कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 6

कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 6

ऐ पहाड़ – मैन तुझे दिया ही क्या

ऐ पहाड़ –
मैंने तुझे दिया ही क्या ?
वह पलायन का दर्द
हरे भरे खेतों की वह
अब बंजर भूमि
वह बूढ़ी आंखों में जागती एक आशा

मैंने ही तो किया वीरान
वह तेरा हरा भरा आंगन
खेतों की वह मुँडेर पर
अब कहाँ वह कोलाहल
आम की डाली पर
अब कहाँ वह घु घु ति
मैंने ही तो बंद किये
तेरे वह महकते आँगन
अब कहाँ वह
दिए कि रौशनी तेरे कुल मंदिर मैं

देखों मैं भी तो बन गया हूं
अब एक पर्यटक
तेरे सुख दुःख
तेरे त्योहारों का
मैं अब कहाँ संग साथी

ऐ पहाड़ –
मैन तुझे दिया ही क्या ?

मानव

हां मैं हूं हाड मांस का पुतला
पर मुझ में है भावनाएं अंगिनत
खुश होता हूं –
दूसरों को खुश देखकर
दुखी होता हूं –
दूसरों को दुखी देखकर

माना मुझ में है सत्य की कमी
पर कभी मैंने अपना जमीर नहीं बेचा
धन पराया देख
कभी मैंने अपने ख्वाब नहीं बदले
तन पराया देख
कभी मैंने अपने मन नहीं बदले

खुश हूं अपनी बसाई दुनिया में
औरो के घर की चार दिवारी में
कभी हस्तक्षेप नहीं किया
हूं किसी की नजर में अच्छा
हूं किसी की नजर में बुरा

रहता हूं इस समाज में
इसलिए तर्क-वितर्क भी करता हूं
और आप ?

आजादी

मौन वाणी कब कहां
इंकलाब लाती है
कलम उठे जब सत्य की
तभी आजादी कहलाती है ।

सलाखों के पीछे बंद होकर
कब किसने कहा जंग जीती है
मिले हैं जब कंधों से कंधे
तभी आजादी की सुगंध आती है ।

निहत्थे हाथों ने
हमेशा गुलामी ही दी है
ऊठै जो हाथ युद्ध के लिए
वो ही वीर बलिदानी कहलाए हैं ।

क्या रखा है इन मैंखानो मैं यारों
नशा नाच गाना
सब खेल इस जवानी का
कभी मिले जो फुर्सत तो देख लेना
आजादी की इस जमी को
जो इतनी मुश्किलों से हमने पाई है ।

बेटियां

घर – घर की रौनक
बहार होती है बेटियां
बनकर रूप लक्ष्मी
सिंह पर भी सवार
होती है बेटियां

बनकर पापा की परी
मां की मददगार
होती है बेटियां
सर्वगुण संपन्न ज्ञान की भंडार
होती है बेटियां

इन्हीं से सजे
घरों के त्यौहारों की रंगोली
बन जीवन संग साथी
इस धरा की बुनियाद
होती है बेटियां

ना समझो तुम इसको दुर्बल
रुप इसके अनगिनत
हर रूप मददगार
होती है बेटियां

यह नहीं सीमित
अब चूल्हे – चौकी तक
सोच, परम्पराऐ रुढ़ीवादी मानव की
बदल रही हैं बेटियां

घर – घर की रौनक
बहार होती है बेटियां ।।

है नारी तुम महान

है नारी तुम महान,
त्याग की तुम मूरत,
धन नही, वैभव नहीं,
तुम्हें चाहिए सम्मान,

धैर्य, संयम कि,
तुम परिभाषा,
उपजित शब्द,
तुम सै हि बलिदान,
है नारी तुम महान,

खुदा की बनाई,
तुम जादूगरी,
तुम ही ग्रहणी,
तुम ही रूप ममता,

तुम ही जीवन संग साथी,
रूप तुम्हारे अनगिनत,
मानव जाति कि,
तुम ही पहचान,
है नारी तुम महान,

तुम पर ही नियम लागू,
ईस प्रकृति,
घर, संसार कै,
तुम बिन व्यर्थ,
फिर भि यह जहान,

कैसे करूं,
तुम्हें परिभाषित,
तुमसे ही प्रारंभ,
नीव ईश जग की,

तुम ही कुल,
तुम ही मर्यादा,
तुमसे ही उपजित,
वेदों का ज्ञान,
है नारी तुम महान !!
तुम् महान, तुम् महान, तुम् महान ।।

रंगोली

बनी सप्त रंगों से यह रंगोली
तेरी मेरी हम सब की
पहचान यह रंगोली
कोई लाल कोई पीली कोई नीली
कहती कुछ न कुछ,
अपनी व्यथा यह रंगोली ।

जब घर आंगन दीप जले
तब द्वार द्वार सजे यह रंगोली
कभी बन कर खुशियां
कभी मेहंदी बन दुल्हन की
विदा होती यह रंगोली ।

जब छाए पर्वतों पर काले बादल
बरसे मेघ बन उमड़ घुमड़
तब लिए धूप संग
इंद्रधनुष बने यह रंगोली ।

जब आए मोसम
रंगों के त्यौहारों का
उड़े गुलाल बनकर
काला पीला नीला
तब हर हाथ हाथ
हर गाल गाल बनकर
रंग लगे यह रंगोली ।

बिन रंग व्यर्थ जीवन
आओ घर घर
सजाएं यह रंगोली ।

हरि ॐ

भटक रहा जीवन
बिन “हरि ” बंजर – बंजर
कोई बता दे मुझे
पता ” हरी” का
धड़क रही मेरी सांसों में
यह जो धड़कन भी
उसके नाम कर दूं ।।

ऐ हरि ” मोहे ना दिखा
जीवन के तू इतने रंग
मुझे भी रंग ले अपने रंग मैं
अपने जीवन के सारे रंग
” हरि “तेरे नाम कर दूं ।।

खोजें जैसे मृग कस्तूरी वन वन
तड़प रही बिन जल मछली
मन मेरा व्याकुल
ऐसे ही “हरि मिलन” को
कोई बता दे मुझे पता
“मोहे हरि” का
यह दौलत शोहरत
उसके नाम कर दूं ।।

हूं रहागिर –
तेरी बनी मैं इस दुनिया का
भ्रम फिर मुझे यह कैसा
यह मेरा वह तेरा का
खोया हूं सोया हूं
जग की तेरी इस निर्मित माया में ।।

कोई बता दे मुझे पता
मेरे “हरि ” का
इन हार जीत के भ्रम को
ऐ मेरे ” हरि ”
आज तेरे चरणों में नीलाम कर दूं ।।

पतझड़

ऐ मोसमें बहार
तूने भी तो देखे होंगे
मौसम पतझड़ के
हुआ तुझे क्या अहसास
जब लगे मोसम पतझड़ के ।

सुख रही थी
तेरी यह डाली
या रंग उतर गये थे
तेरे इन पत्तों के

कोई तो परिंदा
तेरे पर बैठा होगा
पंख फैलाकर
जब सुख रही थी
तेरी एक-एक पत्ती ।

सुना है मैंने भी
कोयल की कूउ, कू, कू से
पपीहे की पीहू से
गुजर रही तेरी राहों के
इन सर्द मौसमी हवाओं से
खालीपन तेरा, तेरे मन को
तब कचोटता होगा
लगे थे मोसम जब पतझड़ के

तेरी उन दिन- रातों का
तब कौन था साथी ?
जब सुख कर गिर गए थे
तेरे सारे पत्ते ।

मेरे घर के आंगन मैं भी
गिर कर आये थे – तेरी डाली के पत्ते
कुछ थे सूखे
कुछ अपने मैं ही खोये हूऐ
कुछ मोसमें ब्यथा –
कहते हुए तेरे पतझड़ के ।

सुन रे मोसम तू पतझड़
भटक ना जाना तू अपनी राह
वक्त की वही पुरानी रीत
आज मोसम पतझड़
कल ऋतु इसके विपरीत ।।

जीवन पथ

मानव जीवन पथ
जैसे एक रथ
घूमता पहिया
जैसे समय चक्र
मस्तिष्क ज्ञान
धर्म – अधर्म
का सारथी ।

बाल्यकाल अवस्था
धूप छांव का आंचल
मासूम नटखट बचपन
खेल खिलोने व सहपाठी

समय चक्र बड़ा विचत्र
युवा अवस्था
गुरुसंग ज्ञान प्राप्ति
बना जीवन आधार ।

बढ़ती उम्र
उपजीत मोह माया गुण
कभी राजा कभी रंक
मानव जीवन पथ
कब सरल
कभी काँटे कभी शूल

जब उम्र हो पचपन
तब याद आये बचपन
अँतिम पड़ाव
कौंन संग कौंन साथी
ना दूल्हा ना दुल्हन
ना कोई बराती

समय चक्र
बड़ा विचत्र
यंही जीवन
यंही मरण ।

आज इतवार है

आज इतवार है,
लग रहा घर मे जैसे,
कोई मन रहा त्यौहार है,
नाच रहे भीगे, पकोड़े,
इन रंगीले तेलों मैं,
माँ का मुझ पर कैसा,
उमड़ा ये आज् प्यार है,
आज इतवार है,

आयी दरवाजे पर ये,
आने की किसकी आहट,
लिए फल, मिठाई, बिस्कुट,
खुश मन, चहेरे पर मुस्कुराहट,
आज इतवार है,
आई मेहमानों की बाहर है,

चाय, नमकीन, cold drink,
सजे थालों मैं,
सुख, दुःख, भविष्य,
के बातों की,
लगी कैसि ये,
लंबी कतार है,
लग जाते हैं,
कभी, कभी, ठहाके,
क्योंकि आज इतवार हैं,

सोचूँ मैं भी,
एक कोने मैं बैठकर,
हर किसी की किस्मत मैं,
आतै नही ऐसे क्यों,
सुख, दुःख, के इतवार हैं ?

माग रहा था,
गली मैं खड़ा एक बच्चा,
शायद उसको था पता,
मिलेगा मुझे भी कुछ,
क्योंकि आज इतवार है !!

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