कविता-रजनीश्वर चौहान ‘रजनीश’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajnishwar Chauhan Rajnish Part 2

कविता-रजनीश्वर चौहान ‘रजनीश’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajnishwar Chauhan Rajnish Part 2

इन्तेहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है

इन्तेहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है
वरना तेरा साथ होना कहाँ किसीको मयस्सर होता है

न पहले, न बाद, न रात, न सहर सुकूँ मुख़्तसर होता है
किसी से मिलना-बिछड़ना भी कितना बा-असर होता है

किस किनारे बैठें, किसे ताकें, किस से लिपटा करें
अब यहाँ न दरिया, न फूल, न वो, न भँवर होता है

कहे माने पे है ये अपना चलना, ठहरना, ये जिये जाना
सुनते हैं तक़दीर बदलती है, सुनते हैं मुक़द्दर होता है

काँधे, आसन-ए-बाज़ू पर से कहाँ जाना गया हमसे
जब खुद राह निकले तो जाना कि क्या सफ़र होता है

चार बातें हाज़िर जवाबी को सीख लेंगे ऐ दिल-ए-नाकाम
ऐसा होता है, वैसा होता है, अगर होता है, मगर होता है

क्या सर चढ़ाएं ‘ रजनीश ‘, क्या ग़म करें कामयाबी का
ये ख़िताब-ए-ज़िन्दगी है, कभी इधर, कभी उधर होता है

यूँ दश्त-बा-दश्त बवण्डर हो जाना

यूँ दश्त-बा-दश्त बवण्डर हो जाना
ज़रूरी तो है मेरा समंदर हो जाना

इन ग़मगीन स्याह सर्द रातों में मेरा
आसां नहीं लिहाफ के अंदर हो जाना

ठुकरायें वह क्या कि खुद ही चले आए
अच्छा है बंदिशों से दर-ब-दर हो जाना

उम्र न सही चंद दिन ही अता हो गए
बेहतर था रिश्ते में कैलेंडर हो जाना

निकले हो शाही महफ़िल से ‘ रजनीश ‘,
अब इतना आसाँ न होगा कलंदर हो जाना

जहाँ का हरेक हर्फ़ लिखता बस एक वफ़ा बच जाता

जहाँ का हरेक हर्फ़ लिखता बस एक वफ़ा बच जाता
मैं तुझको और लिखता गर जो सफ़ा बच जाता

कापी में दफ़्न हुए मेरे अज़ीज़ मिसरे का ग़म क्या करूँ
वह बस थोड़ा और जीता जो इस दफ़ा बच जाता

बड़ा फायदा था ज़िन्दगी में आदमी को पढ़ने का भी
मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ किताबें न पढ़ता तो नफ़ा बच जाता

जवां ख़्यालों पे सख़्ती सी रहती है कोई

जवां ख़्यालों पे सख़्ती सी रहती है कोई,
बड़ी बदगुमां सी इस शहर की हस्ती है कोई

सौदा यूँ होता है हर जलसे-सियासी मेले में
कि ठेला है ज़िन्दगी, जान भी सस्ती है कोई

सफ़र है मजमें से मजमें तक का जीना यहाँ,
हर एक उठाए चलता अपनी अस्थि है कोई

ग़र शर्त है रोज़ जीने को मरने की तो तौबा लो

यूँ मरकर साँस लेना भी ज़बरदस्ती है कोई

एक ही राह से बारहा लौटा हूँ यह सोचकर
कि उस सम्त भी इंसानों की बस्ती है कोई

सबब कोई पूछता है

सबब कोई पूछता है
तो उलझा दिया करता हूँ यहाँ-वहाँ की बातों में,
आसां भी तो नहीं होता
रिश्तों में पड़ी सीलन की वजह को बयां कर पाना
गर होता
तो धूप को कोस लेता
और बरसात पे इल्ज़ाम धर देता

हम वह बच्चे हुआ करते थे

हम वह बच्चे हुआ करते थे,
जो बाद बारिश के निखरते थे

बुनते थे कहानियों में आसमां,
चाँद-तारे ज़मी पे उतरते थे

आँधियाँ भी चुप रहती थीं,

फूल ज़िद पर अड़े उभरते थे

ऊँची उड़ानों का डर देखिये,
परिंदे अपने पर कतरते थे

हमको तो सादगी जचती थी,
वह न जाने क्यों सँवरते थे

समेट लेगा हमें बाहों में कोई,
बस यही सोचकर बिखरते थे

अच्छा हुआ जीना छोड़ा दिया,
वरना यूँ तो रोज़ मरते थे

 

ज़ुबाँ-ओ-ग़ज़ल मेरी मसरूफ़ है फिसल जाने में

ज़ुबाँ-ओ-ग़ज़ल मेरी मसरूफ़ है फिसल जाने में,
अभी पूरी एक उम्र लगेगी मुझको संभल जाने में

मिसाले उफनते दरिया की मैंने मानी नहीं उनकी,
जिन्हें खुद ही हिसाब लग जाता है उबल जाने में

सिर्फ़ साँसे ही परवान देती है ज़िंदा होने का वहाँ,
जहाँ मुद्दे आबोहवा तक नहीं खाते उछल जाने में

वो धीमे-धीमे अरसे गुज़ार देते हैं खौफ़ जमाने में,
तुम देर भी नहीं लगाते बात-बात पे दहल जाने में

हाल ये है कि रख बोझ कांधे दबा देते हैं बचपन,
बच्चे मशगूल होते नहीं खिलौनों से बहल जाने में

बड़ी अक़ीदत से सींची गई है मिट्टी मेरे वतन की,
कई मौसम गुज़रेंगे सियासतदानों फसल जाने में

तुमसे न निभेगा ये दौर ऐ मौजज़ा-ए-हुस्न वालों,
लगाते हैं दिल भी कीमत अब यहाँ मचल जाने में

दौर-ए-सियासत में है बोलबाला खून का

दौर-ए-सियासत में है बोलबाला खून का,
सियासत हुनर से देती है हवाला खून का

कतरों ने रंगी हैं सियासी दीवारें उसकी,
लाशों से हुआ होगा छप्परवाला खून का

वसूलती है सूद जनता से बिना कर्ज़ ही,
निकाल लेती है हुकूमत दिवाला खून का

खा जाती है बस्तीयों को भूखी सीयासत,
निगल ले जाती है कतरा-निवाला खून का

लेती नहीं है शम’आ से रोशनी सियासत,
हिंदू-मुसलमां से करती है उजाला खून का

करके बेहाल पूछते हैं हाल ज़रूर ज़माने वाले

करके बेहाल पूछते हैं हाल ज़रूर ज़माने वाले,
ख़ैरियत पूछते हैं रहकर मगर दूर ज़माने वाले

आए दिन ही मेरे कुनबे से टूट गए कई यार मेरे,
बचपन रहता तो रहते साथ फ़ितूर निभाने वाले

बिन सोचे ही खर्ची है जिसने भी मोहब्बत यहाँ,
हुए वही कमाई-ए-मोहब्बत से चूर कमाने वाले

जो आये थे कभी इस शहर में ढूँढने को रोशनी,
शहर की चकाचौंध से हुए वही नूर गवाने वाले

गर इतना आसां होता कभी नशे से गुज़र जाना,
होश में लाने को न कहते सुरूर आज़माने वाले

हासिल तू न हुआ तो तक़दीर को कोस लिया,
निभा लिए अब हमने भी ये दस्तूर ज़माने वाले

ख्वाब आँखों में लिए जो निकले ज़माने में

ख्वाब आँखों में लिए जो निकले ज़माने में
कदम-दर-कदम दफन होते रहे फसाने में

ज़िन्दगी की ज़मीं पे हम एक मुहाजिर से हैं
एक उम्र कट गई, खुदको मनाने-समझाने में

ख़्वाब-ए -शब-ओ-रोज़ से अब वास्ता नहीं
वह भी कैद हो गए तिलिस्म-ए-अफसाने में

था तमनाओं का भी एक छोटा सा आशियाँ
घर की ज़रूरतें ही मसरूफ़ रहीं जलाने में

एक वक्त था कि बारिश में नहाने निकलते थे
आज आँसू बहा लिया करते हैं इसी बहाने में

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