कविता -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Part 2

कविता -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Part 2

मधुर मधु-सौरभ जगत् को

मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता
वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता !
मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा !
चाहता अब प्राण अलसित शून्य में लेना बसेरा !

(जापानी कवि योनेजिरो नोगुचि की कविता का अनुवाद)
(चाँद-1937 ई.)

विधवा

क्यों व्याकुल हो विरहाकुल हो, शोकाकुल हो प्यारी भगिनी ।
संतापित हो अविकासित हो, सर भारत की न्यारी नलिनी ।।
आश नहीं अभिलाष नहीं, नि:सार तुम्हारे जीवन में ।
क्यों तोष नहीं परितोष नहीं, निर्दोष दुखारे जीवन में ।।
पावनता की पूर्ति अहो, मृतप्राय हुई वैधव्य हनी ।
करुणोत्पादक मूर्ति लखो, अति दीन हुई दुखरूप बनी ।।
हा हन्त हुई यह दीन दशा, फिर स्वार्थ दली दुर्दैव छली ।
नव कोमल जीवन की कलिका, हा सूख चली बिन पूर्ण-खिली ।।
अंबर तन जीर्ण मलीन खुले, कच रुक्ष हुए श्रृंगार नहीं ।
मधुराधर पै मुस्कान नहीं, उर में आशा संचार नहीं ।।

दीन हुई श्रीहीन हुई, मझधार वही भवसागर में ।
आधार गया सुखसार गया, और आश रही करुणाकर में ।।
देशबंधु यदि नहीं कभी तुम, इनकी ओर निहारोगे ।
दैव पीड़िता विधवायों का, दारुण कष्ट निवारोगे ।।
पाप मूर्ति बन जाएँगी, हैं जो पावनता-पूर्ति अभी ।
तुम भी होगे हीन, नहीं पावोगे उन्नति कीर्ति कभी ।।

(‘चाँद’, जनवरी, 1923 ई.)

तितली से

मेह बरसने वाला है
मेरी खिड़की में आ जा तितली।

बाहर जब पर होंगे गीले,
धुल जाएँगे रंग सजीले,
झड़ जाएगा फूल, न तुझको
बचा सकेगा छोटी तितली,
खिड़की में तू आ जा तितली!

नन्हे तुझे पकड़ पाएगा,
डिब्बी में रख ले जाएगा,
फिर किताब में चिपकाएगा
मर जाएगी तब तू तितली,
खिड़की में तू छिप जा तितली।

कोयल

डाल हिलाकर आम बुलाता
तब कोयल आती है।
नहीं चाहिए इसको तबला,
नहीं चाहिए हारमोनियम,
छिप-छिपकर पत्तों में यह तो
गीत नया गाती है!

चिक्-चिक् मत करना रे निक्की,
भौंक न रोजी रानी,
गाता एक, सुना करते हैं
सब तो उसकी बानी।

आम लगेंगे इसीलिए यह
गाती मंगल गाना,
आम मिलेंगे सबको, इसको
नहीं एक भी खाना।

सबके सुख के लिए बेचारी
उड़-उड़कर आती है,
आम बुलाता है, तब कोयल
काम छोड़ आती है।

(नंदन-मई, 2005)

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