कविता लिखा करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

कविता लिखा करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

कविता लिखा करो
दर्दो को धरती मिलती है।
कोरे पन्नों को सौंपा करो
रूह का सारा भार।
यह लिखने से
नींद में खलल नहीं पड़ती।

तुम्हारे पास बहुत कुछ है
कविता जैसा
सिर्फ स्वयं को अनुवाद करो
पिघल जाओ सिर से पैरों तक
आहों को शब्दों के परिधान पहनाओ।

और कुछ नहीं करना
झांझरों को आज से बेड़ियाँ मानना है
गहना-आभूषण
सुनहरे चुग्गे की तरह।
मिट्टी का बुत
बेटा या बेटी नहीं बनता है
कविता लिखा करो।

कविता लिखने से
पत्थर होने से बचा जा सकता है
आँखों में आँसू
आएं भी तो
समुद्र बन जाते हैं।
चंद्रमा मामा बन जाता है
और अंबर के सारे तारे नानका मेल।

दरारों के मध्य से लाँघती
तेज़ हवा का नाद सुनाई देता है
कविता लिखने से
क्यारी में खिले फूल, बेल-बूटे
कविता की पंक्तियाँ बन जाते हैं।
बहुत कुछ बदलता है
कविता लिखने से।

फागुन चैत महीनों की
प्रतीक्षा बनी रहती है
पाँचवाँ मौसम प्यार कैसे बनता है
कविता समझाती है पास बिठा कर।
तपती धरती पर
पड़ी पहली बूँदें
उतनी देर
कविता जैसी नहीं लगती
जब तक आप
कविता नहीं हो जाते।

लड़कियों को
बेटियाँ समझने समझाने का
नुस्खा है, कविता लिखा करो।
रंगों से निकटता बढ़ती है।
सब रंगों के स्वभाव
जान लेता है मन।
कविता लिखा करो।

स्वयं से
लड़ने की युक्ति सिखाती है
कविता
हमें बताती है
कि सूरज का घर
सहज और बहुत समीप होता है।

सब्र से जब्र का क्या रिश्ता है
तपता तवा कैसे ठर्रता है
तपी तपीश्वर और आस्थावान
शब्द सृजक के बैठते ही
रावी किस तरह आगोश बदलती है।

अक्षर से शब्द और उससे आगे
वाक्य तक चलना सिखाती है
कविता शब्दों का वेश पहनती
ठुमक ठुमक चलती
स्वयं ही कब्ज़िया लेती है मन के द्वार
इत्र फुलेल का फाहा बन जाती
रोम रोम महकाती है
शब्दों की महारानी।
कविता लिखा करो।

हँसी की खनक में घुँघरू
कैसे छनकते हैं लगातार
सरूर में आई रूह
गाती है गीत बेशुमार
कैसे चंपा मन का खिलता है
राग इलाही कैसे छिड़ता है
समझने के लिए बहुत ज़रूरी है
कविता लिखना।
कविता लिखने से
पढ़ने की युक्ति आ जाती है।
समझने समझाने से आगे
महसूस करने से
बहुत कुछ बदलता है
कविता खिले फूलों के रंगों में से
कविता कशीदना सिखाती है।
रिक्त स्थान भरने हेतु
कविता रंग बनती है।
बदरंग पन्नों पर
कविता लिखा करो।

कविता लिखने से काले बादल
मेघदूत बन जाते हैं
शकुंतला का दुष्यंत के लिए कलपना
महाकाव्य बन जाता है।
दर्दों का
भीतर की ओर बहता ख़ारा दरिया
दर्दमंद कर देता है
कविता लिखने से।

कोई भी दर्द पराया नहीं रहता
ग्लोब पर बसा सारा आलम
चींटियों का घर लगता है
कुरबल कुरबल करता।
सिकंदर ख़ाली हाथ पड़ा
कवियों से ही बातें करता है।

ताजदार को कविता ही कह सकती
बाबर तू जाबर है
राजा तू बाघ है
मुकद्दम तू कुत्ता है
रब्बा तू बेरहम है।
कविता लिखा करो।
शीश की फीस देकर लिखी कविता को
वक़्त साँसों में रमा लेता है
थोड़ा थोड़ा बाँटता रहता है
सदैव निरंतर
जैसे ओस पड़ती है।
कविता लिखा करो।

कविता साथ साथ चलती है
आगे आगे लालटेन बन कर
कभी अँधेरी रात में जुगनू बन जाती
आशाओं का जलता बलता
चौमुखी चिराग।
शब्दों के सहारे
दरिया, पहाड़, नदियाँ, नाले
फलाँग सकते हो एक ही छलांग में।

विज्ञानियों से पहले
चाँद पर सपनों की खेती
कर सकते हो बड़ी सहजता से।
सूरज से पार
बसते यार से मिल कर
दिन निकलते लौट सकते हो।
कविता लिखो करो।

बच्चा हँसता है
तो खुल जाते हैं
हज़ारों पवित्र पुस्तकों के पन्ने
अर्थों से पार लिखी
इबारत-सी किलकारी में ही
छिपी होती है कविता।

यदि तुम बेटी हो तो
बाबुल के नेत्रों में से कविता पढ़ो
लिखी लिखाई
अंनत पृष्ठों वाली विशाल किताब
यदि तुम पुत्र हो तो
माँ की लोरियों से औसिआँ तक
कविता ही कविता है
बाढ़ के पानी-सा मीलों तक
आसरे के साथ नन्हे नन्हे कदम रखती
मेरी पौत्री आशीष-सा
आप भी
कविता के आँगन में चला करो।
मकान घर इस तरह ही बनते हैं।
कविता लिखा करो।

 

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