कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 3

कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 3

जिंदगी

धूप-छांव भरी यह जिंदगी
रचती नित्य दिन यह खेल निराले
कोई बेबस खुद से ही
किन्ही के हाथों में रोज मधु भरे प्याले

चल रहे हैं जी रहे हैं
इंसान यहां खुद से ही लड़कर
कोई खुश अपनों की ही बातों से
कोई मोहताज यहां दो वक्त के निवालों से

है बड़ी कशमकश –
ऐ जिंदगी तेरी इस बे – दौड़ की
कभी तू हमसे खफा
कभी उलझी ही रह जाती यह जिंदगी
तेरे इन अनगिनत सवालों से ।।

धन, दौलत

आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

इन धन, दौलत की खातिर
आपसी रिश्तों को
तार-तार होते हुए देखा
झूठ को नसीब तख्तो ताज
सत्य को फिर सूली
चढ़ते हुए देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

मैं बड़ा, तू छोटा,
मैं धर्मी, तू अधर्मी
सब में कूट-कूट कर भरा अहम देखा
बेटे को पिता से,
भाई को भाई से
कितने घर अलग होते हुए देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा

इस जमीन, दौलत की खातिर
बहुतों के ईमान
बिकते हुए देखा
आज इंसान को इंसान का ही
रक्त रंजित करते हुए देखा
सत्य का अब कहां बोलबाला
सब के मुंह पर सफेद झूठ देखा
आज इंसान को
इंसान से लड़ते हुए देखा ।

राजनीती

मेरे भारत का
हाल बेहाल है
जिन्होंने लूटा देश
वो घूम रहे विदेश
जिन्होंने लूटी रोटी
वो झेल रहे
जेल की कोठी

लोगों का मन मस्तिष्क
सो गया कोमा मैं
कोई बंद होकर
निकले जो जेल से
करोड़ों कमा जाते
मेरे भारत मैं
अब भी भूखें कई लोग
सड़कों पे ही सो जाते

जो देते हैं दुहाई देश की
वो हैं बड़े ही जादूगर
देख मोके पर
चौका मार जाते
देश क्या, जमीर भी
अपना बेच जाते

हर दिन हो रहा
नया भ्रष्टाचार उजागर
फिर देश आँखे मुद्दे हैं
कोई बैठा पब मैं
कोई मयखानों में झूमे है

हो रही राजनिति
हर एक पहलू पे
कोई बैठा धर्म पे
कोई करे पेट्रोल की
अब रंगोली है

बैठे है हर कदम पर
कानून के ठेकेदार
कोई खा के चारा निगल गए
कोई पैसे के बल पे
हाथों से फिसल गए

संसद के गलियारों मैं
कुर्सियां भी अब टूट जाती
अब कहाँ वह वन्दे
अब कहाँ वह मातरम
तू, तू, मैं, मैं,
गलियों की बौछार
भी यहाँ हो जाती

सोया देश, सोया समाज
अब क्रंति आए कहाँ
भेड़ चाल जब बन बैठे मानव
फिर कोई जाए कहाँ

वादों की सरकार मुकर गई
जो बन बैठे है पपु
उनकी जुबां
हर रंगमंच मैं फिसल गई

ठहाकों का दौड़ है
हास्यास्पद हर कोई हो गया
कोई तल रहा पकोड़ी
कोई लग के गले
इशारे अपने ब्या कर गया

ऐ बिष्ट -क्या करूँ
कलम आज जज्बाती हो गई
देश की स्वच्छ राजनीति कहीं अब खो गई
कहता हूं वन्दे कहता हूं मातरम
लोगों को यह उपहास सा लगता है
इस तिरंगे पर सर झुकाना
लोगों को अब अपना अपमान सा लगता है ।।

पहाड़ों की यात्रा

चलो आवो तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं,
कभी नैनीताल, तो कभी रानीखेत, ले जाऊं
इन पहाड़ों की वादियों की सैर कराऊं,
चलो आवौ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

देव भूमि नाम है इसका,
अपने पहाड़ों से तुम्हें परिचित कराऊं,
कभी गढ़वाल,तो कभी कुमाऊ,ले जाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

गंगा, यमुना, गंगोत्री, के तुम्हें दर्शन कराऊं,
हरिद्वार,हिमालय,तीर्थ स्थल तुम्हें मैं लै जाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

टिहरी बाँध, चिपको आंदोलन,की कथा तुम्हें सुनाऊं,
त्यौहार हरेला का,और नंदा देवी मेले के बारे में बताऊं
चलो आओ तुम्हे अपना पहाड़ घुमाऊं

मडुवे की रोटी, बाल मिठाई तुम्हें अल्मोड़े की खिलाऊं,
ढोल, दमुआ, बीन बाजा तुम्हें बजाना सिखाऊं
चलो आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

गोपाल बाबू गोस्वामी,
राजा मालूशाही के गीत, तुम्हें सुनाऊं,
गोलू की भूमि,
कत्यूरों के जागर के बारे में तुम्हें बताऊं
चलौ आओ तुम्हें अपना पहाड़ घुमाऊं

पहाड़ी,गढ़वाली,भाषा का तुम्हें ज्ञान कराऊं,
चीड़, देवदार,बुरांस कै फायदे तुम्हें बताऊं
आओ तुम्हें अपना पहाड़ अपना गांव घुमाऊं

जमीन

हर किसी को हक़ है
ऊँचा उड़ने की
ऊँचा उड़े पर अपनी
जमीन मैं रहकर ।

कई किस्से, कई कहानियां
खो जाती है, गिर जाती हैं
अपने अहम मैं रहकर
ऊँचा उड़े पर अपनी
जमीन मैं रहकर ।।

खवाब देखो, उड़ाने भरो
ऊँचा उड़ने की,
पर बुनो जाल
सच्चाई, लग्न का,

आदर्शो की गाँठ की पोटली
मिलती नही किसी भी
शाखाओं, राहों पर,
ऊँचा उड़े पर
अपनी जमीन मैं रहकर ।

झूलसो, बनो कुन्दन
जेठ की गर्मी मैं
ऊँचा उड़े पर
अपनी जमीन मैं रहकर ।।

ॐ हरि भजन

ॐ हरि हरि,
ॐ हरि हरि
जन्म गयो
मेरो तरी, तरी
जब से मुख से निकला
ॐ हरि हरि
बोल ॐ हरि, हरि
ॐ हरि, हरि
कितना सुंदर
प्यारा यह नाम
ॐ हरि, हरि
जन्म गयो
मेरो तरी, तरी
बोल ॐ हरि, हरि ।

हरि, हरि, हरि बोलू
मिठो सो जीवन में
यह रस घोलु
कान्हा की बंसी हरि बोले
सांवरिया सी मूरत हरि बोले
मन मेरा देखो हरि बोले
तन मेरा अब हरि बोले
ॐ हरि, हरि, ॐ हरि, हरि
जन्म गयो, मेरो तरी, तरी
बोल मनवा मेरे अब तू
ॐ हरि, हरि
हरि, हरि, हरि बोल
जीवन में मिठो स रस घोल
बोल ॐ हरि, हरि ।।

हम किसी से कम नहीं

क्यों तुम मुझे रोकते हो
घर से बाहर जाने में
क्यों तुम मुझे टोकते हो
देर रात लेट आने में,

मैं भी अब –
कुछ कर दिखाना चाहती हूं
करके इस मातृभूमि की सेवा
जीवन अपना सफल बनाना चाहती हूं,

बेटों का ही हक नहीं
मातृभूमि की सेवा में
सोच समाज की ये
मैं अब बदलने को तैयार हूं
पहन कर इस वर्दी को,
सर दुश्मनों के,
धड़ से अलग करने को अब तैयार हूं,

मैं भी छू सकती हूं
शिखर हिमालय का
मुझसे ही बहती
यहां से गंगा की धार है,

मुझसे ही सृष्टि है आरंभ
बिन मेरे जीवन
सबका निराधार है
मैं ही तो,
यह मातृभूमि भूमि
मैं ही इसकी पालनहार हूं
मुझसे ज्यादा इसको कौन समझे
मैं ही इसकी खेवनहार हूं,

क्या हम भूल गए
एक भारत की बेटी
” कल्पना ” ने अंतरिक्ष में उड़ान भरी थी
महान लक्ष्मी बाई –
दुश्मनों से निडर होकर लड़ी थी

पहन इस वर्दी को
मान, सम्मान देश का बढ़ाऊंगी
बेटियां नहीं किसी से अब कम
यह अध्याय भी लिख जाऊँगी ।।

प्रेम

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो
दिन, पहर मेरा अब कटता नहीं
दिल मैं मेरे तुम
प्यार का गीत गुनगुना जाती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

तेरे पायल की यह झन, झन
मुझे बेचन सी कर देती है
खामोस रहता हूँ अक्सर में
जब, जब तुम सामने मेरी आती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

तेरा हँसना, तेरा शर्माना
अदाएं है कातिल यह तेरी
बातों से तुम अपनी
जीवन में मेरे
प्यार का रंग घोल जाती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों मैं
तुम ख्वाबों मैं आ जाती हो ।

मन, मंदिर में, मेरे अब
तुम दुल्हन बन कर रहती हो
प्रीत जगी है
दिल में मेरे, तेरे लिए
तुम मुझे पागल प्रेमी कहती हो

सोचूँ जो मैं तुमको रातों में
तुम ख्वाबों में आ जाती हो ।

वसीयत

उम्र हो गई है अब सत्तर
बुढ़ापा अब होने लगा है बदतर
घिरने लगी है
चेहरे पर काली छाइयां
पीछे छुटने लगी है
मेरी परछाइयां
चलना फिरना होने लगा है अब दुर्लभ
शरीर दिखाने लगा है
अब अपना यहां करतब
कैश कब के यह
मेरे सफेद हो गए
कुछ संग, कुछ मेरे साथी
वक्त के वो भी
आगोश में सो गए
सोच रहा हूं मैं भी
अपनी वसीयत लिख डालूं
वक्त का क्या भरोसा
पहले यह काम कर डालूं
वसीयत मेरी पढ़कर
लानत मुझे देना नहीं
जीवन रहा
मेरा यह फकीर
धन दौलत जमीन
जोड़ा नहीं
मिले मुझे जो संस्कार
वो मैं छोड़ा नही
सुना है वसीयत में लोग
लाखों छोड़ जाते हैं
कुछ बूढ़े मां, बाप
वक्त से पहले ही मार दिए जाते हैं
मैं दे जाऊंगा तुम्हें
बुद्धिमता, अभय, संयम, न्याय
अपने पूर्वजों के संस्कार
असत्य से लड़ने का ज्ञान
बना जाऊंगा
तुम्हें आत्म स्वावलंबी
चला हूं मैं भी
इस पथ पर
तुम भी चलना
धन दौलत
ना मिले तुम्हें बेशक
बन कर जग में
मर्यादा पुरुषोत्तम
श्री राम जैसे रहना ।।

 

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