कविता -यशु जान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Yashu Jaan Kavitayen Part 2

कविता -यशु जान  -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Yashu Jaan  Kavitayen Part  2

ये किस कदर प्यार करते हैं

वो हमसे कैसा ये किस कदर प्यार करते हैं?
कि बार-बार मेरी मौत का इंतज़ार करते हैं

साज़िश रचते हैं हमें जब भी मारने की वो,
क्युं हमला करने से पहले होशियार करते हैं?

छुपाते हैं अपने इश्क़ को ज़माने से फिर भी,
दुनियां के सामने ही मेरे सीने पे वार करते हैं

खाकर चोट ख़ूब हसना अब आदत सी हो गई,
क्या कहें वो किस तरह की हदें पार करते हैं?

प्यार में आशिक़, दीवाने ही बता दूं यशु जान,
मरकर भी माशूक़ा पे ही जांनिसार करते हैं

 थक गया हूँ

थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

मेरा दिल भी दिल ही है,
छोटी सी महफिल ही है,
इस दिल पे क्या बीती ना जाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

हो गया सारा ग़ैर ज़माना,
बंद किया है आना जाना,
दुख होता है बंद पड़े हैं मयख़ाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

तेरा सच या उनका झूठ,
ज़हर ही मिल जाये दो घूँट,
कैसे होगा उनकी बात ना मानें सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

अपने दिल दिमाग़ की मान,
हुआ बहुत अब यशु जान,
हम तो अब हैरान हैं उनके पैमाने सुनकर,
थक गया हूँ मैं तेरे बहाने सुनकर,
अब ना ज़िंदा रह सकूंगा ताने सुनकर

घनघोर अशुद्धियां

पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

पहली अशुद्धि सच लिखना,
है दूसरी इनका ना बिकना,
चोर ना छिप सकता है इनके गांव में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

तीसरी अशुद्धि चुभते शब्द,
इनमें सब कुछ है उपलब्ध,
जो होना चाहिए देश के इन युवाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

और पांचवीं इनमें देश-भक्ति,
छटी तेरे गुरुदेव की शक्ति,
छिपा बहुत कुछ है इनकी अदाओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में

सातवीं इनका जोश दिखाना,
आठवीं सच पर मर मिट जाना,
यशु जान तू मरेगा सब खताओं में,
घनघोर अशुद्धियां हैं तेरी कविताओं में,
पढ़ने में मज़ा तो है आता इन छाओं में

ईद के ख़ास मौके पर कोई ख़ुदाई से मिले

ईद के ख़ास मौके पर कोई ख़ुदाई से मिले,
दुश्मन – दुश्मन से मिले भाई – भाई से मिले

दुनियां वालों तुम्हें क्यों जलन होती है अग़र,
मुस्लिम सीख़ से मिले या सीख़ ईसाई से मिले

उस बंटवारे को अल्लाह भी क़बूल नहीं कर्ता,
जो हिस्सा इंसानों को ख़ून की लड़ाई से मिले

ग़ले ज़रूर मिलो मग़र ग़ला काटने के लिए नहीं,
क़ल को क्या पता किसका वक़्त जा बुराई से मिले

ये शायर तेरा आशिक़ है एक ही बात कहता है
हमसे जब भी जो भी मिले दिल की गहराई से मिले

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