कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 7

कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 7

नव-वर्ष, कुछ यूं मनाएं

आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
अंधेरी राहों में,
एक उज्वलित,
दीपक जलाए,
पनप चुकी यह,
जो मन के भीतर,
अज्ञान की विचारधाराएं,
इन पर अपना,
ज्ञान रूपी विराम लगाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
कौन छोटा,
कौन बड़ा,
ऊँच क्या,
नीच क्या,
सब उपजित,
एक ही,
प्रकति की संतान,
तब मनुष्य वाला,
अपना कर्तव्य निभाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
जब दिखे तुमको,
बेबसी से अपने,
लड़ते हुए बूढ़े, बच्चे,
तब आत्म मगन,
ना हो जाना तुम,
तब हाथ अपना
मदद वाला,
आगे बढ़ाएं,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
चल देते हैं हम,
रंग शालाओं में,
इस नव वर्ष,
पूजा स्थलों मैं,
जाकर जश्न मनाएं,
खड़े हो चाहे,
धरातल पर,
या शिखर पर,
मैं, अहम अपना,
त्याग कर जाएं
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं,
क्यों डूबे हम,
अंतिम छण,
व प्रथम छण,
इन मधुशालाओ में,
खड़े हैं मध्य जब,
बाईश वे द्वार के,
कुछ बेहतर करने का,
तब प्रण निभाएं,
आओ ईश नववर्ष,
मानवता का,
धर्म निभाएँ,
आओ नव-वर्ष,
कुछ यूं मनाएं !

 

पहाड़ी की पीड़ा

रोज चलते हैं मिलो
उबड़ खाबड़ पथरीली राहों मैं
सुविधाओं से अनभिज्ञ
लिए जज़्बातों का वेग भरा ।

देखो तप्ती ग्रीष्म की इस ऋतु मैं
खेतों से उपजाये आजीविका
शरद ऋतु का ये सफेद चादर
जब कर दे तंन, मंन को भी कंपन ।

पहाड़ौ की रातों का ये सुनसान अंधकार
जंगलों की यह निर्दय आवाजें
सर्दियों की यह ठिठुरन
समझीं किसी ने पहाड़ी की पीड़ा ।

दूर से ये पर्वत श्रृंखलाएं दिखतै हैं
पर्यटकों को जो अति सुंदर
समझीं वेदना घास काटती हुई
किसी विहरण की ।

शुख नहीं अपनो का
निहार रही अम्मा, परदेश को
लिये गागर मिलो चलते हुए
फूंक- फूंक कर इन गीली लकड़ियों को ।

दीख रहें ये जो पहाड़ हरे भरे
लुभाते जो मंन सैलानियों का
छुपी वेदनाएँ इनमें अंगिनत ।

समझी किसी ने पहाडी़ की पीड़ा ?

मैं राही तेरे प्यार का

मैं राही तेरे प्यार का,
ख्यालों मैं तेरे जागा, जागा सा रहता हूं,
दिन, पहर मेरे कट जाते हैं
रातों को यादों मैं तेरी
खुद मैं ही खोया, खोया सा रहता हूं ।
बहुत गमगीन, उदास हुई हैं, मेरी ये शामें
जब, जब भी तुझसे बिछड़कर मैं रहता हूं,
ओ मेरी रूपसी प्रियतमा,
प्रेम तेरा एक निर्मल पवन वेग
मैं इसमें मन्द,मन्द सा बहता रहता हूं ।
मैं राही तेरे प्यार का —–

कितना अधूरा जीवन मेरा तेरे बिन
हर क्षण याद तुझे मैं करता हूं,
आंखों में बसाई मैंने सिरत तेरी
यादों को तेरी सीने से लगाए मैं रहता हूं ।
है जो तू मुझसे इतनी दूर
यही गम मैं खाए बैठा हूं,
अपना भी होगा मिलन
यही मैं इस पागल दिल को
कब से समझाए बैठा हूं ।
मैं राही तेरे प्यार का —-

सफर

ज़िन्दगी के सफर मैं
मुसाफ़िर हजार मिले
कुछ फूल जैसे खिले हूऐ
किन्ही से काँटों के हार मिले,
हर चौक – चौराहे पर अंगिनत भीड़ – भाड़ थी
कुछ बस गए यादों मैं
कुछ “जी” के जंजाल मिले,
ज़िन्दगी के सफर मैं कुछ दोस्त नयै, पुराने
कुछ दिलदार मिले,
कुछ बन गये हमदर्द
किसी से “नैनों” के तार मिले,
बिछड़ति हूई जमीं बिछड़ते रिश्ते – नातेदार, मिले,
कुछ घर कर गये मन मैं,
किन्हीं के दिलों के द्वारा बंद मिले,
सफ़र यूं ही दुनियां का चल रहा, यूं ही चलता रहेगा
राहों मैं ऐ “बिष्ट” यही आरजू मेरी,
मुकमल मेरे खुदा का, मुझे प्यार मिले ।

फिर समृद्ध होंगे ये पहाड़

फिर समृद्ध होंगे ये पहाड
अंकुरित नव बीजों से
निर्जीव पड़े हुए घरों के आंगनों से
रहता नहीं कभी धुंआ छंट जाते हैं बूरे वक्त
टीस मन, ह्रदय में
है स्वावलम्बी पहाड़ी – किस बात की,
कट रही तेरी पहाड़ों में जो भी रह – गुजर
हिमालय जैसी – है पहाडी़ शख्सियत तेरी
वक्त का वो तेरा इम्तिहान होगा,
एकांत पड़े इस देव – धरा पर
गूजेंगी फिर मधुर – ध्वनियां
लह -लहराती फसलों से
धरातल ये फिर तेरा विराजमान होगा,
उठ चल – हताशाओं का ये
मुखौटे से अब नकाब हटा
बदलती नहीं तकदीर
आशाओं और रेखाओं से
चमकती है रोशनी हमेशा
अंधेरे से लड़ने के बाद,
समृद्ध होगा फिर ये तेरा पहाड
लहू मैं अपने – कुछ करने की आग जगा,
जीवन बधा मानव का आशाए, बाधाओ से
शिव की इस भुमी का तू ही मालिक
फिर क्यों तेरी ये रुदंत करुण पुकार
हे देव भूमि पुत्र – अंकुरित नव चेतनाओं से
फिर समृद्ध होंगे ये पहाड !!

कुछ मेरी, कुछ अपनी -कह गया आज यह चाँद

कुछ मेरी कुछ अपनी कहे यह चाँद
निहार रहा कब से- ओढ़े सफेद बादलो की
ये मखमली चादर, मेरे आंगन को
नजरों का प्रेम मिलन हो अब कैसे
आहिस्ता – आहिस्ता गुजर गया
मेरे मन के आंगन से
यह अधखिला खिला हुआ चाँद ।
है रुठा रुठा –
थोड़ा खुद में खोया हूआ यह चाँद
देखे निहारे टकटकी सा लगाए हुए
मन के मेरे इस ह्र्दय – दर्पण को
कुछ अपनी व्यथा, कुछ मेरी व्यथा
कह सुन – गया आज यह चांद ।
कभी दिख रहा, कभी छुप रहा यह चाँद
दामन में लिए- अपने हजारों उज्वलित खुशियां
सोया नहीं रुका नहीं अनगिनत वर्षों से
घर में मेरे घर कर गया आज यह चाँद ।
है सुबह की लालिमा की परछाई सा
ह्र्दय में लाखों ख्वाहिशो को जगाता हुआ
खुद रहा धधक – दर्द असहनीय लिये हूऐ
दिखा रहा, राह, राही को फिर भी
जमावाड़ा लिये तारों का यह चाँद ।
कुछ मेरी, कुछ अपनी –
कह गया आज यह चाँद ।।

पथिक

चल रहा हूं,
दुनिया की भीड़ में,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां,
हैं दिखते चेहरे
अनगिनत यहाँ,
कुछ खुश,
कुछ मुरझाए हुए,
ढूंढूं कैसे गम, खुषी,
मिट जाते हैं,
कदमों के निशाँ भी यहां,
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां।

मसगूल दुनिया अपने में ही,
दिल का दर्द,
अपने छलकाऊ कहां,
छटपटा रही है जिंदगी,
मौसमों की तरह,
चंचल इस मन का,
ध्यान लगाऊं कहां,
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक,
मैं भी यहां ।

ढूंढ रहा हूं, खोज रहा हूं,
हुं विचलित सा,
मोलभाव के इस जाल में,
लग रही बोलियां,
इंन्सानौ की भी यहां,
कुछ रिश्ते अनजाने,
कुछ जाने पहचाने,
चल रहा हूं,
निभा रहा हूं,
बनकर वक्त का,
मुसाफिर मैं भी यहां
चल रहा हूं,
बंन कर पथिक
मैं भी यहां !

बचपन वाली दीवाली

अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली
वह फुलझड़ी वह आनार
वह फट, फट, फट
पटाखों वाली लडि
लियै हाथ, जैब मैं
लड्डू, खिल, खिलौनों
चेहरे पर मासूमियत
मुख में सबके लिए
Happy dipawali
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली ।

वह बोतल वाले रॉकेट
वौ अनार,वह फुस – फुस बम
डर वह पटाखों में
आग लगाने का
वह मां की डांट फटकार
चकरी वह थाली वाली
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली ।

बड़े हो गए हम
या रिश्तौ में
मिठास कम हो गई
वो बचपन वाली
दिवाली ना जानै
कहाँ गुम हो गई !
अब लौट कर
क्यों नहीं आती
वौ बचपन वाली दिवाली !

 

 

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