कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 10

कविता -श्याम सिंह बिष्ट -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shyam Singh Bisht Part 10

चिट्ठियां

वह चिट्ठियां तुम्हारी
अब भी मुझे आती है याद
वह दिन, पहर,महीने भर
डाकिए का इंतजार ।

वह उकेरना चिट्ठी में
तुम्हारे अपने जज्बात
वह लिखना तारीख अपने मिलन की
उन चिट्ठियों में कहना
अपने दिल की बात ।

शर्माना तुम्हारा
उन हृदय स्पर्शी शब्दों में
इजहार तुम्हारा रखकर
बंद लिफाफे में वह लाल गुलाब ।

लिए हाथ में वह
नीली स्याही की कलम दवात
शब्द पहला वह उन चिट्ठियों का मेरी प्यारी
वह चिट्ठियां तुम्हारी अब भी मुझे आती है याद ।।

वह दौर भी चिट्ठियों का अजब था
अल्फाजों की स्याही में डूबी हुई कलम
इजहार-ए-मोहब्बत की निशानी में
रखा हुआ लाल गुलाब था ।

ऐ खुशी, मेरे घर भी आया कर

ऐ खुशी –
कभी मेरी दहलीज पर भी आया कर
कब तक दौड़ेगी,
मेरी जिंदगी यह बेरंग
कभी संग बन मेरी परछाई चलाकर

मुझसे ऐसा क्या तेरा
बैर वाला रिश्ता – नाता
कभी बन के जाड़ों वाली धूप
मेरे हिस्से भी आया कर

लग रहें हों जब जीवन में
दुख के मेले
तब धीरज मूझे तू बधाया कर
बन कर सावन वाली बारिश
मेरे घर भी बरष जाया कर
ऐ खुशी –
कभी मेरे हिस्से भी आया कर

ऐ मेरे मालिक –
बड़ी गमगीन व बेरंग हैं
तेरी बनाई इस दुनिया के रंग
पग-पग छल और कपट
लिए चलते हैं
मानव जहां संग

ऐ खुशी छोड़ ऊंचे – ऊंचे महल
कभी इस गरीब की झोपड़ी में भी
डेरा अपना बसाया कर
ऐ खुशी –
कभी मेरी दहलीज पर भी आ जाया कर ।।

अच्छा है

रोज देखता हूं उनको तस्वीर में
कभी वह सामने आ जाए तो अच्छा है
हर दिन गुजारे हैं उनकी गली में
कभी वह भी
हमारी गली में आ जाए तो अच्छा है
ऐ “बिष्ट ” कब तक छुपाओगे
दिल की बात दिल में
कभी दिल से दिल की बात हो जाए
तो अच्छा है
बोझिल सी यह शामें
अब कटती नहीं उनके बिना
आंगन हमारे वह आ जाए
तो अच्छा है
ऐ “आदर्श ” कल्पना यह तुम्हारी मेरी
सत्य चित्रार्थ हो जाए तो अच्छा है
रोज आते हो ख्वाबों में मेरे
कभी रूबरू मुलाकात हो जाए तो अच्छा है
कब तक यूं ही जीना
तेरे बिन शिसक शिसक कर
मेरा नाम तेरे नाम से जुड़ जाए तो अच्छा है
कब तक देखूं
अपनी आंखों से इस जमाने को
तेरा मेरा जहां भी बस जाए तो अच्छा है
आओ मिलकर करे
गिले-शिकवे दूर
मैं तुम – हम बन जाएं तो अच्छा है ।।

पता

पता पूछ रहा
यहाँ मानव
जूआलय, शराबआलयों का
मंदिरों का पता पुछै
क्यों ना अब कोई ?

नाचे फूहड़ धनु में यहां
है कैसा लगा
यह अजब कोलाहल
“रामधुन ” में थिरके
क्यों ना अब कोई ?

मैंलेे तन को
कर ले मानव
कितना भी सुगंधित तू
मन के भीतर अपने झांके
क्यों ना अब कोई ?

है चढ़ा सर पर
कैसा यह रुतबा
शानो-शौकत का
दर पर तेरे झुका
क्यों ना कोई ?

तुम ही “कर्ता
तुम ही धर्ता ”
तुम ही ” प्रारंभ
तुम ही अंत”
इस ज्ञान को
सीखा फिर भी
क्यों ना कोई ?

आओ चल, चलें गाँव की ओर

आओ चल चलें,
अपने गांव की ओर
वह आम अमरूद
चीड़ देवदार
फ़ैले हुए आंगन
इंद्रधनुष से लिपटे हुए
उन पर्वतों की ओर
इन खेतों से भी
उग जाती हैं
चूल्हे की रोटियां
किसान कहलाने में
कोई हर्ज तो नहीं
आओ निहारे
गुच्छे में लिपटे हुए
फिर उन तारों को
देख रहा, राह
जहाँ छुपता हुआ सूरज
अब भी तुम्हारे आने की ।

ऐ प्रकृति –
मुझे भी समेट ले अपनी गोद में,
इतनी रंगत-
इस जहाँ में और कहां ।

69. छवि

छवि तुम्हारी ऐसी उकेरू में,
नैनो को दे दूं,
रूप नील, गगन का,
सौंदर्य तुम्हारा हो,
ऋतु आगमन बसंत का,
ढका आवरण जैसे,
मेघों ने इस प्रकृति का,
केशों की तुम्हारी,
हो ऐसी छाया,
मध्यम,मध्यम निर्मम, निर्मम
हवा जैसी बहती,
हो तुम्हारी काया,
कहे जग यह तुम्हें,
कोई वन हिरणी
या ग्रीष्म ऋतु की,
तुम शीतल छाया,

हैं जैसे अम्बर,धरा में,
विचरण करते हुए पंछी,
बन रहे हैं जैसे ये सप्तरंग,
ऐसी ही उकेरू,
तुम्हारी मैं छाया,

फैल हूआ है यह जो,
तुम्हारी आंखों का सफेद आवरण,
बीच घटा मैं,
यह काला बादल,
बना हुआ है,
जैसे प्रतिबिम्ब शून्य,
ऐसी ही हो तुम्हारी,
रूप, मन, निज काया !!

क्या वो प्यार था

क्या वो प्यार था ?
खुली आंखों से
जीवन के सपनें देखना
रातो को करना विचरण
दिन – दोपहर तेरी गलियों के चक्कर ।

लिखना कागजों में, मेरी प्यारी
हर चौक – चौराहे पर तेरा इंतजार
खाना क़समें प्यार के बातो की
कागजो मैं उकेरना अपने जज्बात ।

रातों के पहर का
वो मेरे मन् को कचोटना
दस्तक तेरी, मेरी आँगन मैं फूलों जैसी
बाल्यकाल का वो तेरा – मेरा लड़कपन
थोड़े अबूझे थे हम थोड़े से तुम ।

समझना गुलाब को प्यार की निशानी
किताबों का वो मेरा, तेरा अदल – बदल
लिखना शायरी तेरी जुदाई मैं
क्या वो प्यार था ?

हाँ मैं पहाड़ी हूँ

हाँ मैं पहाड़ी हूँ
हिम की धरा मैं रहने वाला
धोती-कुर्ता, टीका, शान मेरी
तिरछी, श्वेत टोपी
सिर पर विराजमान मेरी
अवतरित देव रूह -रूह मैं
निष्पक्ष न्याय करने वाला
जननी देव, ऋषियो की
भूमि मैं रहने वाला
पवित्र गंगा की तरह बहने वाला
हाँ मैं पहाड़ी हूँ ।
हिमालय के शिखर की तरह वर्चस्व मेरा
नैनीताल जैसी अलकल्पनिय गहराई मुझ मैं
ह्रदय से सौम्य, सरल, स्वभाव मेरा
चट्टानों जैसा अडिग, निडर मैं
उपजित इस धरती का श्रृंगार, मेरे ही लहू से
लाखों पग रास्ता नापने वाला
हाँ मैं पहाड़ी हूँ ।।

आज रो लेने दो

आज थोड़ा रो लेने दो
छुपे इन दिलों के भीतर
जज़्बातों को थोड़ा बह लेने दो,
सजी इस मधुशाला की
रंगीन, रंगशाला मैं
थोड़ा सा जज़्बाती
मुझे भी आज हो लेने दो,
है कमबख्त छुपा रखें हैं
मैंने इस दिल मैं बहुत दर्द
मुझे भी आज लबो से
अपने अफ़साने कह लेने दो,
हँसी के दीखावाटी
इस नक़ाब के चहेरे से
पर्दो को आज तो उतार लेने दो,
बुजदिल सहमा – सहमा सा
जो रहता है मेरा यह दिल
आज दिल की बातें अपनी
मुझे भी कह लेने दो,
हो जाऊं – मैं भी थोड़ा जज़्बाती
इसमें हर्ज़ ही क्या है
यादौं की पगडंडियों पर
आंसुओं की अश्रु धारा
आज बह लेने दो,
क्या करूं – याद आ जाते हैं
गुज़रे ज़माने के किस्से
फिर वही पुराने
दोस्ती, प्यार,के उन नगमों को
आज फिर कह लेने दो,
मिलंगे ना जानें फिर कभी
दिलों से आज, दिलों की बाते हो लेने दो
आज मुझे भी यारो मेरे – रो लेने दो ।

फिर प्रलय आएगी

मानव जब होगा
पूर्ण विमुख धर्म से
सज्जन खोने लगे सम्मान
सूर्य – चंद्रमा होने लगे विलुप्त
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।
मंदिर – घरों में
जब होने लगे दुराचार
मिट्टी,ज्ञान, दैह का
होने लगे व्यापार
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

शकुनिया जब
चलने लगे पासै
मस्तिक में बढ़ने लगे
जब जीत का भ्रम
होने लगे अभिमानी
विमुख हो जाए
मानव धर्म सै
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।
अपने चरम पर
जब पहुंचेगी हिंसा
स्वांस लेना
हो जाए दुर्लभ
होने लगे जब मानव
फिर गिद्ध कि तरह
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

मन – तन
हौ जाय अशांत
विलुप्त हौ जाय
प्रकृति निरमित् संसधान
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी
बहने लगे जब
विपरीत नदियां, पवनें
गुम हो जाए
मंदिरों का शंखनाद
कालचक्र जब बदल लै करवट
तो समझो –
फिर प्रलय आएगी ।

श्वेत श्यामलरूप बनकर
कल्कि अवतार
फिर अपने को दोहराएगा
उपजित नव, निर्मित युग,
तब सतयुग कहलाएगा !!

तुम बिन, मैं व्यर्थ बेकार

तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार
पड़ै कदम तुम्हारे
जौ मेरे आंगन में
महक उठा मेरा घर संसार
अनगिनत रूप तुम्हारे
धूप में बनी तुम मेरी परछाई
तुम ही शक्ति मेरी
तुम बिन मैं व्यर्थ, बेकार
तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार ।

है बाँध ली प्यार की डोर
मैंने तुमसे
तुम सुर कै संगीत
मैं तुम्हारा साज
तुम संग मेरे हर दिन उत्सव
बिन तेरे जैसे
भंवर में फंसी
नोका कोई मझधार
तुम मेरी जीवन संगिनी
मैं तुम्हारा आधार ।

मैं तुम अर्धनारीश्वर
तुम रूप पार्वती
मैं शिव,
माता – पिता हमारे संसार
तुम बिन
मैं व्यर्थ बेकार !

दिल में अजब सा आज शोर हुआ है

दिल में अजब सा आज शोर हुआ है
आज हम से अपना कोई दूर हुआ है

भीगी, भीगी मेरी यह पलके अब कहती हैं-
अब उनपे हमारा कहा जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

घिर, घिर आई है काले, काले यह बादल
मौसम यह अब मेरा घनघोर हुआ है
दिल में आज अजब सा शोर हुआ है ।

जी लेंगे यादों में हम तुम्हारी
रुसवाईयों पर किसका कब जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

होंगे तुम्हारे चाहने वाले हजार
पर मुझ सिरफिरे का कब कोई और हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

ए दोस्त तुम्हारी खुशियां तुम्हें मुबारक
पर मेरी रातों की तन्हाईयों का
कब कहा कोई भोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

तेरी यादें तेरी सूरत पर
लिखूंगा फिर एक नई गजल
टूटे हुए दिलों की कलमों पर
कब किसका जोर हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

मैं राही खुद का अकेला ही
कब इस जीवन में
किसका कोई और हुआ है
दिल में अजब सा आज शोर हुआ है ।

नारी शक्ति

क्यों घूर रहे हो, भौंऐ तानै हुए
है समाज के अनुयाई
कहां गई तुम्हारी सभ्यता
कहां गयै तुम्हारै संस्कार
चीरहरण हो रहे हैं, फिर द्रोपदीयो के
बन गए हम, फिर मुक दर्शक
उठो जागो हे वीर छत्रियों
चीर दो सीने इनकै, भीम की तरह
ना बनो दुर्बल, ना बनो लाचार ।
कब तक देती रहैंगी परीक्षा
देवीया सीता, इस अग्नि कुंड में
क्यों सुन, सहन रहे हैं हम
इन धोबियों की, लांछन ताने जुल्म
नारी पर युगों से बारंम बार
उठो हे वीर छत्रियों
ना बनो दुर्बल ना बनो लाचार ।
दुर्बल अहसाय कोमल, नहीं यह नारी
ऋणीं हौ तुम इसके, कभी मातृत्व प्रेम
कभी दुर्गा काली रूप भी है इसके
अज्ञानी हो गए हैं हम
या ज्ञान हमने पूर्ण पा लिया
यह मेरे भारत की कैसी विडंबना
बेटी बचाओ नारा भी भारत को दे दिया
उठो है वीर छत्रियौं
ना बनो दुर्बल ना बनो लाचार ।
क्यों पट्टियां बाध ली आंखों में
क्यों सो गए हम गहरी नींद
उठो है वीर छत्रियों
है रगौ में बसा तुम्हारे खून
तुम मैं भी है भीम
तुम मैं भी है कृष्ण
उखाड़ फेंको उन हाथों को
जो करे नारी जाती का खून !!

मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी

मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी
खींच लो रेखाएं चाहे तुम
कागज पर कितने भी विकास की
अशिक्षित, अहसाय लाचार गरीब
देश की आधी आबादी
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

पिट लो ढोल ढिंढोरा
कितने भि अपने बखान की
सच छुपता नहीं, सच मिटता नहीं
चाहे पट्टीया बधवा दो, आंखों में समाज की
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

हैं घात लगाये, कदम-कदम पर
दौलत जुल्म के ये ठेकेदार
घूर रहे आंखें ताने हुए, मुखौटा पहने धर्म का
सर लिए रावण जैसे हजार
मुबारक तुमको तुम्हारी आजादी ।

धर्म, कुल, ऊंच, नीच
शब्द यहाँ भेद भाव जणित
है बटें हुए यहां मानव, सिक्को के दो भागों पर
यह चकाचौंध इन महलो में
झोपड़ियों में अब भी उजाले नहीं ।
फिर यह कैसी आजादी ?
मुबारक तुम्हीं को, तुम्हारी आजादी !

पहाड़ों की बारिश

पहाड़ों की बारिश का
यह मौसम सुहावना
जमी पर गिरती यह निरमल बूंदै
मेंढक की वह बोली टर- टर
आसमान में छठा बिखेरते
यह रंग-बिरंगे तारे
कानों में मधुर ध्वनि यह
बारिश की टप, टप, टप ।
पेड़ों के पत्तों कि यह कैसी सरसराहट
निकलता चूल्हे से वह धुआ
रोशनी बिखेरते, जुगनुओं की वह फुसफुसाहट
मौसम आया पहाड़ों में यह अलबेला ।
चोखट पर दस्तक देता
जैसे मौसम जाड़ों का
कहीं पर है धुंध, कहीं पर गिरे यह पाला
आई पहाड़ों की मिट्टी से कैसी
यह अपनेपन की खुशबू
फिर याद आया मौसम
पहाड़ों की बारिश का वौ भिगोनै वाला ।

 

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