कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 9

कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 9

थकना कैसा, रुकना कैसा

थकना कैसा, रुकना कैसा
जब पथ भरा हो शूल से
रोके जब ये हवाए तुम्हारा पथ
मन हर्दय जब तुम्हारा हो जाये ब्याकुल
कदम होने लगे जब
तुम्हारे पथ विपरीत
सुनाई देने लगे जब तुम्हें
यहाँ चीखना, चिल्लाना
साँसे जब तुम्हारी लगे हाँफने
ना चल सको जब तुम
इस वक्त की रफ्तार से
कर लेना याद तब तुम
वह बूढ़ी आँखे
अपना वह बिता हुआ बुरा अतीत
देख लेना एक नजर
उस ऊँचे सीना ताने शिखर को
जो भरा पड़ा है
काँटों के बीच की हरियाली से
उन उबड़ – खाबड़
कंक्रीट के रास्तो को
जो हो जाते हैं
शिखर पर पहूँचकर एक

फिर रुकना कैसा
थकना कैसा
जब पथ भरा हो शूल से

अजब, गजब

अजब गजब इस दुनिया के निशान देखें
हर गली हर चौक चौराहे पर
अलग-अलग भगवान देखें
कोई कहै अल्लाह कोई कहै राम
कहीं गुरुवाणी कहीं जलते हुए
मोमबत्तियों के निशान देखे ।

अजब गजब खेल इस दुनिया का
मन के भीतर बैठे ना जाने कितने रावण
फिर भी मुंह मैं जपते सब राम देखें
फूलों कम्बलों हारौ सोने से सजे यहां भगवान देखें
हे ईश्वर एक –
फिर भी धर्म के नाम पर बटते इंसान देखें ।

बना दिए बिल्डिंग मंजिलें जिन्होंने हजारों
अब भी उनके हाथों में छालों के निशान देखें
ओड़े जो मुखोटा धर्म का
एसो को पूजते इंसान देखें
कैसी यह विडंबना इस धरती की
सरहदो पर इंसान से ही गोली खाते जवान देखें ।

करे जो छलावा उनके सोने के मकान देखें
धरा के जो है मालिक
उनके पानी से टपक ते हुए मकान देखें
अनेकों मरते यहां हमनें भी किसान देखें ।

कैसी है मेरी मालिक तेरी माया
अजब गजब इस जहां पर
तेरे नाम को बाटते
इंसान के रूप में हैवान देखें ।

आज फिर वह मुझसे मिलने आई है

आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है
कुछ मेरी कुछ अपनी
कहने सुनने आई है

शायद दिल में उनके
रह गए होंगे
कुछ छुपे हुए जज्बात
गले मुझे लगा कर
आज फिर वह रोने आई है

आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है ।।

इस वक्त का खेल है
ऐ बिष्ट – बड़ा अजीब
जो बैठे रहे
घमंड की चोटी पर
बढ़ती उम्र में उनको
अब ये तहजीब आई है

हम भी हो चुके हैं
अब थोड़ा निष्ठुर थोड़ा निर्दयी
हमने भी तो इस जहां में रहकर
यही रंगत – संगत पाई है

आज फिर वह
मुझसे मिलने आई है ।।

है भीड़ है कोतूहल
अब इस जनाजे में मेरे
मेरे बैरंग हो चुके
ये अश्रुओं की धारा
देखो बंद आंखें मैं
अब मेरी वह
देखने आई है

गीले शिक़वे हो
अब कैसे दूर

दुनिया जब लेकर
फूलों वाला हार
अलविदा कहने आई है

देखो आज फिर वह
मुझसे मिलने
चोखट पर मेरी आई है ।।

आजादी हमें जान से प्यारी

गूंज उठी धरती
गूंज उठा आसमान
आजादी के नारों से
विजय उदघोष हुआ-
वीर सपूतों के प्राणों से ।

दहक उठी थी जब
आज़ादी कि आग –
जन-जन कै रगो में
भारत प्यारा था
अपने प्राणों से ।

लहूलुहान हो गया रक्त
जब वीर जवानों का
देश बचाया फिर भी गद्दारों से
गूंज उठी धरती
गूंज उठा आसमान
जय हिंद के नारों से

युग था वह स्वर्णिम
देश भक्तों का
सुभाष -आजाद -भगत
टिमटिमा उठा अंबर
इन अनगिनत
आलोकित तारों से
जला गयै लौ देश भक्ति कि –
अपने प्राणौ कै बलिदानौ से !!

आरती शिव जी की

जय शिव,शंकर, त्रिलोक नाथी !
रुद्र,नीलकंठ,महादेव ।
अंनगिनत नाम वासी ।।
गंंण,गणेश,पार्वती ।
संग कैलाश वासी !।

जय,जय,शिव, शंकर त्रिलोक नाथी !

मुखमंडल, चंद्र, गंगा,जटा, धारी ।
हस्त विराजत त्रिशूल, डमरू,विष, धारी ।।
संहार,सृष्टि, उत्पत्ति धारी ।
शिव अर्थ कल्याणकारी ।।

जय,जय,शिव, शंकर त्रिलोक नाथी !

शिव प्रेम,स्नेह,धर्म धारी ।
वेदो शिवम, शिवो वेदम।।
अनंत काल शिव ही मानव ।
ललाट, ज्योति धारी ।।

जय,जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

घी, शकर, शहद,दुध दही ।
शिव आराधना अति सरल ।।
बिल्वपत्र,भांग,धतूरे,पुष्प,
पन्चामृत,महामृत्युंजय मंत्र ।।
अति सुख कारी !

जय, जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

रुप लिंग, शिव, शक्ति ।
एकल रूप, सामान वासी ।।
धरती आधारा, आकाश लिंग ।
शिव ही बारह : ज्योतिर्लिंग वासी ।।

जय, जय,शिव,शंकर त्रिलोक नाथी !

शिवलिंग पूजत जो नर नारी ।
सन्तान, धन्य, सद्बुद्धि, दीर्घायु ।।
स्थान बनत वही तीर्थ ।
मनुष्य होत, शिव स्वरूप धारी ।।

जय,जय,शिव शंकर त्रिलोक नाथी !

बाल कविता -उफ्फ यह गर्मी

अ आ इ ई उ ऊ
ए ऐ ओ औ अं अः उहम, उहम
हाय गर्मी उफ्फ यह गर्मी
मुझे ना भाए यह गर्मी
जग का कैसा यह खेल निराला
ऋतुए करें हैं गड़बड़ घोटाला
चंदा मामा तुम जल्दी से आ जाओ
अपनी शीतल छाया हमें दे जाओ
सूरज चाचू ने हमको धो डाला
तरबतर कर दिया है
हमारा हर अंग शाला
बाहर निकलू मां मुझे डांटे
दिनभर कमरे में दिन है मैंने काटे
कहती बगल वाली मुनिया
सूरज चाचू से इतना क्यों घबराना
पिंटू तुम एसी कूलर घर पर लगवाना
आओ गली में ठंडी रस मलाई खाएंगे
सूरज चाचू को दिखा दिखा कर चीढ़ाएंगे
गर्मी हम यह दूर भगाएंगे ।

कोई तो समझें

कोई तो समझें दिलो के दर्द को
लिखें हूए कवियों की, कलमों की ब्याख्या को
सुलग रहे मंन के भीतर इन अनगिनत जज्बातों को
कह – कहाँ रहे ठंड में कंपन, इन दर्दनाक आवाजों को
तलाश मिलों चल रहे, मुसाफिरो की मंजिलों को
आते हूए इन तूफानों की आहटो को
उजड़ते हूए किसानों के खेतों की ईन महेनतो को
कोई तो समझें दिलो के दर्द को ।
बिछड़ते रोते हूए अपनो के दर्द को
आँखों में छलक रहे इन जज़्बातों को
गूँजती किलकारी, भुख से बच्चों की
करुणामय आवाजो को ।
बारूदों के ढेरों पर बैठे सैनिको के आत्म – सम्पर्ण को
कोई तो समझे अमर बलिदानो के बलिदानो को
लोटे नही जो वापस, उन आँखों की राह देखती
अनगिनत सुहागिनों के बलिदानों को
देहज,जाती, धर्म के नाम से
लूटी हूई नारी के अभिमानो को
कोई तो समझें दिलो के दर्द को ।

अब में क्रांति लाऊं कहां

अब में क्रांति लाऊं कहां
नेताओं ने देश लूट चुका
नौजवान हमारा अब सो चुका
अब में क्रांति जगाऊं कहां ।
लगते जहां देश विरोधी नारे
चाहिए अभिव्यक्ति की आजादी
फेंके जाते सैनिकों पर पत्थर
ऐसा दूसरा देश में बतलाऊं कहां
अब में क्रांति लाऊं कहां ।
लूट खसोट की राजनीति
समाज बटा वर्गों में
धर्म के नाम पर होते दंगे
ऐसे में क्रांति, अब में जगाऊं कहां ।
लग रहे जहां फैशन के मेले
इज्जत अपनी छुपाए कौन कहा
चकाचौंध, धन-वैभव नशे की
बीता स्वर्णिम युग क्रांति का
देश भक्ति की ज्योत
अब जगाऊं कहां
अब में क्रांति लाऊं कहां ?

 

 

 

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