-दम्पती
हँसते-खेलते झुण्ड के झुण्ड कॉलेज-छात्र
सभी जा चुके हैं जिसे जहाँ था जाना
खाली कर, सौंप कर
प्रशस्त समुद्र किनारा :
शाम को टहलने निकले हल्के बादलों को
शून्य में पैंतरे भरती अस्थिर चिड़ियों को
और हमेशा चतुर खेल में मस्त
लाखों नन्हे केंकड़ों को।

 

कृष्ण-लीला

अधउड़ी फूस की मड़ैया से
टिमटिमाती ढिबरी की रोशनी से
पखाल के बासन, साग की भुज्जी और
निरानन्द साँझ से
पैर खिंचे चले जाते हैं
यमुना किनारे कदम्ब के नीचे
चाँदनी का ज्वार, झीने वस्त्र
पट-पीताम्बरी, पीत वसन
दूध मलाई मक्खन मोर पंख की ओर ।

दिन-सी बीतती है हर रात
गाँव किनारे अमराई में पेट्रोमैक्स बुझता है
दिन के निर्दयी प्रकाश में भी
नदी की रेत पर
चाँदनी-फूल का चाँद होता है
नदी के घाट पर गाँव की बालाओं की
पानी भरते समय की ध्वनि में
सुनाई देता है
बाँसुरी का स्वर।
सारे सहजन के पेड़, नारियल के पेड़
बन जाते हैं कदम्ब के पेड़
टँगे होते हैं उन पर
गोपिकाओं के अंग-आवरण।

रतजगे के कारण ग्वाल-बाल
सो रहे हैं नदी की रेत पर
आकाश की ओर मुँह कि ये,
निर्जन नदी किनारे
करता रहता है गुटरगूं
एक कबूतर।

 

 

चूल्हे की आग

न जाने किस अनन्तकाल से
जलाये बैठे हैं अपना चूल्हा सूर्यदेव
बेसुध घने ठिठुरन भरे अँधेरे में
वहीं से इत्ती-सी आग ले
माँ वसुधा ने
उपजाये हैं कितने स्नेह से, चाह से
पहाड़, नदी, पहला जीवन-स्पन्दन
महाद्रुम, पशु-पक्षी, गुल्म, लताएँ।

माँ वसुधा से रत्ती भर आग
माँग ली है ऋत्विक् ने
यज्ञकुण्ड में किया है आह्वान
अपरूप सुन्दर स्वयं अग्निदेव का;
उन्हीं के आशीर्वाद से
मेघ ने दिये हैं श्यामल शस्य ।
अन्न में सनसना उठी है
रक्त-माँस के शरीर की तोतली बोली
जड़ पसारे है आत्मा की अस्फुट, गोपनीय भाषा ।

छप्पर-उड़े, टूटे-फूटे घर में
माताओं ने जलाये हैं चूल्हे
अग्नि-संगीत से उसी के पास
सो गयी है पुस्सी बिल्ली
भूख दुगुनी करते
खदबदाकर खौल उठे हैं चावल,
उसी चूल्हे किनारे संस्कृति ने तापी है आग
कठोर हुई है, कोमल हुई है;
मनु-सन्तानों ने हाथ बढ़ाकर
छुए हैं तारे, छुए हैं चाँद ।

अब तुम लेकर आग उसी चूल्हे से
मत फैलाओ दावानल,
ऊँची-ऊँची लपटों में धधकाकर
मत जलाओ पल झपकते
गाँव, कस्बे, मन्दिर और मस्जिद
विश्वास की विरासत
आकाश और पाताल।

 

रास्ता

सुनसान रास्ता देखने से लगता है मानों वह
मेले में खोया बच्चा है, ढूँढ़ रहा है किसी को
लगता है उत्पत्ति-स्थल है जो खो गया है कहीं पीछे
लगता है लक्ष्य स्थल है जो शायद कहीं आगे है
लगता है ढूँढ़ रहा है खुद को, अपनी लक्ष्यहीनता को ।

रास्ता ज़रूरी है
कभी मुक्ति की तलाश में
दुःखदायी संसार से, अनगिनत पीड़ाओं से
और कभी नन्ही चुहिया की तरह भागने को
मृत्यु के कलूटे-बिलाव के खुले मुँह से
भय का चाबुक खाकर, भूख की ताड़ना सहकर
हाड़-माँस के पिंजरे के दुर्जेय दुःख से ।

सभी तलाशते हैं रास्ता अपने-अपने ढंग से :
मिट्टी तले केंचुआ, समुद्र में कोलम्बस
जिददी शब्दों के घेरे में कवि
चक्रव्यूह में अभिमन्यु
तरह-तरह की यातनाओं में बुधिया नाई
बोजि-तले बुद्धदेव
नीले अँधेरे के शून्य में एकाकी नक्षत्र ।

साँझ के आकाश में घर लौटती चिड़िया
रास्ता, रास्ते के मील के पत्थरों के निर्देश नहीं ढूँढ़ती चलती ;
आनेवाले कल की यात्रा के लिए संकेत नहीं छोड़ती :
बल्कि बनाती चलती है रास्ता डैनों के कम्पन से
मिटाती चलती है रास्ता शून्य-नीले सिलेट पर ।

लगता है रास्ता हर जगह निरन्तर विद्यमान है
पर रास्ता कहीं भी नहीं
हर स्थान शून्य स्थान है,
रास्ता कहीं नहीं।

और कभी लगता है
पंख झाड़ते ही रास्ता है
डग बढ़ाते ही रास्ता है
मन का चौखट लाँघते ही रास्ता है
कोई शब्द कहते ही रास्ता है।

रास्ता तो बस समय की परछाई है
पल भर में
शून्यता में ही घुल जाता है ओस की तरह
रास्ता जो स्वयं ही एक अशरीरी राहगीर है।

रास्ता महाशून्य को,
बूँद का साष्टांग प्रणाम, विनम्र निवेदन है
रास्ता महाकाल को
क्षणों की अंजलिबद्ध पुष्पांजलि है।

 

पहली छुअन

पहला अहसास
विकल्प नहीं उसका।

वह अहसास प्रेम हो, प्राप्ति हो
वैराग हो, विरह हो
यन्त्रणा हो, अनभूला स्वर्ग हो
पश्चात्ताप हो, सघन पुलक हो ।

कहाँ है उस अंगुली की
पहली छुअन की पहली महक ?
बारिश से मिट्टी भीग गयी थी उतने में ;
सारे तारे, चाँद, सूर्य भरकर गोद में
उतर आया था आसमान नीचे उतने में;
समुद्र लाँघने को तट आतुर था उतने में
अमृत-कण छितरा गये थे, उतने में।

अब तो सुदीर्घ मास वर्ष तक
आसपास, आँखों में आँखें, चेहरों में चेहरा
हाथ थामे टुटहा पुल
दुर्गम रास्ता संसार
खुद को संसार को समझने की कोशिश में
निर्जन, शब्दहीन असंख्य हैं प्रहर ।

अभ्यास की धूल है अब चारों ओर
कभी स्मृतियों की आरामकुर्सी में
तीस कविता वर्ष :21
कभी सपनों के हिंडोले में
कभी झंझटों के पिंजड़े में
तो कभी थकान के बिस्तर पर
दो प्राणी।

कैलेण्डर के निर्जन भोंथरे पहाड़ की तलहटी में
सूर्यास्त, घर लौटती चिड़ियाँ
समय बीत जाता है
बीत जाता है समय
उस पहले अहसास की
यादें कुरेदकर।

कभी अपरिचित राज्य की राही
ये अँगुलियाँ अब निस्तब्ध, खामोश हैं
मन मसोसकर।

 

पिता, स्वर्ग

सारे कर्मों से जुड़ी थी
बस वही एक चाह :
स्वर्ग।

दुर्गामाधव बोले बिना
घर से बाहर पैर नहीं धरते
दरवाजे से
खाली हाथ भिखारी नहीं लौटेगा
ब्राह्म मुहूर्त में स्नान तर्पण गीता-पाठ ध्यान
उगते सूर्यदेव को
भर अंजुलि पानी, प्रणाम ;
मेरे बचपन के भोर की मीठी नींद में
मिल जाता था
उन्हीं के घरघराते गले का प्रार्थना-स्वर ।

बरसात के कीचड़ भरे गाँव के रास्ते में
सौदा का थैला लिये दु
कान से लौटते व्यक्ति ने
याद किया होगा देवता का चेहरा
नन्हे बच्चे की मुस्कान-सा
अँधेरे आकाश में तारे-सा
छप्पर-उड़ी पाठशाला में
सामने छड़ी रख
बच्चों को सबक सिखाते समय
ब्रह्मा विष्णु महेश ही पूरी पाटी में दिखे होंगे
घर के तमाम जंजालों की चोट

कपटी संसार-जाल;
इन सबको लाँघ
वही अनन्त मायावी सपना
शून्य में पसरा होगा
बादलों तक, बैकुण्ठ तक
और हाथ के इशारे से
‘चले आओ, चले आओ’ कहकर
कितना बुलाया होगा !

स्वर्ग का स्वरूप
क्या था उनके मन में ?
शायद कोमल एक नदी
बारिश की आशीष धारा
कनेर मधुमालती केतकी
घने जंगल में
एक मन्दिर और आरती का स्वर
रोग यन्त्रणा रहित
एक सरल पृथ्वी।

और देवतागण ?…
दीर्घ, शुभ्र देह, लम्बी नाक, हाथी-कान
फक्क सफेद धोती और कुर्ता
मस्तक पर चन्दन और आँखों में सपने ।
पुरी स्वर्गद्वार की गीली रेत पर
अग्निदेव के काँपते हाथों में
उन्हें सौंप देने के बाद
न जाने वे कहाँ गये
मालूम होगा तो स्वर्ग में रहनेवाले
उन कपटी देवताओं को ही होगा।

 

लौट आने का समय

लौट आते हैं घर
धूप चुभने पर,
रात को चाँदनी-फूल खिलने पर
मूसलाधार बारिश होने पर, ठण्ड पड़ने पर
सभी लौटा देते हैं हमें घर
कितनी सहज सरल मुद्रा में !

लौट आने की राह पर
पैरों के निशान बने होते हैं
न जाने किस-किस के
जो लौट गये हैं कहीं और
नहीं लौटे हैं घर
इन्तज़ार करते-करते बीवी-बच्चे उनके
ऊँघ रहे हैं नींद में।

फिर भी आँसू नहीं झरते
देख-देख अनहोनी
इन्तज़ार रहता है दिन बीतने पर, रात होने पर
लौट जाऊँगा घर, चिड़िया के घोंसले में
निर्जन राह में चिड़िया गीत गाती है
क्या वह जानती है उसी रास्ते से एकाकी
लौट रहा है एक आदमी मन मारकर ?
ऐसे में कितना आत्म-विश्वास भरती है चिड़िया !
सचमुच ! खोये हुए लोगों की यादें छिपी हैं
आकाश, मेघ, चिड़िया, मलिन पृथ्वी में।

हाथ बढ़ा देता हूँ आकाश की ओर
क्षण में बन जाता हूँ मैं आकाश
हाथ बढ़ा देता हूँ हवा की ओर
बन जाता हूँ हवा की प्यास
हाथ बढ़ा देता हूँ शून्यता की ओर
बन जाता हूँ शून्य
हाथ बढ़ा देता हूँ निर्जन घर की ओर
बन जाता हूँ वीरान जंगल की राह ।

आओ, आओ कहकर मैं तुम्हें बुलाता हूँ
उत्तेजित आवेग से, अस्थिर स्नेह से
आओ-ज़रा और पास आओ
यह देखो मैं लौट रहा हूँ अकेला
स्मृति की रेत सहलाता
अक्षय मुद्रा में।

अभी ही हुआ है पूरा काम मेरा,
बस दिन ढलने ही को है
सूर्य लौट जाएगा
घर पर बैठी इन्तज़ार करती माँ की गोद में
क्या तुम मुझे चूमकर, मेरा सिर सहलाकर
‘कितने बुद्धू हो सच’ कहकर
टिका नहीं लोगे अपनी शून्यता में ?

 

अनजान आदमी

आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं वे लोग मुझे
कभी डबडबायी आँखों से
कभी निरीह और प्रश्नभरी आँखों से
तो कभी विस्मय और
सन्देह से तटस्थ, उत्ताल आँखों से।

क्या हूँ परिचय उन्हें अपना ?
नाम गाँव बाप दादा, इतिहास जाति गोत्र
नहीं चाहते वे लोग यह सब जानना
फूलों के पौधे, चिड़ियाँ और
साँझ के खामोश सितारे
जिद्दी हवा और मुलायम धूप
अपलक ताकते रहते हैं मेरा मुँह
मानो मैं किसी और दुनिया की
किसी दुःस्वप्न रात्रि की
कहानी का नायक हूँ
इतिहास जिसे कब का भूल चुका है।

अन्दर आँसू दबाये रहता हूँ ;
एक अपरिचित सत्ता रोती है
कुछ याद करके
कबूतरी-सी गुटरगूं करती हुई
अन्दर सहसा बजती है
बाँसुरी हवा की
धूप की लहरें टूटती हैं लहू तट पर
माँस के पौधों में
तारों की तरह खिल उठते हैं फूल
असंख्य रंग-बिरंगे फूलों और
शब्दों की चिड़ियाँ गाती हैं
अनभूले शोक-गीत
शंकाकुल, व्यथातुर अनचीन्ही सुबह ।

जाने-पहचाने से अनजान और
अनजान से जाना-पहचाना
बन जाता है एक आदमी
हवा, धूप, तारों में बह जाता है सुदूर आकाश में
स्मृति बन जाता है,
बन जाता है शुभ्र उदार गीत का स्वर
चिड़िया और फूल की आँखों में
परछाई उसकी झलकती है अनमनी
परिचय पुनः मिलता है
लौट आता है वह आदमी
निर्जन अरण्य पार कर
राह भूले बिना।

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