कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

 

 नशा

नशा नाश का प्रतीक, नशा से सुदूर रहें;
नशा में जो फँसा उसे मरा हुआ मानिए ।
तन जाय, धन जाय, सुमन-सा मन जाय;
नशा-ग्रस्त को विवस्त्र, साँप डसा जानिए ।
नशा शान-मान से नशेड़ी को विहीन करे,
दीन करे, नशा के विरुद्ध युद्ध ठानिए ।
नशा कर्कशा-सा कराल काल के समान,
नशा पे तुरंत उग्र तीक्ष्ण तीर तानिए ।

सौंदर्य

रमणी मणी-सी चली अलि की अनी समेत,
पाँव में लगे हैं जनु जावक उमंग के ।
उड़-उड़, मुड़-मुड़ झाँकती-सी जाती खिली,
सुख की डली-सी, सुर मदन – मृदंग के ।

मंजुल उरोज ज्यों सरोज सुषमा के द्वय,
अथवा मनोज के सुलेख हैं प्रसंग के ।
किंवा किलोल करें चपल हरेक पल,
कंचुक सुनीड़ में सुशावक विहंग के ।

 

 आरक्षण

आरक्षण इस देश की सबसे भारी भूल ।
यह आपस की एकता को काटता समूल ।।
आरक्षण अभिशाप है, आरक्षण है आग ।
दंगों से भी है बुरा, संविधान पर दाग ।।
दावानल – जैसी सखे! आरक्षण की आग ।
आपस के सौहार्द को डसने वाला नाग ।।
यह लालच का रास्ता, महाफूट का बीज ।
यह अक्षमता की सनद, महाअपावन चीज ।।
यह अविनय की अकड़ है, अड़ियलपन है, ऐंठ।
यह अक्षम की धाँधली, सत्ता में घुसपैठ ।

 तन्वी

छमछम छमक, छमक छम पग धरे;
हरे उर-शूल को समूल दृग – तीर से ।
भूषण-वसन मन-प्राण, भूख-प्यास हरें,
चीर – चीर देती धीर चीर के समीर से ।
वचन अशन सम, जीवन पीयूषपूर्ण;
अधर मधुर रसपूर जनु खीर से ।
हेर-हेर हँसती तो ढेर-ढेर फूल झरे,
तन्वी सुगंध ढरे सुतनु उसीर से ।

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